भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 108

९ ९४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * है और जब कि सारे पदार्थ आत्मरूप हो जाते हैं तब कौन किसको देख सकता है ?' मुख्य बात यह है कि अद्वैतवाद और व्यावहारिक द्वैतवाद—दोनों ही वेदसम्मत हैं । इसलिये उपनिषदोंमे उपास्य उपासक-भावसे परमात्मा और जीवात्माका निर्देश रहना कुछ विचित्र बात नहीं है। इससे अद्वैतवादकी कोई हानि भी नहीं है। व्यावहारिक द्वैतावस्था माननेके कारण उपनिषदोंके द्वैतवादी वाक्योंके द्वारा अद्वैतवादका खण्डन नहीं हो सकता । व्यावहारिक द्वैतावस्था अद्वैतावस्थाकी विरोधिनी हो ही नहीं सकती । फलतः अद्वैतवादके सम्बन्धमे द्वैतवादियोंकी आपत्तियाँ निर्मूल हैं और उपनिषदोंके अनुसार अद्वैतवाद ही परमार्थ सत्य है । किसी भी उपनिषद्के किसी भी मन्त्रमे द्वैतवाद परमार्थ सत्य सिद्ध नहीं होता ।

उपनिषदोंका नवीन वैज्ञानिक तथ्य ( लेखक-पण्डित श्रीरामनिवासजी शर्मा )

वस्तुका तत्त्वतः नाश ( Annihilation ) नहीं होता, अपितु उसका रूपान्तर होता है—यह एक आधुनिक सत्य है, किंतु वैदिक ऋषियोंको आजसे बहुत पहले इसका पता था। वे इस बातको अच्छी तरह समझते थे कि वस्तुका आविर्भाव और तिरोभाव ही होता है, न कि नाश ( Annihilation )। उनकी भाषाकी 'जनी' और 'णशू' धातुएँ इस सत्यकी प्रतिपादक हैं, क्योंकि इनका अर्थ क्रमशः आविर्भाव और तिरोभाव ही है। किंतु इसमे एक विशेष और विलक्षण बात भी है, वह यह कि वैदिक ऋषि न केवल तत्त्वत अपितु स्वरूपतः भी प्राकृतिक वस्तुओंका नाश नहीं मानते थे। न केवल व्यष्टि समूहका प्रत्युत समष्टि समूहका भी। यह सत्य 'नारायण और महानारायण उपनिषद्'के निम्नलिखित प्रवचनसे पूर्णतः स्पष्ट होता है— सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् । दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्व ॥ अर्थात् विधाताने सूर्य, चन्द्रमा, द्युलोक, पृथिवी और अन्तरिक्षकी रचना पूर्व सृष्टि क्रमके अनुसार ही की है। उपनिषत्प्राण श्रीमद्भगवद्गीता इस सत्यका समधिक स्पष्टीकरण है। उससे पूर्णतः यह सिद्ध हो जाता है कि वस्तुतः सृष्टि नयी नहीं बनती और न नष्ट ही होती है, प्रत्युत अव्यक्तसे व्यक्त होती है और व्यक्तसे अव्यक्त। उसके अपने शब्द इस प्रकार हैं— अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥ ( गीता २।२८)

छान्दोग्य उपनिषद् भी इसी सत्यको प्रकारान्तरसे इस तरह स्पष्ट करता है— ' प्राकृतिक शक्तियाँ द्युलोकरूप अग्निमें परमाणुरूप साहित्यका हवन करती रहती हैं, जिससे इस निःसीम आकाश प्राङ्गणमे नित्य ही आह्लादजनक विश्व ब्रह्माण्डों और वस्तुओंका प्राग्म्य होता रहता है। प्रत्येक वस्तु अपने अव्यक्तरूपसे व्यक्तरूपमे आती रहती है। यह बृहद् यज्ञ परमात्माकी ओरसे प्रकृति प्रवाहमं सदैव होता रहता है।' यह सृष्टि किन किन तत्त्वों और साधनोसे अव्यक्तमे व्यक्त दशामे आती है—इसकी रूपकालङ्कार-सम्मत सक्षिप्त उपनिषत्तालिका इस प्रकार है— संक्षिप्त तालिका १ द्युलोक ... अग्नि कुण्ड २ द्युलोकस्थ शक्ति • प्रथमाग्नि ३ आदित्य • समिधा ४ हवनीय द्रव्य .. • परमाणु ५ हवन-कर्ता देवता प्राकृतिक शक्तियाँ ६ अध्वर्यु • परमात्म-तत्त्व ७ वसन्त-ऋतु • घृत स्थानीय ८ ग्रीष्म-ऋतु .. समित्स्थानीय ९ शरद्-ऋतु ... हवि १० यज्ञ-नाम • प्राकृतिक यहाँ यह कहते हुए आश्चर्य होता है कि यह उपनिषदात्मक किंतु व्यक्ताव्यक्तविषयक विश्व दुर्लभ सत्य इस समय भी भारतीय घर-आँगनकी वस्तु बना हुआ है। आज भी सन्ध्या- वन्दनके समय कोटि कोटि कण्ठोंसे अघमर्षणमें इस प्रकार दुहराया जाता है—

१ पृथिवीजलतेजोवायुगगनरूपेषु गन्धादिविशेषवस्तुषु जन्तुषु प्राणिषु च । श० म० १ छा० खण्ड ४। महामहोपाध्याय श्रीआर्यमुनिकृत-भाष्य ।