कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
पृष्ठ 103, कुल 832 में से
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- उपनिषद् और अद्वैतवाद * ८९ सौ गौएँ प्राप्त होती हैं, क्योंकि उन्होंने यज्ञके अर्थपर सबसे गहरा विचार किया है, यद्यपि जनकके कथनानुसार अग्निहोत्रका वास्तविक अर्थ अभी याज्ञवल्क्यको भी नहीं खुल पाया था । उपनिषद्के अनुसार राजा ही नही, वर स्त्रियाँ भी, यहाँ- तक कि सन्दिग्ध वर्णके लोग भी साहित्यिक एव दार्शनिक प्रतिद्वन्द्विताओंमे भाग लेते थे और बहुधा ज्ञानकी पराकाष्ठा- को पहुँचे रहते थे । उदाहरणार्थ—बृहदारण्यकोपनिषद्मे गार्गी विस्तारपूर्वक याज्ञवल्क्यसे समस्त जगत्के कारणके विषय- में प्रश्न करती है । यहाँतक कि याज्ञवल्क्यको कहना पड़ता है—'गार्गी ! अतिप्रश्न मत करो, प्रश्नकी सीमाको मत लाँघो, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारा सिर फट जाय । सचमुच परमात्म- तत्त्वके विषयमें किसीको अतिप्रश्न नहीं करना चाहिये ।' [ज]बालाके पुत्र सत्यकामकी कथा और भी तत्त्वपूर्ण है । उसने [अ]पनी मासे पूछा—'मै एक ब्राह्मण आचार्यके यहाँ ब्रह्मचारी [हो]कर रहना चाहता हूँ, परंतु वे निम्न जातिके शिष्योको ग्रहण [न]हीं करते । मा ! मै किस गोत्रका हूँ ?' माताने उत्तर दिया— [व]त्स ! मुझे तो गोत्रका पता नही । युवावस्थामे जब मै परिचारिकावृत्तिका अवलम्बन करके इधर-उधर रहा करती थी, भी तुम मेरे गर्भमे आ गये थे । अपने गुरुसे कहो कि तुम सत्यकाम जाबाल (जवालाके पुत्र ) हो ।' आचार्य गौतम हारिद्रुमत अपने भावी शिष्यकी इस स्पष्टवादितापर प्रसन्न हुए और बोले—एक सच्चे ब्राह्मणके सिवा कोई दूसरा इस प्रकार नहीं कह सकता । सोम्य ! जाओ, समिधा ले आओ । मै तुम्हें दीक्षा दूँगा । तुम सत्यसे विचलित नहीं हुए हो ।' उपनिषदोंमें यह बार-बार आया है कि पराविद्याकी प्राप्तिके लिये ब्राह्मणलोग क्षत्रियोंके उपसन्न हुए हैं । उदाहरणार्थ— श्वेतकेतुके पिता गौतम ब्राह्मण परतत्त्वविषयक उपदेशके लिये राजा प्रवाहणके समीप जाते हैं । इस प्रकार जब कि, ब्राह्मणलोग अन्धश्रद्धासे प्रेरित होकर यज्ञके अनुष्ठानमें लगे थे, इतरवर्णोके लोग उन महत्तम प्रश्नोंपर विचार करने लगे थे, जिनका उपनिषदोंमें जाकर बड़ी सुन्दरतासे समाधान हुआ है । मानव-चिन्तनाके इतिहासमें उपनिषदोंका बड़ा महत्त्व है । उपनिषदोंके गूढ सिद्धान्तोंसे लेकर ईरानके सूफी मततक, नवप्लैटानिकों तथा अलेक्जैंड्रियन क्रिश्चियनके रहस्यमय थियोसाफिकल 'लोगोस'के सिद्धान्ततक और ईसाई रहस्यवादी एरवार्ट एव टालरके उपदेशोंतक और अन्ततोगत्वा १९वीं शताब्दीके महान् रहस्यवादी जर्मन विचारक शोपेनहरके दर्शनतक चिन्तनकी एक ही धारा अनुस्यूत है । उपनिषद् और अद्वैतवाद ( लेखक—पं० श्रीरामगोविन्दजी त्रिवेदी, वेदान्तशास्त्री ) ‘वेदान्तसार’में सदानन्द योगीन्द्रने लिखा है— वेदान्तो नाम उपनिषद्वप्रमाणं तदुपकारीणि शारीरक- सूत्रादीनि च । अर्थात् मुख्य और गौणके भेदसे 'वेदान्त' शब्दके दो अर्थ हैं—'वेदका अन्त वेदान्त है', इस व्युत्पत्तिके अनुसार वेदान्त शब्दका मुख्य अर्थ उपनिषद् है और उपनिषद्के अर्थबोधके अनुकूल अथवा उसमे सहायक शारीरकसूत्र आदि तथा उपनिषदर्थ-संग्राहक भागवत-गीता आदि गौण अर्थ है । अतः प्रमुख वेदान्त उपनिषद्को ही जानना चाहिये । वेद-भाष्यमें आपस्तम्ब ऋषिका यह वचन उद्धृत है— ‘मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् ।’ अर्थात् मन्त्र और ब्राह्मण—इन दो भागोंमें वेद विभक्त है । इन दोनोंका अन्त उपनिषद् है । कोई उपनिषद् मन्त्र- भागके अन्तर्गत है और कोई ब्राह्मणभागके । शुक्ल यजुर्वेदीय माध्यन्दिन-संहिताका अन्तिम अश ईशावास्योपनिषद् है और कृष्ण यजुर्वेदीय श्वेताश्वतर-सहिता ( जो अप्राप्य है ) का शेष भाग श्वेताश्वतरोपनिषद् है । सामवेदीय कौथुम शाखाके ताण्ड्य वा पञ्चविंश ब्राह्मणके अन्तिम आठ भाग छान्दोग्योपनिषद् हैं और शुक्ल यजुर्वेदीय काण्वसहिताके शत- पथब्राह्मणके शेष छः अध्याय बृहदारण्यकोपनिषद् है । इसी प्रकार सभी उपनिषदें वेदके अन्तिम भाग हैं । यहाँ अब यह भी सन्देह नहीं रह जाता कि उपनिषदें वेद है । वस्तुत. उपनिषदें वेद और वेदान्त दोनों हैं । इसीसे उपनिषदोंका इतना महत्त्व है । मन्त्रभागीय उपनिषदोंमें मन्त्र-स्वर और ब्राह्मणभागीय उपनिषदोंमें ब्राह्मण-स्वर रहते हैं और इसीके अनुसार इनका अध्ययन भी किया जाता है । स्वर-विशेषके अनुसार ही अर्थ- विशेष किया जाता है । आचार्य शङ्करने ऐसा ही किया है । यही शिष्ट-प्रणाली भी है । प्रायः सारे वैदिक-साहित्यका अर्थ स्वराधीन ही होता है । स्वरमुक्तिवादी एक वैदिक सम्प्रदाय भी है ।