भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 102

८८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * इतर सम्प्रदायोंके अन्यान्य उपनिषद्, इनमें सर्वसमन्वयता है। योग तथा अन्य उपायोंसे ये सभी ब्रह्मविद्याका ही उपदेश करते हैं, इस दृष्टिसे इनकी उदारता अस्फुट रूपसे वर्तमान है ही। इन उपनिषदोंमेंसे कुछ गद्यमय हैं, कुछमें गद्य पद्य दोनोंका मिश्रण है और कुछमे पुराणोंकी शैलीके श्लोक है। प्रथम श्रेणीके ऐतरेयोपनिषद्में तीन छोटे छोटे अध्यायोंमें उपनिषदोंकी शिक्षाका सारांश दिया गया है। पहले अध्याय- में संसारकी उत्पत्ति आत्मासे (जिसे ब्रह्म भी कहा है) मानी गयी है। और मनुष्योंको आत्माकी सर्वोत्कृष्ट अभिव्यक्ति बताया है। यह वर्णन ऋग्वेदके पुरुषसूक्तके आधारपर है, पर उपनिषद्में विराट् पुरुषका जन्म उस जलसे होना बताया गया है, जिसकी सृष्टि आत्माके द्वारा हुई है। मानव शरीरमें आत्माके तीन आवसथ अर्थात् निवासस्थल बताये गये हे— इन्द्रिय, मन और हृदय, जिनमें वह आत्मा क्रमशः जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्तिनामक अवस्थाओंमें वर्तमान रहता है। दूसरे अध्यायमें आत्माके त्रिविध जन्मका वर्णन है। आवा- गमनका अन्त मोक्षमें होता है। परमधाममें शाश्वत निवासका नाम मोक्ष है। आत्मस्वरूपका निरूपण करनेवाले अन्तिम अध्यायमें 'प्रज्ञान' को ब्रह्म कहा है। उपनिषदोंके सिद्धान्तोंमें जो नये से-नया विकास हुआ है, प्राय. उस सबका सारांश गौड़पादकी कारिकाने अपने चार प्रकरणोंमें प्रस्तुत कर दिया है। 'जैसे यूनानी दार्शनिक प्लेटोने पामेनिडीजकी शिक्षाओं- को एक व्यवस्थित रूप प्रदान किया, उसी प्रकार गौड़पादके सिद्धान्तोंको एक निश्चित मतवादका रूप प्रदान करनेका श्रेय यदि किसीको दिया जा सकता है तो श्रीशङ्कराचार्यको। श्रीशङ्कराचार्य (८०० ई०), जिन्होंने वेदान्तपर प्रसिद्ध भाष्यकी रचना की है, गोविन्दभगवत्पादके शिष्य थे, जिनके आचार्य ये ही गौड़पाद प्रतीत होते हैं। शङ्करका मत मुख्य रूपसे वही है, जो गौड़पादका है और बहुतसे विचार तथा रूपक, जिनकी झलक गौड़पादके ग्रन्थमें मिलती है, शङ्करके भाष्योंमें बार-बार आये हैं। गौड़पादकी कारिकाके चारों प्रकरण उपनिषदोंकी चारों श्रेणियोंके रूपमें गिने जाते हैं। पहला प्रकरण तो एक प्रकार- से माण्डूक्योपनिषद्का ही छन्दोबद्ध अनुवाद है। उसमें जो विलक्षण बात कही गयी है, यह है कि जगत् न तो माया है, न किसी प्रकारका परिणाम ही है, अपितु यह ब्रह्मका स्वभाव ही है—ठीक उसी प्रकार, जैसे ज्योति स्वरूप सूर्यकी किरणें सूर्यसे भिन्न नहीं होतीं। दूसरे प्रकरणका नाम वैतथ्य- प्रकरण है, उसमें जगत्‌को सत्य माननेवाले सिद्धान्तके मिथ्यात्वका प्रतिपादन है। जैसे अन्धकार रहनेपर रज्जुमे सर्पका भ्रम होता है, उसी प्रकार अज्ञानरूप अन्धकारसे आवृत आत्माको भ्रमसे जगत् मान लिया जाता है। तीसरा अद्वैत प्रकरण है। घटाकाश और महाकाशके दृष्टान्तसे जीवात्मा- के साथ परमात्माकी एकताको समझाया गया है। ग्रन्थकारने सृष्टिकी उत्पत्ति और नानात्मवादके सिद्धान्तका खण्डन किया है। 'सतो जन्म' सम्भव नहीं, क्योंकि ऐसा होनेसे जो पहलेसे वर्तमान है उसीका जन्म मानना पड़ेगा, और 'असतो जन्म' भी सम्भव नहीं, क्योंकि जो वन्ध्यापुत्रकी भाँति है ही नहीं, उसका जन्म कहाँसे होगा। अन्तिम प्रकरणका नाम 'अलातशान्ति' है। इसमे सृष्टिकी उत्पत्ति और नानात्व- की संसारमें कैसे प्रतीति होती है, इसको समझानेके लिये एक नये ढङ्गकी उपमाका प्रयोग किया गया है, यदि एक छड़ीको, जिसका एक छोर जल रहा हो, इधर-उधर घुमाया जाय तो उस जलते हुए छोरमे बिना किसी वस्तुका संयोग किये अथवा उसमेसे कोई नयी वस्तु प्रकट हुए बिना ही अनलरेखा अथवा अनल-वृत्त बन जायगा। उस अनलरेखा या वृत्त- का अस्तित्व केवल विज्ञानमे है। इसी प्रकार जगत्‌के असंख्य रूप विज्ञानके स्पन्दनमात्र हे और वह विज्ञान एक हे। आत्माके स्वरूपका निरूपण ही उपनिषदोंका मुख्य विषय है। ऋग्वेदके पुरुषसे आत्मातक तथा स्रष्टा पुरुष प्रजापतिसे सम्पूर्ण जगत्‌के निर्विशेष कारणतक जो विकासकी परम्परा दृष्टिगोचर होती है, उपनिषदोंका आत्मा उसकी अन्तिम सीमा है। उपनिषदोंके सिद्धान्तोंका उपदेश करनेका अधिकारी किन्हें समझा गया, इसपर विचार करनेसे भी उनकी उदारता- का सङ्केत मिलता है। कतिपय अपवादोंको छोड़कर यज्ञोंके ऋत्विज् तथा वैदिक मन्त्रोंके ऋषि प्राय. ब्राह्मण ही होते थे, किंतु उपनिषदोंके अनेक स्थलोंसे यह सिद्ध होता है कि वैदिक कालके बौद्धिक जीवन एव साहित्यिक क्षेत्रसे क्षत्रिय जातिका घनिष्ठ सम्बन्ध था। कौषीतकिब्राह्मण (२६।५) में प्रतर्दन नामके राजाका यज्ञोंके विषयमे ऋत्विजोंके साथ प्रश्नोत्तर होता है। शतपथब्राह्मणमे राजा जनकका बार बार उल्लेख आया है, वे अपने शास्त्रीय ज्ञानसे सारे ऋत्विजों को चकित कर देते हे। वह स्थल, जहाँ जनक ऋत्विज् बने हुए श्वेतकेतु, सोमशुष्म एव याज्ञवल्क्यसे अग्निहोत्र विधिके विषयमे प्रश्न करते हैं, सुप्रसिद्ध एव उपदेशपूर्ण है। तीनोंमेंसे कोई मतोप- जनक उत्तर नहीं दे पाता। फिर भी याज्ञवल्क्यको जनकसे