कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 100, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें८६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
[बायाँ स्तम्भ / Left Column]
सम्भवतः सम्पूर्ण विश्वमें अतुलनीय है।¹ डायसनने यह भी कहा कि कांट और शोपेनहरके विचारोंकी उपनिषदोंने बहुत पहले ही कल्पना कर ली थी तथा सनातन दार्शनिक सत्यकी अभिव्यञ्जना मुक्तिदायिनी आत्मविद्याके सिद्धान्तोंसे बढकर निश्चयात्मक और प्रभावपूर्ण रूपमे कदाचित् ही कही हुई हो²।—( उपनिषद् दर्शन Philosophy of the Upanisads ) मैकडानेलने लिखा है—'मानवीय चिन्तनके इतिहासमें पहले पहल बृहदारण्यक उपनिषद्में ही ब्रह्म अथवा पूर्ण तत्त्वको ग्रहण करके उसकी यथार्थ व्यञ्जना हुई है³।' फ्रांसीसी दार्शनिक विक्टर कजिन्स् लिखते हैं, जब हम पूर्वकी और उनमे भी शिरोमणिरूपा भारतीय साहित्यिक एव दार्शनिक महान् कृतियोका अवलोकन करते हैं, तब हमें ऐसे अनेक गम्भीर सत्योका पता चलता है, जिनकी उन निष्कर्षों- से तुलना करनेपर, जहाँ पहुँचकर यूरोपीय प्रतिभा कभी-कभी रुक गयी है, हमे पूर्वके तत्त्वज्ञानके आगे घुटना टेक देना पड़ता है⁴। जर्मनीके एक दूसरे लेखक और विद्वान् फ्रेडरिक श्लेगेल लिखते हैं—"पूर्वीय आदर्शवादके प्रचुर प्रकाशपुञ्जकी तुलनामें यूरोपवासियोंका उच्चतम तत्त्वज्ञान ऐसा ही लगता है, जैसे मध्याह्न-सूर्यके व्योमव्यापी प्रतापी पूर्ण प्रखरतामे टिमटिमाती हुई अनलशिखाकी कोई आदि किरण, जिसकी अस्थिर और निस्तेज ज्योति ऐसी हो रही हो मानो अब बुझी कि तब⁵।"
[दायाँ स्तम्भ / Right Column]
उपनिषदोंके उदात्त विचारोंसे प्रभावित होनेवाले यूरोपके अत्यन्त अर्वाचीन लेखकोंमें ऐल्डूझ हक्सलेका नाम उल्लेखनीय है। उनका शाश्वत दर्शन ( Perennial Philosophy ) उनकी स्वीय अवगतिके अनुसार सनातन धर्मकी ही एक व्याख्या है। उपनिषदोंके 'तत्त्वमसि'—इन शब्दोंने उन्हें अत्यन्त प्रभावित किया है। इनमें उन्हें जो विचार और जो आदर्श मिला है, वह किसी अन्य दर्शनशास्त्रमें नहीं प्राप्त हुआ। पाश्चात्त्य विद्वानोद्वारा उपनिषदोंकी प्रशंसाके विषयमे इस एक बातको समझ लेना आवश्यक है। यद्यपि उन्होंने आत्माकी सार्वभौम सत्ता आदि सत्य सिद्धान्तोंकी सराहना की है पर कुछ विद्वानोने उपनिषदोंके कई अग तथा उपनिषदों- के अङ्गी वेदोंके भी कितने भागोंको नहीं समझ पाया है। इसमे कोई आश्चर्यकी बात नहीं है, क्योंकि वेदोंके सम्यक् ज्ञानके लिये केवल बुद्धि और विद्वत्ताकी ( जो यूरोपीय विद्वानो- को प्राप्त हे ) ही आवश्यकता नहीं हे, वर आध्यात्मिक साधना एव वेदाध्ययनकी परम्परा भी ( जिनका यूरोपीय विद्वानोंके पास अभाव है ) अपेक्षित हे। उन्हें वैदिक मस्कृति की परम्परा- का परिचय नहीं है, और उनके अपने कुछ ऐसे प्राक्-स्थित विचार हैं, जिनके बन्धनमे वे मुक्त नहीं हो पाते। कुछकी तो कर्मकाण्डोके प्रति बड़ी अपधारणा हे तथा यज्ञोके प्रति तो और भी। वैदिक देवताओंकी सत्तामे उन्हे स्वाभाविक ही विश्वास नहीं हो सकता। वैदिक देवताओ एव यज्ञोंके प्रति अपनी अपधारणाका आरोप उन्होने उपनिषदोंके द्रष्टा ऋषियोंमे भी कर डाला है। यद्यपि उपनिषदोमे वैदिक देवताओका उल्लेख भरा हुआ है तथा यह स्पष्ट लिखा है कि यज्ञोके अनुष्ठानसे स्वर्गकी प्राप्ति हो सकती है और उनका निष्काम आचरण करके मनको शुद्ध एव भगवत्साक्षात्कारके योग्य भी बनाया जा सकता है। फिर भी, अनेक यूरोपीय विद्वानोका कथन हे कि उपनिषदोंके ऋपियों को वैदिक देवताओंकी सत्ता अथवा वैदिक यज्ञोंकी फलवत्तामे कोई विश्वास नहीं था। ऐसी उक्तियोंसे वेदोंकी निर्भ्रान्त सत्यताके सिद्धान्तको धक्का लगता है, जहाँसे वैदिक तत्त्वज्ञान और हिंदू धर्मका प्रारम्भ होता है। शोक इस बातका है कि आधुनिक भारतीय विद्वानोंने भी, पाश्चात्यों- के इन विचारोंकी बिना यथार्थताकी उचित परीक्षा किये ही पुनरावृत्ति की है। अतएव अपने उपनिषदोंका ज्ञान प्राप्त
[पाद-टिप्पणियाँ / Footnotes]
1 "Philosophical conceptions unequalled in India, or perhaps anywhere else in the world" 2 "Eternal Philosophical truth has seldom found more decisive and striking expression than in the doctrine of the emancipating knowledge of the Atma" 3 "Brahman or Absolute is grasped and definitely expressed for the first time in the history of human thought in the Brhadaranyaka Upanisad" 4 "When we read the poetical and philosophical monuments of the East, above all those of India, we discover there many truths so profound and which make such a contrast with the results at which the European genius has sometimes stopped that we are constrained to bend the knee before the Philosophy of the East" 5 "Even the loftiest philosophy of the Europeans appears in comparison with the abundant light of oriental idealism like a feeble Promethean spark in the full flood of the heavenly glory of the noonday sun—faltering and feeble and ever ready to be extinguished"