भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 107

ॐ उपनिषद् और अद्वैतवाद ॐ ९३

श्रोति' से जीवात्माको द्रष्टा कहा गया है। इसलिये यह मन्त्र जीवात्मा और परमात्माका नही—अन्तःकरण और जीवात्माका प्रतिपादक है। इसी ब्राह्मणमे आगे चलकर कहा गया है— 'तदेतत्सत्त्वं येन स्वप्नं पश्यति । अथ योऽय शारीर उपद्रष्टा स क्षेत्रज्ञस्तावेतौ सत्त्वक्षेत्रज्ञाविति ।' 'जिसके ऽद्वारा स्वप्न देखा जाता है उसका नाम सत्त्व वा अन्तःकरण है। जो 'शारीर' वा जीवात्मा द्रष्टा है, उसका नाम क्षेत्रज्ञ है।' अचेतन अन्त करणका भोक्तृत्व कैसे सम्भव है। इसका उत्तर शङ्कराचार्यने यों दिया है— 'नेयं श्रुतिरचेतनस्य सत्त्वस्य भोक्तृत्वं वक्ष्यामीति प्रवृत्ता किन्तर्हि ? चेतनस्य क्षेत्रज्ञस्याभोक्तृत्वं ब्रह्मस्वभावतां च वक्ष्यामीति । तदर्थं सुखादिविक्रियावति सत्त्वे भोक्तृत्व- मद्ध्यारोपयति ।' अर्थात् अचेतन अन्तःकरणका भोक्तृत्व बताना मन्त्रका उद्देश्य नहीं है । चेतन क्षेत्रज्ञका अभोक्तृत्व और ब्रह्म- स्वभावत्वका प्रतिपादन करना ही मन्त्रका लक्ष्य है। इसी अभोक्तापन और ब्रह्मकी स्वभावताको समझानेके लिये क्षेत्रज्ञके उपाधिभूत और सुखादिके विकारसे युक्त अन्तःकरणमें भोक्तृत्वका आरोप किया गया है, क्योकि अन्तःकरण और क्षेत्रज्ञके अविवेकके कारण क्षेत्रज्ञमे कर्तृत्व और भोक्तृत्वकी कल्पना की जाती है। सुखादि विकारोंसे युक्त सत्त्व (अन्तःकरण) में चित्प्रतिबिम्ब पतित होनेपर चित्का भोक्तृत्व मालूम पड़ता है। फलतः वह अविद्याजन्य है, पारमार्थिक नहीं। कदाचित् यहाँ यह लिखनेकी आवश्यकता नहीं कि वेदमन्त्रोका यथार्थ अर्थ समझनेके लिये कितनी धीरता, सावधानता और बहुदर्शिताकी आवश्यकता होती है और इस दिशामें जरा-सी भी त्रुटि कितना बड़ा अनर्थ कर सकती है । वेदवेत्ताओंके मतसे जो वाक्य जीवके ब्रह्मभावका बोधक है वही वाक्य जीव और ब्रह्मके भेदका बोधक मालूम पड़ जाता है—अर्थका अनर्थ उपस्थित कर देता है। इसीलिये वेदमन्त्रोंका रहस्य समझनेवालोंने कहा है— 'बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति ।' अल्पविद्य (नीम हकीम) से वेद इसलिये डरता है कि यह मुझे मार डालेगा । वेदज्ञोंने और भी कहा है— 'पौर्वापर्यापरामृष्ट शब्दोऽन्यां कुरुते मतिम् ।' 'पूर्वापरकी आलोचना नहीं करनेसे शब्द विपरीत अर्थ- बोधका कारण होता है।'

एक बात और । वन्ध्यापुत्र, कूर्मरोम, शशशृङ्ग वा गगन-कमलिनीके समान द्वैत-प्रपञ्चको अद्वैतवादी तुच्छ वा अलीक नहीं कहते । वे केवल इतना ही कहते हैं कि जैसे मनुष्यके निद्रादोषके कारण स्वप्नमे देखा गया पदार्थ मिथ्या है, वैसे ही अविद्यारूप दोषके कारण जाग्रद- वस्थामें देखा गया पदार्थ भी मिथ्या है। एकमात्र ब्रह्म ही परमार्थ सत्य है। ब्रह्मके अतिरिक्त कोई भी पदार्थ 'परमार्थ सत्य' नहीं है, परतु पारमार्थिक सत्ता नहीं होनेपर भी संसारी पदार्थोंकी व्यावहारिक सत्ता और स्वप्नमें देखे पदार्थों- की प्रातीतिक वा प्रातिभासिक सत्ता है। सपनेमें देखे पदार्थ जैसे स्वप्नकालमें यथार्थ मालूम पडते हैं, वैसे ही जागतिक पदार्थ व्यवहार-दशामें यथार्थ ज्ञात होते हैं। ब्रह्मवादियोँने कहा भी है— देहात्मप्रत्ययो यद्वत् प्रमाणत्वेन कल्पित । लौकिकं तद्वदेवेदं प्रमाणं त्वात्मनिश्चयात् ॥ अर्थात् शरीरमें आत्मबुद्धि वस्तुतः मिथ्या है तो भी देह-भिन्न आत्माके जानके पहले सत्य विदित होती है। इसी तरह सारी लौकिक वस्तुओंके मिथ्या होनेपर भी आत्म- निश्चयतक वे सच्ची मालूम पड़ती हैं। 'ज्ञाते द्वैतं न विद्यते'— आत्मतत्त्वज्ञान होनेपर द्वैत नहीं रहता । निष्कर्ष यह है कि व्यवहार-दशामें अद्वैतवादी भी जीवेश्वर-भेद, द्वैत-प्रपञ्च तथा परमात्मा और जीवात्माका उपास्य-उपासक भाव स्वीकार करते हैं । वेदान्तवेत्ताओंने ठीक ही कहा है— मायाख्याया. कामधेनोर्वत्सौ जीवेश्वरावुभौ । यथेच्छ पिबता द्वैत तत्त्व त्वद्वैतमेव हि ॥ 'माया नामकी कामधेनुके दो बछड़े हैं—जीव और ईश्वर । ये दोनों इच्छानुसार द्वैतरूप दुग्धका पान करें, परन्तु परमार्थ-तत्त्व तो अद्वैत ही है।' पारमार्थिक और व्यावहारिक भावोके उदाहरण संसारमें भी देखे जाते हैं। जिसके साथ वास्तविक आत्मीयता नहीं है, उसके साथ भी लोग बाह्य होकर आत्मीयके समान व्यवहार करते हैं। यह केवल व्यावहारिक आत्मीयता है, पारमार्थिक नहीं। अगले मन्त्रमें इस बातको बड़ी स्पष्टतासे कहा गया है— यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति । यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत् केन कं पश्येत् ॥ 'जबतक द्वैत रहता है, तबतक एक दूसरेको देखता