कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
पृष्ठ 109, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 109
- उपनिषदोंका नवीन वैज्ञानिक तथ्य * ९५ ॐ सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् । दिवञ्च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्व ॥ इस तरह हम देखते हैं कि उपलब्ध उपनिषद्वाङ्मय आज भी वैज्ञानिक संसारको यह बता रहा है कि व्यष्टि और समष्टि विश्व न केवल तत्त्वतः अपितु स्वरूपतः भी नाश-रहित है । परंतु यह कहते हुए भी दुःख होता है कि आजके वैदिक विद्वानोंकी दृष्टिमें यह सत्य पूर्णतः स्पष्ट नहीं है, किंतु यह जानकर थोड़ा सन्तोष होता है कि इस सत्यके सक्रिय मर्मको जाननेवाले व्यक्ति अभी सर्वथा नाम-शेष नहीं हुए हैं । आज भी गिरि-गुहाओंमे ऐसे लोग मौजूद हैं जो इस सत्यके क्रियात्मक पक्षको स्वयं भी समझते और दूसरोको भी समझा सकते हैं, ऐसे ही महात्माओंके एक स्वर्गीय शिष्य श्रीस्वामी विशुद्धानन्दजी परमहंस भी थे । उनका भी यह विश्वास था कि वस्तु स्वरूपतः भी विनश्वर नहीं है । न केवल विश्वास, अपितु वे प्रायः एक प्रकारके फूलको दूसरे प्रकारके फूलोंमे परिणत कर दिखाया भी करते थे । वैज्ञानिक शब्दोंमें इसीको इस तरह भी कहा जा सकता है कि— उनमे एक प्रकारके फूलको तिरोहित कर उसमेंसे अव्यक्त नवीन फूलको व्यक्त कर दिखानेका सामर्थ्य था । यही नही, प्रत्युत वे प्राकृतिक विकारों (वस्तुओं) के अनुलोमज और विलोमज दोनों प्रकारोंकी क्रमशः विकासात्मक और लयात्मक प्रक्रियाओंको भी अच्छी तरह समझते थे। साथ ही वे अनुलोमज क्रियात्मक परीक्षणके साथ-साथ विलोमज परीक्षणको भी दिखा सकते थे । इस विषयपर उनके अपने शब्द इस प्रकार है— 'वत्स ! वस्तुके अनुलोमज और विलोमज दोनों प्रकारका विकास और लय सत्य है । उदाहरणार्थ दूधसे दही, दहीसे नवनीत और नवनीतसे घृत उत्पन्न होता है, परंतु घृतमे नवनीत, नवनीतमें दही और दहीमें दूधके उपादान अव्यक्त रूपसे रहते हैं । वास्तविक योगी या वैदिक विज्ञान-वेत्ता इन अदृष्ट उपादानोंको विलोम प्रक्रियासे घृतको नवनीतमें, नवनीतको दहीमें और दहीको दूधमें परिणत कर सकता है । इतना ही नहीं, अपितु योगी दुग्धको भी विलोम क्रियाके द्वारा तृण-राशिमें भी परिवर्तित कर सकता है¹।' स्वामीजी ऐसा कहते ही न थे, प्रत्युत वे योग्य अधिकारियोंको कभी-कभी इस विलोम प्रक्रियाके प्रयोग भी दिखा दिया करते थे । यह सत्य केवल वैदिक ही नहीं है, अपितु दार्शनिक भी है । इसका प्रमाण यह है कि इस सत्यको आजसे बहुत पहले हमारे दर्शनकारोंने भी प्रकारान्तरसे समझने-समझानेकी कोशिश की थी । महर्षि पतञ्जलिने भी अपने पातञ्जल-दर्शनके कैवल्य-पादमें इस विषयको इस तरह स्पष्ट किया है— 'जात्यन्तरपरिणाम प्रकृत्यापूरात् ।' अर्थात् प्रकृतिके आपूरणसे जात्यन्तर-परिणाम होता है, किंतु वह क्यों और कैसे होता है ? इस विषयको उन्होंने निम्नलिखित सूत्रद्वारा समझाया है— 'निमित्तमप्रयोजक प्रकृतीनां वरणभेदस्तु तत क्षेत्रिकवत् ।' तात्पर्य यह है कि धर्मादि निमित्त प्रयोजक कारण उपादान-स्वरूप प्रकृतिको प्रेरित नहीं करते, वे तो केवल प्रकृतिक्स आवरणको ही दूर कर सकते है, परंतु प्रकृति आवरणसे उन्मुक्त होकर स्वतः अपने विकारों—विभिन्न रूपोंमें परिणत होने लगती है । उदाहरणके लिये रजतमें जो स्वर्ण-प्रकृति है, वह आवरणसे आवृत है और रजत-प्रकृति आवरणसे मुक्त है; किंतु यदि स्वर्ण-प्रकृतिका यह आवरण किसी उपायसे हटा दिया जाय तो रजत-प्रकृति तिरोहित हो जायगी और स्वर्ण-प्रकृति-धारामें विकार उत्पन्न करेगी¹ । इस तरह रजत-प्रकृति अव्यक्त स्वर्ण प्रकृतिमे व्यक्त हो जायगी अर्थात् रजत स्वर्णमें बदल जायगा । इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि धर्मादि प्रयोजक कारणसे ही ऐसा होता है, अपितु प्रकृति स्वय भी अपनी लयोन्मुखता और विकासोन्मुखताके कारण क्रमशः अनन्त विकारों और वस्तुओंमें विकासोन्मुख और लयोन्मुख होती रहती है । इसी सत्यको महर्षि व्यासने अपने भाष्यमें इस प्रकार स्पष्ट किया है— 'निमित्तमप्रयोजक प्रकृतीना वरणभेदस्तु तत क्षेत्रिकवत् । न हि धर्मादिनिमित्तं तत्प्रयोजक भवति प्रकृतीनाम्। न कार्येण कारण प्रावर्त्यत इति । कथ तर्हि ? वरणभेदस्तु तत क्षेत्रिकवत् । यथा क्षेत्रिक केदारादपां पूर्णात्के दारान्तरं पिप्लावयिषु समं निम्न निम्नतरं वा नाप पाणिनापकर्षत्यावरणं त्वासा भिनत्ति तस्मिन्भिन्ने स्वयमेवाप केदारान्तरमाप्लावयन्ति तथा धर्म प्रकृतीनामावरणधर्मं भिनत्ति तस्मिन्भिन्ने स्वयमेव प्रकृतय स्व स्वं विकारमाप्लावयन्ति।' महाभारत भी इस सत्यका इस प्रकार समर्थन करता है—
१ श्रीश्रीविशुद्धानन्दप्रसङ्ग । महामहोपाध्याय श्रीगोपीनाथ कविराजकृत । १ म म गो ना द्वारा समर्थित और उदाहृत ।