भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 99, कुल 832 में से

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पाश्चात्य विद्वानोंपर उपनिषदोंका प्रभाव (लेखक—श्रीयुत बसन्तकुमार चट्टोपाध्याय एम० ए०)

उपनिषदोंके सिद्धान्त इतने गूढ़ और सार्वभौम हैं कि उनका विद्वानोंपर, चाहे वे किसी देशके निवासी और किसी भी धर्मके अनुयायी क्यों न हों, गहरा प्रभाव पड़ा है। किसी दूसरे धर्मग्रन्थको इतर धर्मावलम्बियोंमे ऐसा हार्दिक और अकृत्रिम आदर नहीं प्राप्त हुआ है। हमें यह स्मरण रखना चाहिये कि उपनिषद् हिंदुओंके सर्वश्रेष्ठ धार्मिक ग्रन्थ हैं। प्रत्येक हिंदू चाहे वह वैष्णव, शैव, शाक्त आदि किसी सम्प्रदायका क्यों न हो, उपनिषदोंको सबसे प्रामाणिक ग्रन्थ- के रूपमें अवश्य स्वीकार करता है। प्रत्येक हिंदूके धार्मिक विश्वासका आधार वेद हैं। वे अपौरुषेय हैं, अतएव उनमें भ्रम एव प्रमादकी तनिक भी सम्भावना नहीं की जा सकती। और उपनिषद् वेदोंके सारभाग हैं। वेदोंके ‘संहिता’ एव ‘ब्राह्मण’ भागोंमें अधिकतर छोटे-मोटे देवताओंका और बहुत थोड़े स्थलोंमें परब्रह्मका उल्लेख है, परंतु उपनिषद् तो परब्रह्म, उनके स्वरूप, जीवात्माके स्वरूप, ब्रह्मसाक्षात्कारके उपाय तथा ब्रह्मसाक्षात्कारके बाद जीवात्माकी स्थिति आदिके वर्णन- से भरे पड़े हैं। विदेशी विद्वान् उपनिषदोंमें बहुत-से ऐसे प्रश्नों- का समाधान पाकर चकित रह गये हैं, जिनका उत्तर अन्य धर्मों तथा दर्शनोंमें या तो उन्हें मिला ही न था और यदि मिला भी तो बहुत असंतोषजनक रूपमें। उदाहरणार्थ—ब्रह्म अथवा ईश्वरका स्वरूप क्या है? जीवात्मा किस तत्त्वसे बना है? संसारकी रचना किस तत्त्वसे हुई है? जीवकी स्वर्ग या नरकमें स्थिति कितने कालतक रहती है? उसके बाद क्या होता है? देहकी रचनाके पूर्व भी देहीका अस्तित्व था क्या? कुछ लोग जन्मसे ही सुखी और कुछ जन्मसे ही दुःखी क्यों होते हैं? ये तथा इसी ढंगके कई अन्य प्रश्न ऐसे हैं जो सूक्ष्म- दृष्टिसे दर्शनशास्त्रका अध्ययन करनेवाले प्रत्येक व्यक्तिके मन- मे अवश्य उठते हैं। वेदान्तदर्शनमे इनका इतना पूर्ण वैज्ञानिक एव सतोषप्रद उत्तर हे कि जिसका प्रत्येक जिज्ञासु- के मनपर प्रभाव पड़े बिना रह नहीं सकता। वेदान्तदर्शनकी महिमापर मुग्ध होनेवाले विदेशी विद्वानों- में सबसे पहले थे—अरबदेशीय विद्वान् अल्बेरूनी। ये ग्यारहवीं शताब्दीमें भारतमें आये थे। यहाँ आकर इन्होंने संस्कृत भाषाका अध्ययन किया और उपनिषदोंकी सारस्वरूपा गीतापर ये लट्टू हो गये। यह ज्ञात नहीं कि इन्होंने उपनिषदोंका अध्ययन किया था या नहीं, पर गीताकी जो प्रशंसा इन्होंने की है, उसे उपनिषदोंकी ही तो प्रशंसा समझनी चाहिये। मुगल सम्राट् शाहजहाँका ज्येष्ठ पुत्र दाराशिकोह अपने भाई औरंगजेबके समान कट्टर मुसलमान नहीं था। उपनिषदों- की कीर्ति सुनकर वह इतना प्रभावित हुआ कि उसने कई उपनिषदोंका फारसीमे अनुवाद करा डाला। इस फारसी अनुवादका फ्रांसीसी भाषामे पुनः अनुवाद हुआ। इस फ्रांसीसी अनुवादकी एक प्रति जर्मनीके प्रसिद्ध विद्वान् शोपेनहरके हाथ लगी। समस्त विदेशी विद्वानोंमे इन्होंने इन ग्रन्थोंकी सबसे अधिक प्रशंसा की है। वे कहते हैं—‘सम्पूर्ण विश्वमें उपनिषदोंके समान जीवनको ऊँचा उठानेवाला कोई दूसरा अध्ययनका विषय नहीं है। उनसे मेरे जीवनको शान्ति मिली है। उन्हींसे मुझे मृत्युमें भी शान्ति मिलेगी’।" शोपेनहरके इन्हीं शब्दोंको उद्धृत करते हुए मैक्समूलरने कहा है—‘शोपेनहर- के इन शब्दोंके लिये यदि किसी समर्थनकी आवश्यकता हो तो अपने जीवनभरके अध्ययनके आधारपर मैं उनका प्रसन्नता- पूर्वक समर्थन करूँगा’।" उपनिषदोंमे पाये जानेवाले अद्भुत सिद्धान्तोंका उल्लेख करते हुए शोपेनहरने फिर कहा है—‘ये सिद्धान्त ऐसे हैं जो एक प्रकारसे अपौरुषेय ही हैं। ये जिनके मस्तिष्ककी उपज हैं, उन्हें निरे मनुष्य कहना कठिन है’।" वेद मनुष्यरचित नहीं है—अपितु अपौरुषेय हैं—इस मान्यता- का कैसा अनूठा अनुमोदन है। पाल डायसन (Paul Deussen) नामक जर्मनीके एक अन्य विद्वानने उपनिषदोंका मूलसंस्कृतमे अध्ययन करके उपनिषद् दर्शन (Philosophy of the Upanisads) नामक अपनी प्रसिद्ध पुस्तक- का निर्माण किया। उन्होंने लिखा है कि उपनिषदोंके भीतर, जो दार्शनिक कल्पना है, वह भारतमें तो अद्वितीय है ही,

1 "In the whole world, there is no study so elevating as that of the Upanisads It has been the solace of my life It will be the solace of my death" 2 "If these words of Schopenhauer required any confirmation I would willingly give it as a result of my life long study" 3 "Almost superhuman conceptions whose originators can hardly be said to be mere men"

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