कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 98, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें८४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
[बायाँ स्तम्भ]
पदोंके अधिकारीकी एकताको नहीं मिटाते या जैसे जिला-न्यायाधीश और सेशन्स-जजके कार्य अलग-अलग होते हुए भी इन पदोंपर आसीन एक ही अधिकारीकी एकताको नहीं नष्ट करते ।
मेरे विचारसे इसी प्रकार अद्वैत, विशिष्टाद्वैत एव द्वैत सिद्धान्तोंकी एकता भी अक्षुण्ण है। यहाँ भी श्रीकृष्णकी वाणी सदाकी भाँति हमे समन्वयकी कुञ्जी प्रदान करती है—
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते । एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥ (गीता ९। १५)
'दूसरे ज्ञानयोगी मुझ निर्गुण निराकार ब्रह्मका ज्ञानयज्ञके द्वारा अभिन्नभावसे पूजन करते हुए भी मेरी उपासना करते हैं, और दूसरे मनुष्य बहुत प्रकारसे स्थित मुझ विराटरूप परमेश्वरकी पृथग्भावसे उपासना करते है।' सायुज्य और कैवल्यके स्वरूपमें कोई भेद नहीं है । विशिष्टाद्वैतकी विदेहमुक्ति अद्वैतीकी जीवन्मुक्तिका निराकरण नहीं करती । द्वैती तब भूल करता है, जब वह नित्यबद्ध और नित्य संसारी जीवोंकी बात कहता है। मोक्षके अधिकारी सभी हैं, परतु इतना तो हम समझ सकते हैं कि जबतक प्राकृत शरीरका अभ्यास बना है, तबतक श्रेणीविभाजन रहेगा ही और शुद्ध सात्त्विक अप्राकृत देहका अभिमान हो जानेपर श्रेणीविभाजन नहीं रहेगा, अपितु साम्यके रूपमें एकता हो जायगी (निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति) । किंतु इन अवस्थाओंका अनुभव असप्रज्ञात समाधिमें निष्पन्न होनेवाली परमात्माके साथ आत्माकी अविकल एकाकारताके अनुभवका निराकरण नहीं करता। श्रीरामकृष्ण परमहंसके शब्दोंमें तालावमें छोड़ देनेपर विल्कुल भीग जानेपर भी कपड़ेकी गुड़िया अपनी आकृति को बनाये रक्खेगी, परतु चीनी अथवा नमककी गुड़िया अपने भिन्न आकारको तो खो ही देगी, वह तड़ागमें घुल मिलकर उसीमे विलीन भी हो जायगी।
मेरी समझसे निम्नाङ्कित दो प्रसिद्ध श्लोक हमे उस धरातलपर पहुँचा देते हैं जहाँसे हम, जिन्हें आजकल लोग परस्पर प्रतिकूल, विरोधी और विनाशी समझते हैं, उनमें सामञ्जस्य, समता और एकताका अवलोकन कर सकते हैं।
दृष्टिं ज्ञानमयी कृत्वा पश्येद् ब्रह्ममयं जगत् । देहबुद्ध्या तु दासोऽहं जीवबुद्ध्या त्वदंशकः । आत्मबुद्ध्या त्वमेवाहमिति मे निश्चिता मति ॥
[दायाँ स्तम्भ]
'आँखोंमे ज्ञानाञ्जन लगाकर संसारको ब्रह्ममय देखना चाहिये ।'
'देहबुद्धिसे तो मे दास हूँ, जीवबुद्धिसे आपका अंग ही हूँ और आत्म बुद्धिसे मैं वही हूँ जो आप हैं। यही मेरी निश्चित मति है।'
इसीलिये तो ब्रह्मसूत्रके अध्याय दो, पाद तीनमे आत्माकी परमात्मासे पृथक्ता और उसपर निर्भरता बताकर सूत्रकार कहते हैं—
'आत्मेति तूपगच्छन्ति ग्राहयन्ति च ।' (४ । १ । ३)
इस सूत्रपर भाष्य करते हुए श्रीशङ्कराचार्यजी अन्तमें कहते हैं—
'तस्मादात्मत्वेनेश्वरे मनो दधीत ।'
इस कारण यह मेरा आत्मा ही है, इस प्रकार ईश्वरमे मन लगाना चाहिये ।'
इस दृष्टिकोणके द्वारा सूत्रकारने बादरिको इस मान्यताका कि, मोक्षकी अवस्था मे जीवात्माका मन और इन्द्रियोंसे सम्बन्ध छूट जाता है, जैमिनिके इस मतके साथ कि यह सम्बन्ध उस अवस्थामें भी बना रह सकता है, समन्वय किया है। बादरायण कहते हे कि परमानन्द दो प्रकारका अर्थात् उभयविध होता है।
अभावं बादरिराह ह्येवम् ॥ ४।४।१० ॥ भावं जैमिनिर्विकल्पामननात् ॥ ४।४।११ ॥ द्वादशाहवदुभयविध बादरायणोऽत ॥ ४।४।१२ ॥
श्रीशङ्कराचार्यजी इसपर अपने भाष्यमे स्पष्ट कहते हं—
'बादरायण पुनराचार्योऽत एवोभयलिङ्गश्रुतिदर्शनादुभयविधत्वं साधु मन्यते यदा सशरीरता संकल्पयति, तदा सशरीरो भवति, यदा त्वशरीरता तदाऽशरीर इति । सत्यसंकल्पत्वात्, संकल्पवैचित्र्याच्च ।'
'परंतु बादरायण आचार्य इसीसे उभयलिङ्गकी श्रुति देखनेसे उभय प्रकारको साधु—उचित मानते हे । जब-सशरीरताका सङ्कल्प करता है, तब सशरीर होता हे और जब अशरीरताका सङ्कल्प करता है तब अशरीर होता है, क्योंकि उसका सङ्कल्प सत्य है और सङ्कल्पका वैचित्र्य है।'
ऐसे प्रकरणोके रहते हुए हमारे मध्यकालीन एव अर्वाचीन सभी विवादोंका अन्त हो जाना चाहिये। हमे वास्तविक, अखण्ड, समग्र, प्रगतिशील महान् हिंदूधर्म का ज्ञान प्राप्त कर उसीका अनुगमन करना चाहिये।