कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 105, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें- उपनिषद् और अद्वैतवाद * \hfill ९१
[बायाँ स्तम्भ]
करके रहते हैं । इनमेंसे एक नानाविध फलका भक्षण करता है और दूसरा कुछ नहीं खाता, केवल देखता है।'
इस मन्त्रसे स्पष्ट जाना जाता है कि यह शरीर वृक्ष है और जीवात्मा तथा परमात्मा पक्षी हैं । सुख दुःख-भोग ही फल भक्षण है ।
द्वैतवादी कहते हैं कि जीवात्मा और परमात्मा एक नहीं हैं, परस्पर भिन्न हैं—इस विषयमें उक्त दोनो मन्त्र अकाट्य प्रमाण हैं। द्वैतवादके समर्थनमे इन मन्त्रोंसे बढकर उत्कृष्ट प्रमाण नहीं मिल सकता—किसी भी उपनिषद्में इन मन्त्रोंके समान द्वैतवादका स्पष्ट समर्थन नहीं ह। अवश्य ही ऊपरसे देखने सुननेमे ऐसा ही विदित होता है, परन्तु जरा गहराईमें उतरकर विचार करनेपर ज्ञात होता है कि इन मन्त्रोंमे न तो द्वैतवादका समर्थन ही है, न अद्वैतवादका खण्डन ही है । क्यों और कैसे ? नीचेकी पङ्क्तियाँ पढ़कर पाठक ही निर्णय करेंगे।
अद्वैतवादी भी द्वैत प्रपञ्चका सर्वांशतः अपलाप नहीं करते । वे भी शास्त्र मानते हैं, गुरु शिष्यरूपमे आत्मविद्या- का अनुशीलन करते हैं, सत्त्व शुद्धिके लिये कर्म करते हैं और चित्तकी एकाग्रताके लिये उपासना करते हैं । वे उपास्य- उपासकरूपसे जीव ब्रह्मका औपाधिक भेद स्वीकार करते हैं और आत्मसाक्षात्कारके लिये योगमार्गका आश्रय ग्रहण करते हैं । वे केवल द्वैत-प्रपञ्चकी सत्यता और पारमार्थिकताको स्वीकार नहीं करते । वे कहते हैं—'यह द्वैत प्रपञ्च व्यावहारिक और मायामय है तथा अद्वैत ही पारमार्थिक सत्य है ।' इसलिये अद्वैतवादियोंके मतमे भी उपनिषदोंमे द्वैत-प्रपञ्चका उल्लेख हो सकता है, परन्तु 'द्वैत-प्रपञ्च सत्य है' ऐसा उपदेश किसी भी उपनिषद्का नहीं ह । हाँ, द्वैत प्रपञ्चका मायामयत्व उपनिषदोंमे ही अवश्य ही उपदिष्ट ह । उपनिषद्का स्पष्ट ही आदेश है—'मायाद्वारा परमेश्वर अनेक रूपोंमें दृष्ट होते हैं—
'इन्द्रो मायाभि पुरुरूप ईयते ।'
कठोपनिषद्के 'ऋतं पिबन्तौ' मन्त्रमे आत्माका, उपाधि- भेदमे, जीवात्मा और परमात्माके रूपमें, भेद प्रतिपादित किया गया है—जीवात्मा और परमात्मा वस्तुतः भिन्न ह, यह नहीं कहा गया है । इस मन्त्रमें भेदका सत्यताबोधक कोई भी शब्द नहीं है। इस मन्त्रका प्रसङ्ग देखनेसे बात स्पष्ट हो जायगी ।
मृत्युने नचिकेताको तीन वर देनेका वचन दिया था ।
[दायाँ स्तम्भ]
इसके अनुसार नचिकेताने प्रथम वरमे पिताकी अनुकूलता माँगी और द्वितीय वरमे अग्निविद्याके लिये प्रार्थना की । दोनों वरोंके मिल जानेपर नचिकेताने पुनः प्रार्थना की, 'कृपया मुझे यह समझा दीजिये कि आत्मा देहेन्द्रियोंसे भिन्न है कि नहीं ।' मृत्युने अनेक प्रलोभन दिखाकर नचिकेताको इस वर-प्रार्थनामे निवृत्त होनेका अनुरोध किया, परन्तु नचिकेता किसी भी प्रलोभनमें नहीं आये—उन्होने एक भी नहीं सुनी । नचिकेताकी निःस्पृहता देखकर मृत्युने उनकी बड़ी प्रशसा की और 'आत्मज्ञान होनेपर परमपुरुषार्थ सिद्ध हो जाता है', यह भी कहा । नचिकेताने कहा—'आत्माका यथार्थ स्वरूप क्या है ?' इसके उत्तरमे मृत्युने आत्माकी देहेन्द्रियभिन्नता बतायी और आत्माके यथार्थ स्वरूपकी व्याख्या की । 'आत्मा क्योंकर अपने यथार्थ स्वरूपको जान सकता है', यह भी मृत्युने बताया । नचिकेताके प्रश्नके उत्तर- मे 'ऋतं पिबन्तौ' मन्त्र मृत्युकी उक्ति है ।
नचिकेताने पूछा था जीवात्माका विषय । तब मृत्यु परमात्माका विषय कैसे कहने लगते ? यह तो अप्रासङ्गिक होता । जीवात्माका यथार्थ स्वरूप परमात्माके यथार्थ स्वरूपसे भिन्न नहीं है; जीवात्मा और परमात्मा एक ही हैं, केवल उपाधिभेदसे, घटाकाश, मठाकाश आदिकी तरह दोनोंका भेद मालूम पड़ता है । जीवात्माका संसारीपन अविद्याकृत है, अविद्याके अभावके कारण परमात्मामें संसारीपन नहीं है— इन्हीं अभिप्रायोंसे नचिकेताके जीवात्मविषयक प्रश्नके उत्तर- मे मृत्युने जीवात्मा और परमात्माकी बात कही । नचिकेता- का प्रश्न यह है—
येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये- ऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके । एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वरस्तृतीय ॥ \hfill ( कठ० १ । १ । २० )
'कोई कहता है, मृत्युके अनन्तर भी देहातिरिक्त आत्माका अस्तित्व रहता है और कोई कहता है, नहीं । यह भारी संशय है । तुम्हारे उपदेशसे मैं इसे जानना चाहता हूँ । यह मेरा तीसरा वर है ।'
इसका उत्तर पानेके पहले ही नचिकेता परमात्मविषयक एक और असङ्गत प्रश्न कैसे कर बैठते ? मृत्यु तो इसी प्रश्न- को जटिल समझते थे । इसी बीच परमात्मसम्बन्धी एक अन्य महान् विकट प्रश्न कैसे किया जा सकता था ? मृत्युने