कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 104, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें'९० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
[बायाँ स्तम्भ]
वेदान्ताचार्योने आगे चलकर वेदान्तशास्त्रको तीन प्रस्थानोमें विभक्त किया है—श्रुति, स्मृति और न्याय । उपनिषद्भाग श्रुति प्रस्थान है, भागवत, गीता, सनत्सुजात-सहिता आदि स्मृति प्रस्थान हैं और ब्रह्मसूत्र आदि न्याय-प्रस्थान हैं ।
वेदका ज्ञानकाण्ड होनेसे उपनिषद्को ब्रह्मविद्या कहा जाता है । ब्रह्मविद्या ही पराविद्या वा श्रेष्ठविद्या है । उपनिषदों-मे जो ब्रह्मविषयक विज्ञान प्रतिपादित किया गया है, वही पराविद्या है । शेष कर्मविषयक विज्ञान अपराविद्या है । इसे कर्म-विद्या भी कहते है । कर्मविद्या तत्काल फल नही देती, कालान्तरमें उसका फल मिलता है । कर्मफल विनाशी भी होता है । इसके विपरीत ब्रह्मविद्या तत्काल फल देती है और यह फल अविनाशी होता है । इसीलिये ब्रह्मविद्या श्रेष्ठ है । यही ब्रह्मविद्या मुक्तिका एकमात्र कारण है । कर्मविद्या मुक्ति-का कारण नहीं है, हॉ, ब्रह्मविद्याकी प्राप्तिमें हेतु अवश्य है । इसीलिये कहा गया है कि, 'जो ब्रह्मविद्या अथवा आत्मतत्त्वज्ञान नहीं जानता, वह परमात्माको नहीं जान सकता'—
'नावेदविन्मनुते तं बृहन्तम् ।'
'जो वेदका ज्ञाता नहीं है, वह उस ब्रह्मको नही समझ सकता।' उपनिषद् वेद है, यह पहले ही कहा गया है ।
श्रीशङ्कराचार्यके मतसे अद्वैतवाद ही सारी उपनिषद्दोंका तात्पर्य है । एक ब्रह्म ही परमार्थ सत्य है । दृश्यमान जगत् परमार्थ सत्य नहीं है, सपनेमे देखे गये पदार्थकी तरह मिथ्या है, जीवात्मा और ब्रह्म एक ही हैं, दो नहीं । यही उपनिषत्सिद्धान्त है । इसी सिद्धान्तको एक श्लोकार्द्धमें कहा गया है—
श्लोकार्डेन प्रवक्ष्यामि यदुक्त ग्रन्थकोटिभि । ब्रह्म सत्य जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापर. ॥
परंतु शङ्कराचार्यसे विरुद्ध मत रखनेवाले वैष्णवाचार्य कहते हैं कि 'द्वैतवाद ही प्राचीन सिद्धान्त है, अद्वैतवाद तो नवीन सिद्धान्त है, जिसके जन्मदाता शङ्कराचार्य हैं। इनके पहले अद्वैतवाद था ही नहीं।' परतु बात ऐसी नहीं है । अद्वैतवाद प्राचीन ही नहीं, प्राचीनतम वाद है । ऋग्वेदके प्रसिद्ध 'नासदीय सूक्त'मे अद्वैतवादका ही उल्लेख है, वहाँ द्वैतवादका तो कहीं नाम लेश भी नहीं है । छान्दोग्योपनिषद् (६।२।१) और बृहदारण्यकोपनिषद् (४।४।१९) में स्पष्ट ही अद्वैतवादका वर्णन है । साख्यसूत्रों (१ । २१–२४ और ३ । २ । ८ और १९) में अद्वैतवाद ही वेदान्तमत
[दायाँ स्तम्भ]
माना गया है । 'न्यायसूत्र'के 'तदत्यन्तविमोक्षोऽपवर्ग' सूत्रके भाष्यमें भी अद्वैतवाद ही वेदान्त सिद्धान्त स्वीकृत हुआ है । कविवर भवभूतिकी भी—
'एको रस करुण एव विवर्त्तभेदात ।'
तथा—
'ब्रह्मणीव विवर्ताना क्वापि विप्रलय. कृत ।।'
—अनेक उक्तियोंमे अद्वैतवादका सिद्धान्त ही उपलब्ध होता है । पुराणोंमे तो जहाँ कही भी वेदान्तका उल्लेख है, वहाँ अद्वैतवादके सिद्धान्तका ही प्रतिपादन है । 'सूत-सहिता' और 'योगवासिष्ठ'—जैसे प्राचीन ग्रन्थोंमें अद्वैतवाद भरा पड़ा है । 'नैषधचरित' ( २१। ८८ ) मे तो बुद्धको भी 'अद्वयवादी' कहा गया है । शान्तरक्षितके 'तत्त्व-सग्रह' ( ३२८ । १२९ ) मे अद्वैतवादका उल्लेख है । दिगम्बराचार्य सामन्तभद्रने 'आप्तमीमासा' ( २४ श्लोक ) में अद्वैतवादकी चर्चा की है । स्थानसङ्कोचके कारण इस प्रकारकी उक्तियोका यहाँ अधिक उल्लेख नहीं किया जा सकता । मुख्य बात यह समझिये कि अद्वैतवाद अत्यन्त प्राचीन सिद्धान्त है और अनेक आचार्योंके मतसे तो यह अनादि सिद्धान्त है ।
परंतु अद्वैतवादके विरोधी अपने पक्षके समर्थनमे कठोपनिषद्का यह मन्त्र उपस्थित करते हे—
ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहा प्रविष्टौ परमे परार्द्धे । छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेता ॥
'इस शरीरम एक अपने कर्मका फल भोग करता है और दूसरा भोग कराता हे । दोनो ही हृदयाकाश और बुद्धिमे प्रविष्ट हे । इनमें एक ( जीवात्मा ) ससारी हे, दूसरा ( परमात्मा ) अससारी है । इसीलिये ब्रह्मज्ञाता और गृहस्थ इन दोनोंको छाया और आतप ( धूप ) के समान विलक्षण कहते ह ।'
अद्वैतवादके खण्डनम दूसरा प्रमाण यह दिया जाता है—
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते । तयोरन्य. पिप्पल स्वाद्वत्त्य- नश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥ (मुण्डक० ३ । १ । १)
अर्थात् 'सहचर और सखा दो पक्षी एक वृक्षका आश्रय