भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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✽ उपनिषदोंमें औदार्य ✽ ८७ करनेके लिये हमें पाश्चात्य विद्वानोंके पास नहीं जाना चाहिये। गुरुकी सहायता लेनी चाहिये, जिसने विदेशी पद्धतिपर स्थापित इस कामके लिये हमे श्रीशकर एव श्रीरामानुज आदि महान् विश्वविद्यालयोंमें नहीं, वर प्राचीन परिपाटीके अनुसार शिक्षा आचार्योंके ग्रन्थोंका अध्ययन करना चाहिये और किसी ऐसे देनेवाली भारतीय संस्थाओंमे उपनिषदोंका ज्ञान प्राप्त किया हो।


उपनिषदोंमें औदार्य (लेखक-महामहोपाध्याय डा० पी० के० आचार्य एम्० ए० (कलकत्ता), पी-एच० डी० (लीडेन), डी-लिट्० (लदन))


'ब्राह्मण' नामक कर्मकाण्डविषयक धार्मिक ग्रन्थ हैं। कर्मकाण्डकी पवित्रता व्यक्त करना ही उनका मुख्य उद्देश्य है। उनमे यज्ञोंके अनुष्ठानकी विधियों तथा वस्तुतत्त्वकी शास्त्रीय, पौराणिक धार्मिक अथवा दार्शनिक व्याख्या दी गयी है। इनमेंसे ब्राह्मणोंका पहला विषय कर्मकाण्ड है और दूसरा ज्ञानकाण्ड। पिछला भाग ब्राह्मणोंके अन्तमें आरण्यक नामसे जोड़ा गया है। आरण्यकोंका अध्ययन वानप्रस्थाश्रममें वनमें जाकर करनेका है, गाँवोंमें नहीं—जहाँ ब्रह्मचारी अपनी शिक्षा आरम्भ करता है तथा गृहस्थ अपने सासारिक कर्त्तव्योंका पालन करता है। वास्तविक ब्राह्मणग्रन्थोंके प्रतिपाद्य विषयसे इन आरण्यकोंका मुख्य विषय भिन्न है। आरण्यकों- में यज्ञानुष्ठानकी विधि और कर्मकाण्डकी व्याख्या नहीं है। इनमें तो यज्ञों और उनके करानेवाले ऋषियोंके दार्शनिक सिद्धान्तका आधिदैविक एव आध्यात्मिक निरूपण है। प्राचीनतम उपनिषदोंमेंसे कुछ तो इन्हीं आरण्यकोंके अन्तर्गत हैं और कुछ उनके परिशिष्ट स्वरूप हैं। और बहुधा आरण्यकों और उपनिषदोंके बीचकी सीमा निर्धारित करना बड़ा कठिन है।

ये ही ग्रन्थ वेदान्त अर्थात् वेदोंके अन्तिम भागके नाममे प्रसिद्ध हुए। यह नाम पड़नेका एक कारण यह है कि इनमेंसे अधिकांशकी रचना पीछेकी है और समयकी दृष्टिमे उनका स्थान वैदिक कालके अन्तमें पड़ता है। दूसरे, जिन गूढतम रहस्यों तथा आधिदैविक एव दार्शनिक सिद्धान्तोका आरण्यकों और उपनिषदोंमे प्रतिपादन हुआ है, उनका अध्ययन- अध्यापन स्वाभाविक ही शिक्षा-कालके अन्तिम भागमे होता था। तीसरे, वेदपाठके अन्तमें इनके पाठको एक पवित्र और धार्मिक कर्तव्य माना गया है। चौथे, पीछेके दार्शनिकोंको उपनिषदोंके सिद्धान्तोंमें वेदोंका अन्त नही, वर उनका चरम तात्पर्य दिखायी दिया।

आरण्यकों और उपनिषदोंकी भाषा प्राचीन लौकिक संस्कृतसे बहुत मिलती-जुलती है। वेदों और ब्राह्मणोंकी भाँति इन्हे स्वरसहित पढनेका विधान नही है। भाषाकी दृष्टिसे प्राचीनतम उपनिषदोंका स्थान ब्राह्मणो एव सूत्रग्रन्थोंके मध्यमें आता है।

कालकी दृष्टिसे उपनिषदोंको चार वर्गोंमे विभक्त किया गया है। जो इनमे सबसे पुराने हैं, उनको तो ईस्वी सन्- से ६०० वर्ष पहलेका माना जाता है, क्योंकि बौद्धधर्मने उनके कुछ मुख्य सिद्धान्तोंको आधाररूपमे मान लिया है। कालकी दृष्टिसे सबसे प्राचीन वर्गमें आनेवाले उपनिषद् हैं,— बृहदारण्यक, छान्दोग्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय और कौषीतकि— ये गद्यमे हे, जिनकी शैली ब्राह्मणोकी शैलीकी भाँति ही अपरिष्कृत है। दूसरी श्रेणीमें कठ, ईश, श्वेताश्वतर, मुण्डक और महानारायणमे गिना जाता है। ये सब पद्यमय हैं। केन—जिसका कुछ अश गद्यमय है और कुछ पद्यमय—इन दोनों श्रेणियोंके बीचका है। इनमें उपनिषदोंका सिद्धान्त विकासोन्मुख अवस्थामे नहीं है वर विकसित होकर स्थिर हो गया है। तीसरी श्रेणीके प्रश्न, मैत्रायणीय और माण्डूक्य उपनिषदोंकी भाषा फिर गद्यमय हो गयी है, पर पहली श्रेणी- के उपनिषदों जैसी अपरिष्कृत नहीं है और प्राचीन लौकिक सस्कृतके अधिक निकट है। चौथी श्रेणीमें परकालीन अथर्ववेदीय उपनिषदोंकी गणना है। इनमेंसे कुछ गद्यमें हैं और कुछ पद्यमे।

सबसे पीछेके उपनिषदोंका, जिनकी सख्या दो सौसे अधिक है, वर्गीकरण उनके प्रयोजन और विषयके अनुसार किया गया है—(१) सामान्य वेदान्त-उपनिषद्, जिनमे वेदान्तके सिद्धान्तोंका वर्णन है, (२) योगकी शिक्षा देनेवाले योग उपनिषद्, (३) सन्यासकी प्रशसा करनेवाले सन्यास उपनिषद्, (४) विष्णुके महत्त्वका प्रतिपादन करने- वाले वैष्णव-उपनिषद्, (५) शिवके महत्त्वका प्रतिपादन करनेवाले शैव उपनिषद्, (६) शाक्तोंके शाक्त-उपनिषद् तथा