कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 106, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें९२ * महान्तं विभुमात्मानं म्.त्वा धीरो न शोचति *
[Left Column] उक्त प्रश्नको ही सुनकर उत्तर देनेमें बड़ी आनाकानी की । मृत्युने स्पष्ट ही कहा—'यह दुर्विज्ञेय है, देवोंको भी इस विषयमें सन्देह हो जाता है । इसलिये इसके उत्तरके लिये आग्रह मत करो—दूसरा वर माँगो ।' इस तरह मृत्युने उत्तर देनेमें बड़ी आपत्ति की, प्रलोभनतक दिखाकर अन्य वर माँगनेका बहुत तरहसे अनुरोध किया । परंतु नचिकेता जरा भी विचलित नहीं हुए । उन्होंने स्पष्ट ही कहा—'जिस विषयमें देवता भी सन्दिहान हैं और जो दुर्विज्ञेय है, उम विषयमें तुम्हारे समान न तो कोई उत्तरदाता ही मिलेगा, न इसके बराबर कोई दूसरा वर ही होगा। इसलिये चाहे यह वर कितना भी दुर्विज्ञेय हो, इसके सिवा मैं अन्य वर नहीं माँग सकता ।' मृत्युने नचिकेताकी दृढता और लोभशून्यता देखकर उनकी, उनके प्रश्नकी और आत्मतत्त्वज्ञानकी प्रशंसा की । अनन्तर नचिकेताने आत्माका परमार्थ-स्वरूप जानना चाहा । आत्माके यथार्थ रूपको जाननेका अनुरोध करना, प्रकारान्तरसे, पूर्व प्रश्नका व्याख्यानमात्र है । वह इस प्रकार कि आत्माके देहादि स्वरूप होनेपर मृत्युके पश्चात् आत्माका अस्तित्व नहीं रह सकता और देहादिसे भिन्न होनेपर मरणानन्तर भी आत्माका अस्तित्व रह सकता है । परंतु नचिकेताकी यथार्थ आत्मस्वरूपकी जिज्ञासा परमात्मविषयक प्रश्न है, यह कल्पना नितान्त अलीक है। कारण, मृत्यु प्रार्थित वरको दुर्विज्ञेय कहकर उत्तर प्रदान करनेमें ही जब कि आपत्ति करते हैं, तब नचिकेताका एक अन्य दुर्विज्ञेय प्रश्न कर बैठना असम्भव है—यह बात पहले ही लिखी जा चुकी है। मृत्युने जिस प्रकार नचिकेताको उत्तर दिया है, उसकी सूक्ष्मताया परीक्षा करनेपर स्पष्ट ही ज्ञात होता है कि, जीवात्मा और परमात्मा एक ही हैं, भिन्न नहीं; मृत्युको यही अभिप्रेत है । आगे दिये जानेवाले उत्तरके आरम्भमें मृत्युने कहा है— सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपाᳪसि सर्वाणि च यद् वदन्ति । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदᳪ सग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ( कठ० १ । २ । १५ ) 'जिस पदका प्रतिपादन सारे वेद करते हैं, जिस पद-प्राप्तिका साधन सारी तपस्याएँ हैं और जिस स्थानकी प्राप्तिके लिये ब्रह्मचर्यका पालन किया जाता है, मैं संक्षेपसे वही पद कहता हूँ । वह है ओंकार ।' ओंकार ईश्वरका नाम और प्रतीक है । श्रुतिका यही मत है । योगी याज्ञवल्क्यने कहा है—
[Right Column] 'वाच्यः स ईश्वर प्रोक्तो वाचक प्रणव स्मृत. ॥' 'प्रणव या ओंकार परमात्माका प्रतिपादक है ।'ठीक ऐसा ही योगदर्शनमे पतञ्जलि ऋषिाने भी कहा है—'तस्य वाचक प्रणव ।' आगे चलकर मृत्युने जीवात्मा और परमात्माकी अभिन्नता दिखायी हे । यही उचित उत्तरका क्रम हूं । यदि नचिकेताने जीवात्मविषयक प्रश्नका उत्तर पानेके- पहले ही परमात्मविषयक असङ्गत प्रश्न किया होता, तो मृत्युने जीवात्मविषयक उत्तर देनेके बाद परमात्मविषयक उत्तर दिया होता । तब यह कैसे सम्भव था कि पहले ही परमात्मसम्बन्धी बातें कह दी जातीं और पृथक् रूपसे जीवात्माका उल्लेखतक नहीं होता ? आगे चलकर तो इसी उपनिषद्मे द्वैत-वादका खण्डन भी है— मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किञ्चन । मृत्यो स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥ ( २ । २ । ११ ) 'शास्त्र और आचार्यके द्वारा सुसस्कृत मनमे ही ब्रह्म- की प्राप्ति होती है । इस ब्रह्ममे अणुमात्र भी भेद नहीं है । जो ब्रह्ममे भेद या नानापन देखता है, वह बार-बार मृत्युको प्राप्त होता है ।' कठवल्लीको द्वैतवाद अभीष्ट रहता, तो यहाँ उसका खण्डन क्यों किया जाता ? परस्पर-विरोध कैसे उपस्थित होता ? इसलिये यह निष्कर्ष निकला कि कठोपनिषद्का प्रतिपाद्य अद्वैतवाद हे, द्वैतवाद नहीं । मुण्डकोपनिषद्का 'द्वा सुपर्णा' मन्त्र भी द्वैतवादका प्रतिपादक नहीं हे । यह भी 'ऋतं पिबन्तौ' की तरह ही है । 'द्वा सुपर्णा' मन्त्र जीवात्मा और परमात्माके भेदका 'अकाट्य' प्रमाण तो क्या होगा, साधारण प्रमाण-कोटिमे भी नहीं आता । आश्चर्य है कि द्वैतवादी धीर-गम्भीर शैलीसे इसपर विचार नहीं करते । वस्तुत यह मन्त्र अन्त'करण (सत्त्व) और जीवात्माका प्रतिपादक है। पैङ्गि रहस्यब्राह्मण में इसकी व्याख्या इस तरह की गयी है— 'तयोरन्य पिप्पलं स्वाद्वत्तीति सत्त्वम् अनश्नन्नन्यो- ऽभिचाकशीत्यनश्नन्नन्योऽभिपश्यति क्षेत्रज्ञस्तावेतौ सत्त्व- क्षेत्रज्ञाविति ।' अर्थात् 'तयोरन्य पिप्पलं स्वाद्वत्ति' से सत्त्व वा अन्त - करणका फल भोक्तृत्व कहा गया है। 'अनश्नन्नन्योऽभिचाक-