कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
'९० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
[बायाँ स्तम्भ]
वेदान्ताचार्योने आगे चलकर वेदान्तशास्त्रको तीन प्रस्थानोमें विभक्त किया है—श्रुति, स्मृति और न्याय । उपनिषद्भाग श्रुति प्रस्थान है, भागवत, गीता, सनत्सुजात-सहिता आदि स्मृति प्रस्थान हैं और ब्रह्मसूत्र आदि न्याय-प्रस्थान हैं ।
वेदका ज्ञानकाण्ड होनेसे उपनिषद्को ब्रह्मविद्या कहा जाता है । ब्रह्मविद्या ही पराविद्या वा श्रेष्ठविद्या है । उपनिषदों-मे जो ब्रह्मविषयक विज्ञान प्रतिपादित किया गया है, वही पराविद्या है । शेष कर्मविषयक विज्ञान अपराविद्या है । इसे कर्म-विद्या भी कहते है । कर्मविद्या तत्काल फल नही देती, कालान्तरमें उसका फल मिलता है । कर्मफल विनाशी भी होता है । इसके विपरीत ब्रह्मविद्या तत्काल फल देती है और यह फल अविनाशी होता है । इसीलिये ब्रह्मविद्या श्रेष्ठ है । यही ब्रह्मविद्या मुक्तिका एकमात्र कारण है । कर्मविद्या मुक्ति-का कारण नहीं है, हॉ, ब्रह्मविद्याकी प्राप्तिमें हेतु अवश्य है । इसीलिये कहा गया है कि, 'जो ब्रह्मविद्या अथवा आत्मतत्त्वज्ञान नहीं जानता, वह परमात्माको नहीं जान सकता'—
'नावेदविन्मनुते तं बृहन्तम् ।'
'जो वेदका ज्ञाता नहीं है, वह उस ब्रह्मको नही समझ सकता।' उपनिषद् वेद है, यह पहले ही कहा गया है ।
श्रीशङ्कराचार्यके मतसे अद्वैतवाद ही सारी उपनिषद्दोंका तात्पर्य है । एक ब्रह्म ही परमार्थ सत्य है । दृश्यमान जगत् परमार्थ सत्य नहीं है, सपनेमे देखे गये पदार्थकी तरह मिथ्या है, जीवात्मा और ब्रह्म एक ही हैं, दो नहीं । यही उपनिषत्सिद्धान्त है । इसी सिद्धान्तको एक श्लोकार्द्धमें कहा गया है—
श्लोकार्डेन प्रवक्ष्यामि यदुक्त ग्रन्थकोटिभि । ब्रह्म सत्य जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापर. ॥
परंतु शङ्कराचार्यसे विरुद्ध मत रखनेवाले वैष्णवाचार्य कहते हैं कि 'द्वैतवाद ही प्राचीन सिद्धान्त है, अद्वैतवाद तो नवीन सिद्धान्त है, जिसके जन्मदाता शङ्कराचार्य हैं। इनके पहले अद्वैतवाद था ही नहीं।' परतु बात ऐसी नहीं है । अद्वैतवाद प्राचीन ही नहीं, प्राचीनतम वाद है । ऋग्वेदके प्रसिद्ध 'नासदीय सूक्त'मे अद्वैतवादका ही उल्लेख है, वहाँ द्वैतवादका तो कहीं नाम लेश भी नहीं है । छान्दोग्योपनिषद् (६।२।१) और बृहदारण्यकोपनिषद् (४।४।१९) में स्पष्ट ही अद्वैतवादका वर्णन है । साख्यसूत्रों (१ । २१–२४ और ३ । २ । ८ और १९) में अद्वैतवाद ही वेदान्तमत
[दायाँ स्तम्भ]
माना गया है । 'न्यायसूत्र'के 'तदत्यन्तविमोक्षोऽपवर्ग' सूत्रके भाष्यमें भी अद्वैतवाद ही वेदान्त सिद्धान्त स्वीकृत हुआ है । कविवर भवभूतिकी भी—
'एको रस करुण एव विवर्त्तभेदात ।'
तथा—
'ब्रह्मणीव विवर्ताना क्वापि विप्रलय. कृत ।।'
—अनेक उक्तियोंमे अद्वैतवादका सिद्धान्त ही उपलब्ध होता है । पुराणोंमे तो जहाँ कही भी वेदान्तका उल्लेख है, वहाँ अद्वैतवादके सिद्धान्तका ही प्रतिपादन है । 'सूत-सहिता' और 'योगवासिष्ठ'—जैसे प्राचीन ग्रन्थोंमें अद्वैतवाद भरा पड़ा है । 'नैषधचरित' ( २१। ८८ ) मे तो बुद्धको भी 'अद्वयवादी' कहा गया है । शान्तरक्षितके 'तत्त्व-सग्रह' ( ३२८ । १२९ ) मे अद्वैतवादका उल्लेख है । दिगम्बराचार्य सामन्तभद्रने 'आप्तमीमासा' ( २४ श्लोक ) में अद्वैतवादकी चर्चा की है । स्थानसङ्कोचके कारण इस प्रकारकी उक्तियोका यहाँ अधिक उल्लेख नहीं किया जा सकता । मुख्य बात यह समझिये कि अद्वैतवाद अत्यन्त प्राचीन सिद्धान्त है और अनेक आचार्योंके मतसे तो यह अनादि सिद्धान्त है ।
परंतु अद्वैतवादके विरोधी अपने पक्षके समर्थनमे कठोपनिषद्का यह मन्त्र उपस्थित करते हे—
ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहा प्रविष्टौ परमे परार्द्धे । छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेता ॥
'इस शरीरम एक अपने कर्मका फल भोग करता है और दूसरा भोग कराता हे । दोनो ही हृदयाकाश और बुद्धिमे प्रविष्ट हे । इनमें एक ( जीवात्मा ) ससारी हे, दूसरा ( परमात्मा ) अससारी है । इसीलिये ब्रह्मज्ञाता और गृहस्थ इन दोनोंको छाया और आतप ( धूप ) के समान विलक्षण कहते ह ।'
अद्वैतवादके खण्डनम दूसरा प्रमाण यह दिया जाता है—
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते । तयोरन्य. पिप्पल स्वाद्वत्त्य- नश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥ (मुण्डक० ३ । १ । १)
अर्थात् 'सहचर और सखा दो पक्षी एक वृक्षका आश्रय
- उपनिषद् और अद्वैतवाद * \hfill ९१
[बायाँ स्तम्भ]
करके रहते हैं । इनमेंसे एक नानाविध फलका भक्षण करता है और दूसरा कुछ नहीं खाता, केवल देखता है।'
इस मन्त्रसे स्पष्ट जाना जाता है कि यह शरीर वृक्ष है और जीवात्मा तथा परमात्मा पक्षी हैं । सुख दुःख-भोग ही फल भक्षण है ।
द्वैतवादी कहते हैं कि जीवात्मा और परमात्मा एक नहीं हैं, परस्पर भिन्न हैं—इस विषयमें उक्त दोनो मन्त्र अकाट्य प्रमाण हैं। द्वैतवादके समर्थनमे इन मन्त्रोंसे बढकर उत्कृष्ट प्रमाण नहीं मिल सकता—किसी भी उपनिषद्में इन मन्त्रोंके समान द्वैतवादका स्पष्ट समर्थन नहीं ह। अवश्य ही ऊपरसे देखने सुननेमे ऐसा ही विदित होता है, परन्तु जरा गहराईमें उतरकर विचार करनेपर ज्ञात होता है कि इन मन्त्रोंमे न तो द्वैतवादका समर्थन ही है, न अद्वैतवादका खण्डन ही है । क्यों और कैसे ? नीचेकी पङ्क्तियाँ पढ़कर पाठक ही निर्णय करेंगे।
अद्वैतवादी भी द्वैत प्रपञ्चका सर्वांशतः अपलाप नहीं करते । वे भी शास्त्र मानते हैं, गुरु शिष्यरूपमे आत्मविद्या- का अनुशीलन करते हैं, सत्त्व शुद्धिके लिये कर्म करते हैं और चित्तकी एकाग्रताके लिये उपासना करते हैं । वे उपास्य- उपासकरूपसे जीव ब्रह्मका औपाधिक भेद स्वीकार करते हैं और आत्मसाक्षात्कारके लिये योगमार्गका आश्रय ग्रहण करते हैं । वे केवल द्वैत-प्रपञ्चकी सत्यता और पारमार्थिकताको स्वीकार नहीं करते । वे कहते हैं—'यह द्वैत प्रपञ्च व्यावहारिक और मायामय है तथा अद्वैत ही पारमार्थिक सत्य है ।' इसलिये अद्वैतवादियोंके मतमे भी उपनिषदोंमे द्वैत-प्रपञ्चका उल्लेख हो सकता है, परन्तु 'द्वैत-प्रपञ्च सत्य है' ऐसा उपदेश किसी भी उपनिषद्का नहीं ह । हाँ, द्वैत प्रपञ्चका मायामयत्व उपनिषदोंमे ही अवश्य ही उपदिष्ट ह । उपनिषद्का स्पष्ट ही आदेश है—'मायाद्वारा परमेश्वर अनेक रूपोंमें दृष्ट होते हैं—
'इन्द्रो मायाभि पुरुरूप ईयते ।'
कठोपनिषद्के 'ऋतं पिबन्तौ' मन्त्रमे आत्माका, उपाधि- भेदमे, जीवात्मा और परमात्माके रूपमें, भेद प्रतिपादित किया गया है—जीवात्मा और परमात्मा वस्तुतः भिन्न ह, यह नहीं कहा गया है । इस मन्त्रमें भेदका सत्यताबोधक कोई भी शब्द नहीं है। इस मन्त्रका प्रसङ्ग देखनेसे बात स्पष्ट हो जायगी ।
मृत्युने नचिकेताको तीन वर देनेका वचन दिया था ।
[दायाँ स्तम्भ]
इसके अनुसार नचिकेताने प्रथम वरमे पिताकी अनुकूलता माँगी और द्वितीय वरमे अग्निविद्याके लिये प्रार्थना की । दोनों वरोंके मिल जानेपर नचिकेताने पुनः प्रार्थना की, 'कृपया मुझे यह समझा दीजिये कि आत्मा देहेन्द्रियोंसे भिन्न है कि नहीं ।' मृत्युने अनेक प्रलोभन दिखाकर नचिकेताको इस वर-प्रार्थनामे निवृत्त होनेका अनुरोध किया, परन्तु नचिकेता किसी भी प्रलोभनमें नहीं आये—उन्होने एक भी नहीं सुनी । नचिकेताकी निःस्पृहता देखकर मृत्युने उनकी बड़ी प्रशसा की और 'आत्मज्ञान होनेपर परमपुरुषार्थ सिद्ध हो जाता है', यह भी कहा । नचिकेताने कहा—'आत्माका यथार्थ स्वरूप क्या है ?' इसके उत्तरमे मृत्युने आत्माकी देहेन्द्रियभिन्नता बतायी और आत्माके यथार्थ स्वरूपकी व्याख्या की । 'आत्मा क्योंकर अपने यथार्थ स्वरूपको जान सकता है', यह भी मृत्युने बताया । नचिकेताके प्रश्नके उत्तर- मे 'ऋतं पिबन्तौ' मन्त्र मृत्युकी उक्ति है ।
नचिकेताने पूछा था जीवात्माका विषय । तब मृत्यु परमात्माका विषय कैसे कहने लगते ? यह तो अप्रासङ्गिक होता । जीवात्माका यथार्थ स्वरूप परमात्माके यथार्थ स्वरूपसे भिन्न नहीं है; जीवात्मा और परमात्मा एक ही हैं, केवल उपाधिभेदसे, घटाकाश, मठाकाश आदिकी तरह दोनोंका भेद मालूम पड़ता है । जीवात्माका संसारीपन अविद्याकृत है, अविद्याके अभावके कारण परमात्मामें संसारीपन नहीं है— इन्हीं अभिप्रायोंसे नचिकेताके जीवात्मविषयक प्रश्नके उत्तर- मे मृत्युने जीवात्मा और परमात्माकी बात कही । नचिकेता- का प्रश्न यह है—
येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये- ऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके । एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वरस्तृतीय ॥ \hfill ( कठ० १ । १ । २० )
'कोई कहता है, मृत्युके अनन्तर भी देहातिरिक्त आत्माका अस्तित्व रहता है और कोई कहता है, नहीं । यह भारी संशय है । तुम्हारे उपदेशसे मैं इसे जानना चाहता हूँ । यह मेरा तीसरा वर है ।'
इसका उत्तर पानेके पहले ही नचिकेता परमात्मविषयक एक और असङ्गत प्रश्न कैसे कर बैठते ? मृत्यु तो इसी प्रश्न- को जटिल समझते थे । इसी बीच परमात्मसम्बन्धी एक अन्य महान् विकट प्रश्न कैसे किया जा सकता था ? मृत्युने
९२ * महान्तं विभुमात्मानं म्.त्वा धीरो न शोचति *
[Left Column] उक्त प्रश्नको ही सुनकर उत्तर देनेमें बड़ी आनाकानी की । मृत्युने स्पष्ट ही कहा—'यह दुर्विज्ञेय है, देवोंको भी इस विषयमें सन्देह हो जाता है । इसलिये इसके उत्तरके लिये आग्रह मत करो—दूसरा वर माँगो ।' इस तरह मृत्युने उत्तर देनेमें बड़ी आपत्ति की, प्रलोभनतक दिखाकर अन्य वर माँगनेका बहुत तरहसे अनुरोध किया । परंतु नचिकेता जरा भी विचलित नहीं हुए । उन्होंने स्पष्ट ही कहा—'जिस विषयमें देवता भी सन्दिहान हैं और जो दुर्विज्ञेय है, उम विषयमें तुम्हारे समान न तो कोई उत्तरदाता ही मिलेगा, न इसके बराबर कोई दूसरा वर ही होगा। इसलिये चाहे यह वर कितना भी दुर्विज्ञेय हो, इसके सिवा मैं अन्य वर नहीं माँग सकता ।' मृत्युने नचिकेताकी दृढता और लोभशून्यता देखकर उनकी, उनके प्रश्नकी और आत्मतत्त्वज्ञानकी प्रशंसा की । अनन्तर नचिकेताने आत्माका परमार्थ-स्वरूप जानना चाहा । आत्माके यथार्थ रूपको जाननेका अनुरोध करना, प्रकारान्तरसे, पूर्व प्रश्नका व्याख्यानमात्र है । वह इस प्रकार कि आत्माके देहादि स्वरूप होनेपर मृत्युके पश्चात् आत्माका अस्तित्व नहीं रह सकता और देहादिसे भिन्न होनेपर मरणानन्तर भी आत्माका अस्तित्व रह सकता है । परंतु नचिकेताकी यथार्थ आत्मस्वरूपकी जिज्ञासा परमात्मविषयक प्रश्न है, यह कल्पना नितान्त अलीक है। कारण, मृत्यु प्रार्थित वरको दुर्विज्ञेय कहकर उत्तर प्रदान करनेमें ही जब कि आपत्ति करते हैं, तब नचिकेताका एक अन्य दुर्विज्ञेय प्रश्न कर बैठना असम्भव है—यह बात पहले ही लिखी जा चुकी है। मृत्युने जिस प्रकार नचिकेताको उत्तर दिया है, उसकी सूक्ष्मताया परीक्षा करनेपर स्पष्ट ही ज्ञात होता है कि, जीवात्मा और परमात्मा एक ही हैं, भिन्न नहीं; मृत्युको यही अभिप्रेत है । आगे दिये जानेवाले उत्तरके आरम्भमें मृत्युने कहा है— सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपाᳪसि सर्वाणि च यद् वदन्ति । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदᳪ सग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ( कठ० १ । २ । १५ ) 'जिस पदका प्रतिपादन सारे वेद करते हैं, जिस पद-प्राप्तिका साधन सारी तपस्याएँ हैं और जिस स्थानकी प्राप्तिके लिये ब्रह्मचर्यका पालन किया जाता है, मैं संक्षेपसे वही पद कहता हूँ । वह है ओंकार ।' ओंकार ईश्वरका नाम और प्रतीक है । श्रुतिका यही मत है । योगी याज्ञवल्क्यने कहा है—
[Right Column] 'वाच्यः स ईश्वर प्रोक्तो वाचक प्रणव स्मृत. ॥' 'प्रणव या ओंकार परमात्माका प्रतिपादक है ।'ठीक ऐसा ही योगदर्शनमे पतञ्जलि ऋषिाने भी कहा है—'तस्य वाचक प्रणव ।' आगे चलकर मृत्युने जीवात्मा और परमात्माकी अभिन्नता दिखायी हे । यही उचित उत्तरका क्रम हूं । यदि नचिकेताने जीवात्मविषयक प्रश्नका उत्तर पानेके- पहले ही परमात्मविषयक असङ्गत प्रश्न किया होता, तो मृत्युने जीवात्मविषयक उत्तर देनेके बाद परमात्मविषयक उत्तर दिया होता । तब यह कैसे सम्भव था कि पहले ही परमात्मसम्बन्धी बातें कह दी जातीं और पृथक् रूपसे जीवात्माका उल्लेखतक नहीं होता ? आगे चलकर तो इसी उपनिषद्मे द्वैत-वादका खण्डन भी है— मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किञ्चन । मृत्यो स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥ ( २ । २ । ११ ) 'शास्त्र और आचार्यके द्वारा सुसस्कृत मनमे ही ब्रह्म- की प्राप्ति होती है । इस ब्रह्ममे अणुमात्र भी भेद नहीं है । जो ब्रह्ममे भेद या नानापन देखता है, वह बार-बार मृत्युको प्राप्त होता है ।' कठवल्लीको द्वैतवाद अभीष्ट रहता, तो यहाँ उसका खण्डन क्यों किया जाता ? परस्पर-विरोध कैसे उपस्थित होता ? इसलिये यह निष्कर्ष निकला कि कठोपनिषद्का प्रतिपाद्य अद्वैतवाद हे, द्वैतवाद नहीं । मुण्डकोपनिषद्का 'द्वा सुपर्णा' मन्त्र भी द्वैतवादका प्रतिपादक नहीं हे । यह भी 'ऋतं पिबन्तौ' की तरह ही है । 'द्वा सुपर्णा' मन्त्र जीवात्मा और परमात्माके भेदका 'अकाट्य' प्रमाण तो क्या होगा, साधारण प्रमाण-कोटिमे भी नहीं आता । आश्चर्य है कि द्वैतवादी धीर-गम्भीर शैलीसे इसपर विचार नहीं करते । वस्तुत यह मन्त्र अन्त'करण (सत्त्व) और जीवात्माका प्रतिपादक है। पैङ्गि रहस्यब्राह्मण में इसकी व्याख्या इस तरह की गयी है— 'तयोरन्य पिप्पलं स्वाद्वत्तीति सत्त्वम् अनश्नन्नन्यो- ऽभिचाकशीत्यनश्नन्नन्योऽभिपश्यति क्षेत्रज्ञस्तावेतौ सत्त्व- क्षेत्रज्ञाविति ।' अर्थात् 'तयोरन्य पिप्पलं स्वाद्वत्ति' से सत्त्व वा अन्त - करणका फल भोक्तृत्व कहा गया है। 'अनश्नन्नन्योऽभिचाक-
इसी ब्राह्मणमे आगे चलकर कहा गया है—
ॐ उपनिषद् और अद्वैतवाद ॐ ९३
श्रोति' से जीवात्माको द्रष्टा कहा गया है। इसलिये यह मन्त्र जीवात्मा और परमात्माका नही—अन्तःकरण और जीवात्माका प्रतिपादक है। इसी ब्राह्मणमे आगे चलकर कहा गया है— 'तदेतत्सत्त्वं येन स्वप्नं पश्यति । अथ योऽय शारीर उपद्रष्टा स क्षेत्रज्ञस्तावेतौ सत्त्वक्षेत्रज्ञाविति ।' 'जिसके ऽद्वारा स्वप्न देखा जाता है उसका नाम सत्त्व वा अन्तःकरण है। जो 'शारीर' वा जीवात्मा द्रष्टा है, उसका नाम क्षेत्रज्ञ है।' अचेतन अन्त करणका भोक्तृत्व कैसे सम्भव है। इसका उत्तर शङ्कराचार्यने यों दिया है— 'नेयं श्रुतिरचेतनस्य सत्त्वस्य भोक्तृत्वं वक्ष्यामीति प्रवृत्ता किन्तर्हि ? चेतनस्य क्षेत्रज्ञस्याभोक्तृत्वं ब्रह्मस्वभावतां च वक्ष्यामीति । तदर्थं सुखादिविक्रियावति सत्त्वे भोक्तृत्व- मद्ध्यारोपयति ।' अर्थात् अचेतन अन्तःकरणका भोक्तृत्व बताना मन्त्रका उद्देश्य नहीं है । चेतन क्षेत्रज्ञका अभोक्तृत्व और ब्रह्म- स्वभावत्वका प्रतिपादन करना ही मन्त्रका लक्ष्य है। इसी अभोक्तापन और ब्रह्मकी स्वभावताको समझानेके लिये क्षेत्रज्ञके उपाधिभूत और सुखादिके विकारसे युक्त अन्तःकरणमें भोक्तृत्वका आरोप किया गया है, क्योकि अन्तःकरण और क्षेत्रज्ञके अविवेकके कारण क्षेत्रज्ञमे कर्तृत्व और भोक्तृत्वकी कल्पना की जाती है। सुखादि विकारोंसे युक्त सत्त्व (अन्तःकरण) में चित्प्रतिबिम्ब पतित होनेपर चित्का भोक्तृत्व मालूम पड़ता है। फलतः वह अविद्याजन्य है, पारमार्थिक नहीं। कदाचित् यहाँ यह लिखनेकी आवश्यकता नहीं कि वेदमन्त्रोका यथार्थ अर्थ समझनेके लिये कितनी धीरता, सावधानता और बहुदर्शिताकी आवश्यकता होती है और इस दिशामें जरा-सी भी त्रुटि कितना बड़ा अनर्थ कर सकती है । वेदवेत्ताओंके मतसे जो वाक्य जीवके ब्रह्मभावका बोधक है वही वाक्य जीव और ब्रह्मके भेदका बोधक मालूम पड़ जाता है—अर्थका अनर्थ उपस्थित कर देता है। इसीलिये वेदमन्त्रोंका रहस्य समझनेवालोंने कहा है— 'बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति ।' अल्पविद्य (नीम हकीम) से वेद इसलिये डरता है कि यह मुझे मार डालेगा । वेदज्ञोंने और भी कहा है— 'पौर्वापर्यापरामृष्ट शब्दोऽन्यां कुरुते मतिम् ।' 'पूर्वापरकी आलोचना नहीं करनेसे शब्द विपरीत अर्थ- बोधका कारण होता है।'
एक बात और । वन्ध्यापुत्र, कूर्मरोम, शशशृङ्ग वा गगन-कमलिनीके समान द्वैत-प्रपञ्चको अद्वैतवादी तुच्छ वा अलीक नहीं कहते । वे केवल इतना ही कहते हैं कि जैसे मनुष्यके निद्रादोषके कारण स्वप्नमे देखा गया पदार्थ मिथ्या है, वैसे ही अविद्यारूप दोषके कारण जाग्रद- वस्थामें देखा गया पदार्थ भी मिथ्या है। एकमात्र ब्रह्म ही परमार्थ सत्य है। ब्रह्मके अतिरिक्त कोई भी पदार्थ 'परमार्थ सत्य' नहीं है, परतु पारमार्थिक सत्ता नहीं होनेपर भी संसारी पदार्थोंकी व्यावहारिक सत्ता और स्वप्नमें देखे पदार्थों- की प्रातीतिक वा प्रातिभासिक सत्ता है। सपनेमें देखे पदार्थ जैसे स्वप्नकालमें यथार्थ मालूम पडते हैं, वैसे ही जागतिक पदार्थ व्यवहार-दशामें यथार्थ ज्ञात होते हैं। ब्रह्मवादियोँने कहा भी है— देहात्मप्रत्ययो यद्वत् प्रमाणत्वेन कल्पित । लौकिकं तद्वदेवेदं प्रमाणं त्वात्मनिश्चयात् ॥ अर्थात् शरीरमें आत्मबुद्धि वस्तुतः मिथ्या है तो भी देह-भिन्न आत्माके जानके पहले सत्य विदित होती है। इसी तरह सारी लौकिक वस्तुओंके मिथ्या होनेपर भी आत्म- निश्चयतक वे सच्ची मालूम पड़ती हैं। 'ज्ञाते द्वैतं न विद्यते'— आत्मतत्त्वज्ञान होनेपर द्वैत नहीं रहता । निष्कर्ष यह है कि व्यवहार-दशामें अद्वैतवादी भी जीवेश्वर-भेद, द्वैत-प्रपञ्च तथा परमात्मा और जीवात्माका उपास्य-उपासक भाव स्वीकार करते हैं । वेदान्तवेत्ताओंने ठीक ही कहा है— मायाख्याया. कामधेनोर्वत्सौ जीवेश्वरावुभौ । यथेच्छ पिबता द्वैत तत्त्व त्वद्वैतमेव हि ॥ 'माया नामकी कामधेनुके दो बछड़े हैं—जीव और ईश्वर । ये दोनों इच्छानुसार द्वैतरूप दुग्धका पान करें, परन्तु परमार्थ-तत्त्व तो अद्वैत ही है।' पारमार्थिक और व्यावहारिक भावोके उदाहरण संसारमें भी देखे जाते हैं। जिसके साथ वास्तविक आत्मीयता नहीं है, उसके साथ भी लोग बाह्य होकर आत्मीयके समान व्यवहार करते हैं। यह केवल व्यावहारिक आत्मीयता है, पारमार्थिक नहीं। अगले मन्त्रमें इस बातको बड़ी स्पष्टतासे कहा गया है— यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति । यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत् केन कं पश्येत् ॥ 'जबतक द्वैत रहता है, तबतक एक दूसरेको देखता
९ ९४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * है और जब कि सारे पदार्थ आत्मरूप हो जाते हैं तब कौन किसको देख सकता है ?' मुख्य बात यह है कि अद्वैतवाद और व्यावहारिक द्वैतवाद—दोनों ही वेदसम्मत हैं । इसलिये उपनिषदोंमे उपास्य उपासक-भावसे परमात्मा और जीवात्माका निर्देश रहना कुछ विचित्र बात नहीं है। इससे अद्वैतवादकी कोई हानि भी नहीं है। व्यावहारिक द्वैतावस्था माननेके कारण उपनिषदोंके द्वैतवादी वाक्योंके द्वारा अद्वैतवादका खण्डन नहीं हो सकता । व्यावहारिक द्वैतावस्था अद्वैतावस्थाकी विरोधिनी हो ही नहीं सकती । फलतः अद्वैतवादके सम्बन्धमे द्वैतवादियोंकी आपत्तियाँ निर्मूल हैं और उपनिषदोंके अनुसार अद्वैतवाद ही परमार्थ सत्य है । किसी भी उपनिषद्के किसी भी मन्त्रमे द्वैतवाद परमार्थ सत्य सिद्ध नहीं होता ।
उपनिषदोंका नवीन वैज्ञानिक तथ्य ( लेखक-पण्डित श्रीरामनिवासजी शर्मा )
वस्तुका तत्त्वतः नाश ( Annihilation ) नहीं होता, अपितु उसका रूपान्तर होता है—यह एक आधुनिक सत्य है, किंतु वैदिक ऋषियोंको आजसे बहुत पहले इसका पता था। वे इस बातको अच्छी तरह समझते थे कि वस्तुका आविर्भाव और तिरोभाव ही होता है, न कि नाश ( Annihilation )। उनकी भाषाकी 'जनी' और 'णशू' धातुएँ इस सत्यकी प्रतिपादक हैं, क्योंकि इनका अर्थ क्रमशः आविर्भाव और तिरोभाव ही है। किंतु इसमे एक विशेष और विलक्षण बात भी है, वह यह कि वैदिक ऋषि न केवल तत्त्वत अपितु स्वरूपतः भी प्राकृतिक वस्तुओंका नाश नहीं मानते थे। न केवल व्यष्टि समूहका प्रत्युत समष्टि समूहका भी। यह सत्य 'नारायण और महानारायण उपनिषद्'के निम्नलिखित प्रवचनसे पूर्णतः स्पष्ट होता है— सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् । दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्व ॥ अर्थात् विधाताने सूर्य, चन्द्रमा, द्युलोक, पृथिवी और अन्तरिक्षकी रचना पूर्व सृष्टि क्रमके अनुसार ही की है। उपनिषत्प्राण श्रीमद्भगवद्गीता इस सत्यका समधिक स्पष्टीकरण है। उससे पूर्णतः यह सिद्ध हो जाता है कि वस्तुतः सृष्टि नयी नहीं बनती और न नष्ट ही होती है, प्रत्युत अव्यक्तसे व्यक्त होती है और व्यक्तसे अव्यक्त। उसके अपने शब्द इस प्रकार हैं— अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥ ( गीता २।२८)
छान्दोग्य उपनिषद् भी इसी सत्यको प्रकारान्तरसे इस तरह स्पष्ट करता है— ' प्राकृतिक शक्तियाँ द्युलोकरूप अग्निमें परमाणुरूप साहित्यका हवन करती रहती हैं, जिससे इस निःसीम आकाश प्राङ्गणमे नित्य ही आह्लादजनक विश्व ब्रह्माण्डों और वस्तुओंका प्राग्म्य होता रहता है। प्रत्येक वस्तु अपने अव्यक्तरूपसे व्यक्तरूपमे आती रहती है। यह बृहद् यज्ञ परमात्माकी ओरसे प्रकृति प्रवाहमं सदैव होता रहता है।' यह सृष्टि किन किन तत्त्वों और साधनोसे अव्यक्तमे व्यक्त दशामे आती है—इसकी रूपकालङ्कार-सम्मत सक्षिप्त उपनिषत्तालिका इस प्रकार है— संक्षिप्त तालिका १ द्युलोक ... अग्नि कुण्ड २ द्युलोकस्थ शक्ति • प्रथमाग्नि ३ आदित्य • समिधा ४ हवनीय द्रव्य .. • परमाणु ५ हवन-कर्ता देवता प्राकृतिक शक्तियाँ ६ अध्वर्यु • परमात्म-तत्त्व ७ वसन्त-ऋतु • घृत स्थानीय ८ ग्रीष्म-ऋतु .. समित्स्थानीय ९ शरद्-ऋतु ... हवि १० यज्ञ-नाम • प्राकृतिक यहाँ यह कहते हुए आश्चर्य होता है कि यह उपनिषदात्मक किंतु व्यक्ताव्यक्तविषयक विश्व दुर्लभ सत्य इस समय भी भारतीय घर-आँगनकी वस्तु बना हुआ है। आज भी सन्ध्या- वन्दनके समय कोटि कोटि कण्ठोंसे अघमर्षणमें इस प्रकार दुहराया जाता है—
१ पृथिवीजलतेजोवायुगगनरूपेषु गन्धादिविशेषवस्तुषु जन्तुषु प्राणिषु च । श० म० १ छा० खण्ड ४। महामहोपाध्याय श्रीआर्यमुनिकृत-भाष्य ।
- उपनिषदोंका नवीन वैज्ञानिक तथ्य * ९५ ॐ सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् । दिवञ्च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्व ॥ इस तरह हम देखते हैं कि उपलब्ध उपनिषद्वाङ्मय आज भी वैज्ञानिक संसारको यह बता रहा है कि व्यष्टि और समष्टि विश्व न केवल तत्त्वतः अपितु स्वरूपतः भी नाश-रहित है । परंतु यह कहते हुए भी दुःख होता है कि आजके वैदिक विद्वानोंकी दृष्टिमें यह सत्य पूर्णतः स्पष्ट नहीं है, किंतु यह जानकर थोड़ा सन्तोष होता है कि इस सत्यके सक्रिय मर्मको जाननेवाले व्यक्ति अभी सर्वथा नाम-शेष नहीं हुए हैं । आज भी गिरि-गुहाओंमे ऐसे लोग मौजूद हैं जो इस सत्यके क्रियात्मक पक्षको स्वयं भी समझते और दूसरोको भी समझा सकते हैं, ऐसे ही महात्माओंके एक स्वर्गीय शिष्य श्रीस्वामी विशुद्धानन्दजी परमहंस भी थे । उनका भी यह विश्वास था कि वस्तु स्वरूपतः भी विनश्वर नहीं है । न केवल विश्वास, अपितु वे प्रायः एक प्रकारके फूलको दूसरे प्रकारके फूलोंमे परिणत कर दिखाया भी करते थे । वैज्ञानिक शब्दोंमें इसीको इस तरह भी कहा जा सकता है कि— उनमे एक प्रकारके फूलको तिरोहित कर उसमेंसे अव्यक्त नवीन फूलको व्यक्त कर दिखानेका सामर्थ्य था । यही नही, प्रत्युत वे प्राकृतिक विकारों (वस्तुओं) के अनुलोमज और विलोमज दोनों प्रकारोंकी क्रमशः विकासात्मक और लयात्मक प्रक्रियाओंको भी अच्छी तरह समझते थे। साथ ही वे अनुलोमज क्रियात्मक परीक्षणके साथ-साथ विलोमज परीक्षणको भी दिखा सकते थे । इस विषयपर उनके अपने शब्द इस प्रकार है— 'वत्स ! वस्तुके अनुलोमज और विलोमज दोनों प्रकारका विकास और लय सत्य है । उदाहरणार्थ दूधसे दही, दहीसे नवनीत और नवनीतसे घृत उत्पन्न होता है, परंतु घृतमे नवनीत, नवनीतमें दही और दहीमें दूधके उपादान अव्यक्त रूपसे रहते हैं । वास्तविक योगी या वैदिक विज्ञान-वेत्ता इन अदृष्ट उपादानोंको विलोम प्रक्रियासे घृतको नवनीतमें, नवनीतको दहीमें और दहीको दूधमें परिणत कर सकता है । इतना ही नहीं, अपितु योगी दुग्धको भी विलोम क्रियाके द्वारा तृण-राशिमें भी परिवर्तित कर सकता है¹।' स्वामीजी ऐसा कहते ही न थे, प्रत्युत वे योग्य अधिकारियोंको कभी-कभी इस विलोम प्रक्रियाके प्रयोग भी दिखा दिया करते थे । यह सत्य केवल वैदिक ही नहीं है, अपितु दार्शनिक भी है । इसका प्रमाण यह है कि इस सत्यको आजसे बहुत पहले हमारे दर्शनकारोंने भी प्रकारान्तरसे समझने-समझानेकी कोशिश की थी । महर्षि पतञ्जलिने भी अपने पातञ्जल-दर्शनके कैवल्य-पादमें इस विषयको इस तरह स्पष्ट किया है— 'जात्यन्तरपरिणाम प्रकृत्यापूरात् ।' अर्थात् प्रकृतिके आपूरणसे जात्यन्तर-परिणाम होता है, किंतु वह क्यों और कैसे होता है ? इस विषयको उन्होंने निम्नलिखित सूत्रद्वारा समझाया है— 'निमित्तमप्रयोजक प्रकृतीनां वरणभेदस्तु तत क्षेत्रिकवत् ।' तात्पर्य यह है कि धर्मादि निमित्त प्रयोजक कारण उपादान-स्वरूप प्रकृतिको प्रेरित नहीं करते, वे तो केवल प्रकृतिक्स आवरणको ही दूर कर सकते है, परंतु प्रकृति आवरणसे उन्मुक्त होकर स्वतः अपने विकारों—विभिन्न रूपोंमें परिणत होने लगती है । उदाहरणके लिये रजतमें जो स्वर्ण-प्रकृति है, वह आवरणसे आवृत है और रजत-प्रकृति आवरणसे मुक्त है; किंतु यदि स्वर्ण-प्रकृतिका यह आवरण किसी उपायसे हटा दिया जाय तो रजत-प्रकृति तिरोहित हो जायगी और स्वर्ण-प्रकृति-धारामें विकार उत्पन्न करेगी¹ । इस तरह रजत-प्रकृति अव्यक्त स्वर्ण प्रकृतिमे व्यक्त हो जायगी अर्थात् रजत स्वर्णमें बदल जायगा । इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि धर्मादि प्रयोजक कारणसे ही ऐसा होता है, अपितु प्रकृति स्वय भी अपनी लयोन्मुखता और विकासोन्मुखताके कारण क्रमशः अनन्त विकारों और वस्तुओंमें विकासोन्मुख और लयोन्मुख होती रहती है । इसी सत्यको महर्षि व्यासने अपने भाष्यमें इस प्रकार स्पष्ट किया है— 'निमित्तमप्रयोजक प्रकृतीना वरणभेदस्तु तत क्षेत्रिकवत् । न हि धर्मादिनिमित्तं तत्प्रयोजक भवति प्रकृतीनाम्। न कार्येण कारण प्रावर्त्यत इति । कथ तर्हि ? वरणभेदस्तु तत क्षेत्रिकवत् । यथा क्षेत्रिक केदारादपां पूर्णात्के दारान्तरं पिप्लावयिषु समं निम्न निम्नतरं वा नाप पाणिनापकर्षत्यावरणं त्वासा भिनत्ति तस्मिन्भिन्ने स्वयमेवाप केदारान्तरमाप्लावयन्ति तथा धर्म प्रकृतीनामावरणधर्मं भिनत्ति तस्मिन्भिन्ने स्वयमेव प्रकृतय स्व स्वं विकारमाप्लावयन्ति।' महाभारत भी इस सत्यका इस प्रकार समर्थन करता है—
१ श्रीश्रीविशुद्धानन्दप्रसङ्ग । महामहोपाध्याय श्रीगोपीनाथ कविराजकृत । १ म म गो ना द्वारा समर्थित और उदाहृत ।
२३ * मन्दानं विन्दुमत्तारं नान्यं धीरे न शोचति *
'अदर्शनादापतिता पुनश्चादर्शनं गता ।' अर्थात् पूर्व, कुछ अदर्शन (अव्यक्त) से दर्शन (व्यक्त) और दर्शन (व्यक्त) से अदर्शन (अव्यक्त) अवस्थाओंमें परिवर्तन होते रहते हैं। अभावसे भाव और भावसे अभाव- की उत्पत्ति कदापि नहीं होती। इस उपनिषदात्मक सत्यका संस्कृत कवियोंने भी समर्थन किया है। निम्न पद्य-खण्ड इसके दिग्दर्शन हैं। 'स्पर्शानुकूला अपि सूर्यकान्ता स्वकीयतेजोऽभिभवाद् दहन्ति ।' 'शमप्रधानेषु तपोधनेषु गूढ़ हि दाहात्मकमस्ति तेज ॥' अर्थात् सूर्यकान्त मणिमें अव्यक्त तेज सूर्य-किरणोंके स्पर्श- से व्यक्त होता है वैसे ही शान्ति-प्रधान तपोधनमें दाहत्मक तेज अव्यक्त-अवस्थामें रहता है। हमारा पुराण-साहित्य भी इस सत्यका साक्षी है। उसमे न केवल प्राकृतिक विकारोंके व्यक्ताव्यक्त भावोंपर ही प्रकाश डाला गया है, प्रत्युत यह भी बताया गया है कि योग बल- रूप निमित्तको प्राप्तकर बाल्यावस्था, युवावस्था ओर वृद्धा- वस्था भी एक दूसरीम परिणत हो जाती ह। साथ ही आकार- प्रकार और रूप-रंग भी एक दूसरेमे परिणत किये जा सकते हैं। कहा जाता है, चीनके लामा लोग इस समय भी ऐसे परीक्षण किया करते हैं। श्रीमती नील अपने यात्रा-वृत्तान्तमें लिखती हैं— 'मैं चुपचाप बैठी हुई लामाको देखती रही। उनमें किसी तरहकी हरकत नहीं थी ओर वह जड़वत् प्रतीत होते थे। मैने देखा कि धीरे धीरे उनकी आकृति बदल रही है, उनके चेहरेपर झुर्रियाँ पैदा हो रही है और चेहरेपर ऐसा रूप प्रकट हो रहा है जो मैंने उनमे कभी नहीं देखा था। उन्होंने अपनी आँखें खोलीं और प्रिंस आश्चर्यसे काँप उठे।' 'हमलोग जिस आदमीको देख रहे थे, यह डार्लिगके गोनचेन नहीं थे। यह कोई दूसरा ही आदमी था, जिसे हम नहीं जानते थे। बडी कठिनाईसे इस व्यक्तिने अपना मुँह खोला और डार्लिगसे भिन्न वाणीमे बोला।' 'इसके बाद उसने धीरे-धीरे अपनी आँखे बन्द कर लीं, फिर उनकी आकृति बदलने लगी और डार्लिग लामाके रूपमें आ गयी।' हमारी प्रान्तीय भाषाओमे भी हमे इस सत्यके प्रकारान्तर- से दर्शन होते है, प्राय लोग कहा करते हैं— १. पिण्डे सो ब्रह्माण्डे। २. ब्रह्माण्डे सो पिण्डे। ३ सबमें सो हममे और हममे सो सबमे। इन वाक्योंका यही अभिप्राय है कि प्रत्येक वस्तु प्रत्येक वस्तुमे मौजूद है। अन्तर केवल इतना ही है कि एक वस्तु व्यक्त है किंतु उसीमें अनन्त अव्यक्त वस्तुएँ (प्राकृतिक विकार-भेद) विद्यमान ह, परतु वे नैमित्तिक (Incidental) उपायोंसे स्वप्रकृतिवश व्यक्त हो उठती हैं, किंतु इसका यह भाव कदापि नहीं है कि नैमित्तिक उपाय स्वय अव्यक्त वस्तुओंका रूप धारण कर लेते है। इसलिये कि वस्तु-प्रकृतिमे स्वत व्यक्त होनेकी सत्ता विद्यमान है, किंतु है वह पुरुष-साध्य। फिर पुरुष ब्रह्म हो या व्यक्तिविशेष वैज्ञानिक। इसी रहस्यको आंग्ल-भाषामें एक भाष्यकारने इस तरह समझाया है— The creative-causes are not moved into-action by any incidental causes, but that pierces the obstacles from it like the husband man साधुका स्वभाव नान्तर्विचिन्तयति किञ्चिदपि प्रतीप- माकोपितोऽपि सुजनः पिशुनेन पापम् । अर्कद्विषोऽपि हि मुखे पतिताग्रभागा- स्तारापतेरमृतमेव कराः किरन्ति ॥ चुगली खानेवाले दुष्ट मनुष्यके द्वारा क्रोध दिलानेपर भी साधुपुरुष उसके विरुद्ध अमङ्गलमय प्रतिशोधकी बात अपने मनमें नहीं लाते। राहु चन्द्रमाका सहज विद्वेषी है, किंतु चन्द्रमाकी सुधामयी किरणें उसके मुखमें पड़कर भी अमृतकी ही वर्षा करती हैं।
ये वेदके सहिता आदि भागोंके अन्तिम अध्याय हैं, जैसे
उपनिषद् और रामानुज-वेदान्तदर्शन- ( लेखक-वेदान्ताचार्य पं० श्रीरामकृष्णजी शास्त्री, बी० ए० )
उपनिषदोंको ही वेदान्त कहा जाता है; क्योंकि प्रथम तो ये वेदके सहिता आदि भागोंके अन्तिम अध्याय हैं, जैसे माध्यन्दिनीय संहिताका अन्तिम अध्याय ईशावास्योपनिषद् है; दूसरे वे वेदका अन्त अर्थात् सार हैं, वेदका वास्तविक प्रतिपाद्य विषय ब्रह्मज्ञान इनमें प्रत्यक्ष रूपसे निहित है। वेदके अवशिष्ट भागमें तो कर्मकाण्ड, यज्ञ, देवप्रशंसा आदिके रूपमें अप्रत्यक्ष रूपसे ही ब्रह्मज्ञान कराया गया है।
उपनिषदोंके अर्थको भलीभाँति समझानेके लिये और उपनिषदोंके वर्णनीय विषयको एक तर्कपूर्ण तथा वैज्ञानिक रीतिसे क्रमबद्ध करनेके लिये महर्षि वेदव्यासजीने ब्रह्मसूत्रोंका प्रणयन किया। इन ब्रह्मसूत्रोंको वेदान्तदर्शन कहते हैं और वेदके उत्तर भागकी मीमांसा होनेके कारण इनको उत्तर- मीमांसा भी कहते हैं। साथ ही ब्रह्मकी मीमांसा होनेके कारण इन्हें ब्रह्ममीमांसा भी कहा जाता है।
ब्रह्मसूत्रोंके अर्थको स्पष्ट करनेके लिये और ब्रह्मसूत्रों तथा उनके विषय उपनिषद् या श्रुतियोंका परस्पर सामञ्जस्य दिखलाने- के लिये विभिन्न आचार्यपादोंने ब्रह्मसूत्रोंपर भाष्योंकी रचना की है, जिनके द्वारा उपनिषदोंके प्रतिपाद्य विषयको अवगत कराया गया है और ब्रह्मसूत्र उन अर्थोंके साक्षी हो जाते हैं, उपनिषदों- का वास्तविक अर्थ ब्रह्मसूत्रोंमें निहित है, किंतु संक्षिप्त रूपसे है। उस अर्थको विस्तृत कर देना मात्र भाष्योंका कार्य है। इस परम्परासे भाष्य उपनिषदोंके ही अर्थको दार्शनिक रीतिसे क्रमबद्धरूपमें अवगत कराते हैं। इन भाष्योंका निर्माण करनेसे पूर्व आचायोंने उपनिषत्प्रतिपादित तत्त्वको विभिन्न रूपसे देखा है, जैसे श्रीशङ्कराचार्यजीने अद्वैतरूपसे, श्रीरामानुजाचार्यजीने विशिष्टाद्वैतरूपसे और श्रीवल्लभाचार्यजीने शुद्धाद्वैतरूपसे आदि।
उसी तत्त्वको अपने दृष्टिकोणमें रखते हुए उसे विस्तृत रूपसे अपने-अपने भाष्योंमें प्रतिपादित किया है और उस तत्त्वका ब्रह्म- सूत्रोंसे सामञ्जस्य दिखलाया है। इस प्रकार श्रुति, सूत्र और भाष्य-ये तीनों एक पूर्ण दर्शन हो जाते हैं और भाष्योंके अनुसार ही उनके नाम निर्देश किये जाते हैं-जैसे शाङ्कर- वेदान्त, रामानुज वेदान्त, मध्व-वेदान्त और वल्लभ वेदान्त। इन्हींको क्रमशः अद्वैत-वेदान्त, विशिष्टाद्वैत-वेदान्त, द्वैत-वेदान्त और शुद्धाद्वैत-वेदान्त कहा जाता है। इन्हींमे 'दर्शन' शब्द जोड़कर इनको शाङ्कर वेदान्तदर्शन या शाङ्कर-दर्शन आदि कहा जाता है। इन्हीं दर्शनोंमेसे एक रामानुज-वेदान्त- दर्शन है।
यहाँपर हमें केवल यह दिखाना है कि उपनिषदोंमें और रामानुज-वेदान्तदर्शनमे सामञ्जस्य किस प्रकार है अर्थात् उपनिषदोंको रामानुज-वेदान्तदर्शनमें किस प्रकार लगाया गया है।
उपनिषदोंमें सामान्य रूपसे चार प्रकारकी श्रुतियाँ मिलती हैं-निर्गुणका प्रतिपादन करनेवाली, सगुणका प्रतिपादन करने- वाली, अभेदवादिनी तथा भेदवादिनी। निर्गुणप्रतिपादक तथा सगुणप्रतिपादक श्रुतियोंमें परस्पर विरोध प्रतीत होता है। इसी प्रकार अभेदवादिनी और भेदवादिनी श्रुतियोंमें भी परस्पर विरोध दीखता है। इनका परस्पर सामञ्जस्य ही रामानुज- वेदान्तदर्शन है।
जो निर्गुणप्रतिपादक श्रुतियाँ हैं। जैसे- 'निष्कलम्' 'निरञ्जनम्' 'निर्गुणम्' 'अप्रतर्क्यम्' 'अविज्ञेयम्' 'एष आत्मा अपहतपाप्मा विजरो विमृत्यु- र्विशोकोऽविजिघित्सोऽपिपासः।'
-आदि। इनका यह तात्पर्य है कि परब्रह्ममें काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष, राग, शोक, बुभुक्षा, पिपासा, जरा, मृत्यु आदि हेय या त्याज्य गुण या विशेषण नहीं हैं, (गुण शब्द विशेषणमात्रका द्योतक है चाहे विशेषण सत् हो या असत्) अतः वह निर्गुण या निर्विशेष है। जो सगुणप्रतिपादक श्रुतियाँ हैं, जैसे- 'परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च।' 'सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः' 'कविर्मनीषी' 'सोऽकामयत' 'सर्वगन्धः सर्वरसः'
-आदि। इनका यह तात्पर्य है कि परब्रह्ममें ज्ञानबलैश्वर्य, वीर्य, शक्ति, तेज, सौशील्य, मार्दव, आर्जव, दया, क्षमा, औदार्य, करुणा, प्रेम, वात्सल्य, सर्वलोकशरण्यत्व, सत्य- कामत्व, सत्यसङ्कल्पत्व आदि असंख्येय, अनन्त कल्याण गुण हैं। इस प्रकार परस्पर सामञ्जस्य करनेपर रामानुजदर्शनमें ब्रह्मका स्वरूप निर्धारित किया गया है कि ब्रह्म एकमात्र अनन्त
उ० अ० १३-
९८ -- महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति -- ज्ञानानन्दस्वरूप, समस्त त्याज्य दोषोंसे सर्वथा शून्य एव अनन्त कल्याणमय गुणोंसे युक्त है । जो अद्वैत या अभेदका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियाँ हैं, जैसे— ‘एकमेवाद्वितीयम्’ ‘नेह नानास्ति किञ्चन’ ‘शान्त शिवमद्वैतम्’ —आदि । उनका तात्पर्य है कि चिदचिद्विशिष्ट ब्रह्मको छोड़कर और कुछ भी नहीं है । चित् अर्थात् जीव, अचित् अर्थात् प्रकृति आदि अचेतन पदार्थ ब्रह्मके शरीर हैं और ब्रह्म इनका आत्मा है । चेतन तथा अचेतन नित्य हैं, उनसे ब्रह्म सर्वदा विशिष्ट रहता है, क्योंकि चिदचित्पदार्थोंके नित्य होनेके कारण उनकी सत्ता अवश्य कहीं-न-कहीं रहेगी और जहाँ उनकी सत्ता रहेगी, वहाँ ब्रह्म भी अवश्य रहेगा, क्योंकि वह अनन्त है, सर्वदा सर्वत्र विराजमान है । इसके साथ ब्रह्म उनमें आत्मरूपसे प्रविष्ट रहता है और चेतन-अचेतनका उसी प्रकार नियन्त्रण करता है, जिस प्रकार जीव अपने शरीरका करता है । जीव कर्मबद्ध होनेके कारण स्वेच्छापूर्वक अपने शरीरका प्रयोग किसी कालमें न भी कर सके, किंतु ब्रह्म स्वतन्त्र और अनन्त ज्ञान तथा शक्तिसे युक्त होनेके कारण यथेच्छ प्रयोग कर सकता है । जिस प्रकार शरीरविशिष्ट आत्माको देवदत्त आदि नामोंसे पुकारते हैं और ‘पुण्यवान् देवदत्त स्वर्गको जायगा’ आदि-आदि प्रकारसे आत्माका निर्देश करते हैं, और शरीर आत्माका विशेषण होनेके कारण आत्माके साथ ही एकताके व्यवहारमें आता है । उसी प्रकार चेतनाचेतनशरीरक ब्रह्म एक ही हुआ । विशेष्यसे विशेषण पृथक् नहीं गिना जा सकता । यहाँ यह शङ्का नहीं करनी चाहिये कि गुण ही विशेषण होता है, चेतनाचेतन तो द्रव्य हैं, वे विशेषण कैसे हुए, क्योंकि विशेषण उसीको कहते हैं जो विशेष्यसे पृथक् रहनेमें असमर्थ हो । न वही शङ्का करनी चाहिये कि शरीर भोगायतन होता है, क्योंकि वस्तुतः शरीर उस द्रव्यका नाम है जो अपने शरीरीसे अपृथक् रहते हुए उसके द्वारा धारित, नियन्त्रित किये जाते हुए शरीरीका सर्वतोभावेन शेष हो । चेतनाचेतनको ब्रह्मका शरीर श्रुतियाँ ही कहती हैं, जैसे— ‘यस्यात्मा शरीरम्’ ‘यस्य पृथिवी शरीरम्’ ‘यस्याक्षर शरीरम्’ —आदि । इस प्रकार सकल विश्व ब्रह्मका शरीर होनेके कारण ब्रह्म ही कहा जाता है, इसीलिये भगवती श्रुति कहती है कि ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ अर्थात् सर्वको पृथक् मत समझो, किंतु यह ब्रह्म है। यही भाव ‘सोऽहमस्मि’, ‘अहं ब्रह्मास्मि’, ‘तत्त्वमसि’ आदि श्रुतियोंका है कि जिस प्रकार शरीरको शरीरी- के द्वारा निर्दिष्ट होना पड़ता है, उसी प्रकार चेतन या अचेतन ब्रह्मका शरीर होनेके कारण अपनी पृथक् सत्ता स्थापित नहीं रख सकता, किंतु उसे यही कहना पड़ेगा कि मैं ब्रह्म हूँ । इस प्रकार अभेदवादिनी श्रुतियोंका अर्थ है कि चिदचिद्विशिष्ट ब्रह्मसे व्यतिरिक्त कुछ नहीं है । एकमात्र वही है । भेदवादिनी श्रुतियाँ, जैसे— ‘भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा’ ‘नित्योऽनित्यानां चेतनश्चेतनानाम्’ —आदि हे । वे चेतन, अचेतन और ब्रह्म—इन तीनो तत्त्वोंका पृथक् पृथक् निरूपणमात्र कर देती हैं, जिससे ब्रह्म और उसका शरीर सुविधासे समझा जा सके । इन तीनोंके सम्बन्धको ‘यस्यात्मा शरीरम्’ आदि घटक श्रुतियाँ बतलाती हैं और अभेदवादिनी श्रुतियाँ चेतनाचेतनसे विशिष्ट ब्रह्मको बतलाती है। अतः तीनो प्रकारकी श्रुतियो (—द्वैतपरक, घटक, अद्वैतपरक ) का सामञ्जस्य हो जाता है । और पूर्वोक्त चारों प्रकारकी श्रुतियाँ भी इस प्रकार रामानुज दर्शनमे समझस हो जाती हे । ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ श्रुति ब्रह्मस्वरूपको उपस्थापित करती है । सगुण निर्गुणं, भेद-अभेद बतलाने- वाली श्रुतियोका सामञ्जस्य भी वहीं हो जाता है, तब यह निष्कर्ष निकलता है कि सत्य, अनन्तज्ञानानन्दैकस्वरूप, अखिलहेयप्रत्यनीक, मङ्गलकल्याणगुणसागर, चिदचिच्छरीरक एक परब्रह्म ही वस्तु तत्त्व है । इससे अतिरिक्त सब मिथ्या है। पूर्वोक्त गुणविशिष्ट सूक्ष्मचिदचिच्छरीरक ब्रह्म कारण है और पूर्वोक्त गुणविशिष्ट स्थूलचिदचिच्छरीरक ब्रह्म कार्य है । कारण और कार्यमे अभेद ही इस प्रकार हुआ । अतएव दोनों विशिष्टों—सूक्ष्मचिदचिद्विशिष्ट ब्रह्म और स्थूलचिद- चिद्विशिष्ट ब्रह्ममे अद्वैत होनेके कारण ब्रह्मको विशिष्टाद्वैत और तत्प्रतिपादक सिद्धान्तको विशिष्टाद्वैत-सिद्धान्त कहते हैं । जो चेतन अपनी इस स्थितिको समझ लेता है, उसे ‘ज्ञानी’ कहते हैं । जो समझकर अपने अन्तर्यामीकी ओर आकृष्ट होता है, उसे ‘भक्त’ कहते हैं। वही अपना उपाय समझनेवाला ‘शरणागत या प्रपन्न’ कहलाता है । शरणागति ही प्रभुको समझनेके लिये, उसे प्राप्त करनेके लिये एकमात्र उपाय है । शरणागतिका यह तात्पर्य है कि शरणागतिको भी उपाय न समझकर केवल प्रभुके चरणारविन्दोंको प्रभुपदकमल- सेवाकी प्राप्तिका उपाय समझना । प्रभुचरणकैङ्कर्य ही प्राप्य
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१०० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * सङ्गत है। गुरुकी स्थिति प्रभुसे, मित्रसे सर्वथा भिन्न है। एक अर्थमें गुरु प्रभुसे भी बड़ा है। कबीरजी तो स्पष्ट कहते हैं- गुरु साहब दोनों खड़े, काके लागूँ पाइ । बलिहारी गुरुदेवकी, जिन साहब दियो दिखाइ ॥ ७-फिर तत्त्वात्तत्त्वदर्शी गुरुकी कृपासे ही तो हम तत्त्वको और अतत्त्वको देख सकेंगे-जान सकेंगे, अतः गुरुकी कक्षा इस संसारमें सबसे ऊँची है। गुरुसे ही हमें 'उपनयन' द्वारा माया- विषयक (संसारोपयोगी) ज्ञान प्राप्त होता है और गुरुसे ही हमें 'उपनिषद्' द्वारा मायातीत ज्ञान प्राप्त होता है। कहा भी है-'बिन गुरु होइ न ज्ञान ।' उपनिषद् भी कहती है- 'समित्पाणिः श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठम्' इत्यादि । इसीको लक्ष्य करके भगवान् श्रीकृष्ण भी अर्जुनको लोक शिक्षार्थ उपदेश करते हैं- तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ ( गीता ४ । ३४ ) 'अर्जुन ! तू उस तत्त्वज्ञानको तत्त्वदर्शी ज्ञानी गुरुओंके समीप जाकर प्रणामपूर्वक युक्त प्रश्नद्वारा तथा उनकी सेवा करते हुए प्राप्त कर ।' इस प्रकार वे अवश्य तुझे तत्त्व- ज्ञानका उपदेश करेंगे। वस्तुतः गुरु-कृपासे सब कुछ सुलभ है। प्रभु परमेश्वरकी कृपाका आधार भी गुरु-कृपा ही है। बिना गुरुकी कृपाके परम प्रभुकी कृपा नहीं होती, और बिना प्रभुकी कृपा तत्त्वज्ञान नहीं मिलता। उपनिषद्का स्पष्ट प्रवचन है- यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनू स्स्वाम् ॥ (कठ० १।२।२३) अर्थात् यह परमात्मा जिसके ऊपर कृपा करता है, वही इसे प्राप्त कर पाता है। उसीके लिये यह अपने यथार्थस्वरूप- को प्रकाशित कर देता है। ८-इस प्रकार हमने देखा कि गुरुकी महिमा अनन्त है। उपनिषद्-वाङ्मय अनेक तत्त्वदर्शी गुरुओके वाक्य ही तो हैं जो कि भिन्न भिन्न कालोंमें भिन्न-भिन्न रीतियोसे उसी एक तत्त्वज्ञानका उपदेश कर रहे हैं। हमे गुरुपदेशके समान श्रद्धापूर्वक औपनिषदिक वाक्योंका अनुशीलन करना चाहिये। इतस्ततः उठी हुई शङ्काओंके उत्तर भी श्रद्धापूर्वक उन्हींमें इतस्ततः खोजने चाहिये। अथवा किसी ज्ञानी गुरुसे उन शङ्काओंका निवारण करना चाहिये। यदि श्रद्धा है तो अवश्य ही शङ्काओंका समाधान होता जायगा-यह मेरा दृढ विश्वास है। भगवान् श्रीकृष्णजीके द्वारा कितना दृढ आश्वासन दिया गया है- श्रद्धावाँल्लभते ज्ञान तत्पर सयतेन्द्रियः । ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥ ( गीता ४ । ३९ ) 'ज्ञान परायण, जितेन्द्रिय पुरुष, यदि श्रद्धावान् है, तो अवश्य तत्त्वज्ञानको प्राप्त करता है। ज्ञानको प्राप्त करके वह शीघ्र ही परम शान्तिको भी पाता है।' ९-सारांश यह कि उपनिषद्-वाङ्मयसे पाठकोंका सम्बन्ध गुरु शिष्य-सम्बन्ध होना चाहिये। शङ्काएँ उठें, कोई चिन्ता नहीं ! धैर्यपूर्वक श्रद्धा-समन्वित होकर उनका समाधान प्राप्त करनेकी उत्कण्ठा रक्खे, समाधान अवश्य प्राप्त होगा- शीघ्र ही प्राप्त होगा। श्रद्धाकी महिमा अपार है। अतः उपनिषद् (वेदान्त) के वाक्य साक्षात् गुरुवाक्य हैं। इसी- को निःश्रेयस वाक्य भी कह सकते हैं। यही परा विद्या है। यह आत्मानुभव प्रमाण है। इसको जानकर फिर कुछ जानना शेष नहीं रहता। यही जानना परम प्रयोजनरूप मोक्षका साधन है। त्वमेव सर्वम् (रचयिता--श्रीभगवतीप्रसादजी त्रिपाठी, विशारद, काव्यतीर्थ, एम्० ए०, एल्-एल्० बी०) यात्री तुम्हीं भवसागर केवट पोत तुम्हीं पतवार तुम्ही हो । दर्शक दृश्य तुम्हीं नटनागर नायक नाटककार तुम्हीं हो ॥ व्यष्टि समष्टि अहंकृति हो मन बुद्धि तुम्हीं हो, विचार तुम्हीं हो । जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति तुरीय अकार उकार मकार तुम्हीं हो ॥१॥ विष्णु पुकारते कोई तुम्हें शिव कोई हैं शक्ति महा बतलाते । ईश्वर कोई परंरस कारण ब्रह्म हैं कोई तुम्हें ठहराते ॥ शंकर एक ही राम कभी घनश्याम स्वरूप तुम्हीं बन जाते । बुद्बुद वीचि प्रवाह यथा जल एक अनेक स्वरूपमें पाते ॥२॥
गीतोपनिषद् (लेखक—स्वामी श्रीराजेश्वरानन्दजी भगवान् श्रीकृष्णने भारतवर्षके कुरुक्षेत्र नामक रण- प्राङ्गणमे अर्जुनको अपनी भगवद्गीता सुनायी और यों अर्जुनको निमित्त बनाकर सारे संसारको वह दिव्य उपदेश प्रदान किया। गीताका मूल स्रोत महाभारत नामक महाकाव्य है, जो एक प्रकारका विश्वकोश है। गीता महाभारतकी मुकुट मणि है। गीता विश्वसंस्कृतिकी कुञ्जी है, और गीताके प्रकाशक स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण हैं। यह समूची मानव-जातिके लिये धर्मग्रन्थ है। यह एक उपनिषद् है; ज्ञानका उज्ज्वल प्रदीप है। यही ब्रह्मविद्या है, योगशास्त्र है एवं आध्यात्मिक जीवनका दिव्य संदेश है। यह श्रीकृष्ण और अर्जुन (नारायण और नर) का संवाद है। गीता मनुष्यको भगवान्का साक्षात्कार कराती है तथा जीवनमे सरसता एव सरलता प्रवाहित करती है। अर्जुनके व्यष्टि चैतन्यका परिच्छिन्न भवन तोड़ देनेपर स्वयं श्रीकृष्ण ही सामने उपस्थित हो जाते हैं। समस्त जीवात्माओंके सामान्य केन्द्र भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं। श्रीकृष्ण पृथिवीके लिये स्वर्गका द्वार खोल देते हैं और बिना जाति, वर्ण, सम्प्रदाय, देश या स्त्री-पुरुषके भेदके जीवमात्रको अपने राज्यमें प्रवेश करनेकी अनुमति प्रदान करते हैं। गीताकी सर्वतोमुखी शिक्षा, जीवनके प्रत्येक क्षेत्रसे लोगोंको उन्नतिकी ओर ले जानेवाली ज्योति है। श्रीकृष्ण जगद्गुरु हैं। वे विश्वात्मा हैं, दिव्य प्रेरणा तथा आध्यात्मिक प्रकाशके केन्द्र हैं। यद्यपि गीता ऊपरसे जगत्कल्याणकी भावनाको लेकर लोकसंग्रहका निष्काम सेवाके सिद्धान्तके रूपमें उपदेश देती है, तथापि उसका हृद्गत ध्येय भगवत्प्राप्ति है। अतएव गीता मानवताको भगवत्सत्तासे ऊपर स्थान नहीं देती, और न उसे भगवान्के स्थानपर ही बिठाती है। गीताकी दृष्टिमें मानव- सेवा माधव-सेवा नहीं है, वर वह माधव सेवामें ही मानव-सेवा मानती है। भगवत्प्राप्त पुरुष ही मनुष्योंकी यथार्थ सेवा कर सकता है। मन, वाणी और कर्मसे दिव्य तत्त्वका अनुभव एव अभिव्यञ्जन ही जीवनका लक्ष्य है, वही जीवात्माका गन्तव्य स्थान है। कर्तव्यके लिये कर्तव्यका अनुष्ठान, केवल समाज-सेवा, लोकहितके कार्य, शाब्दिक सहानुभूति तथा इसी प्रकारके अन्य सिद्धान्त गीताकी सार्वभौम-शिक्षाको विकृत और सीमाबद्ध कर देते हैं। भगवत्-स्वरूपकी अभिव्यक्ति ही इसका मूल मन्त्र है, समाज-पूजा नहीं । व्यावहारिक दृष्टिसे जीवनको साधनके द्वारा सुव्यवस्थित बनाने और अपने स्वधर्मका ज्ञान प्राप्त करनेमें, अपने अधिक- से-अधिक अनुकूल पद्धतिके द्वारा अग्रसर होनेमें एव अपने स्वधर्मका निर्णय करके उसका तदनुसार अनुष्ठान करनेमें गीताके उपदेशोंसे बड़ी सहायता मिलती है। अपने स्वरूपके अनुकूल होनेके कारण स्वधर्म स्वाभावरूप होता है और अपने वास्तविक स्वरूपका अभिव्यञ्जक होनेके कारण वह सहज होता है। स्वधर्ममे सर्वश्रेष्ठ भगवत्ता है और उसीमें भगवदीय श्रेष्ठता रहती है। उसमें नित्य-पूर्णता विद्यमान रहती है। वह भगवान्की मुरलीके स्वर में स्वर मिलाकर जीवनके उद्देश्यको पूरा करता है और इस प्रकार मर्त्यलोकमें दिव्यताको उतार देता है। वह व्यक्तिके समग्र जीवनको भगवान्के एक दिव्य मधुर सङ्गीतमें परिणत कर देता है, क्योंकि वह विश्वात्मा सभी देशों और सभी जातियोंके मनुष्योंमें समान रूपसे व्याप्त है। गीता मनुष्यकी इन्द्रियोंको उसके अधीन करके उसे उनका स्वामी बनाती है। उसका यह स्वामित्व नष्ट न होने पाये, इसके लिये गीता चाहती है कि वह भगवान्के बनाये हुए नियमोंका दृढतासे निरन्तर पालन करे। इस प्रकार चलनेवाले मनुष्यमें एक उज्ज्वल सौम्यता एव सौम्य कान्ति झलकती है। उसके कर्मोंमें योगियोंका-सा, उपासनामें देवताओंका सा एव ज्ञानमें ऋषियोंका सा तेज तथा गौरव दिखायी पड़ता है। गीता बाह्य उपरामताको धार्मिकताके रूपमें नहीं सजाती। प्रकृतिमे अचलता नहीं है। मनुष्य अचानक अथवा एकाएक बादलोंसे नहीं टपक पड़ता। वह यन्त्र भी नहीं है। प्रत्येकका जन्म किसी उद्देश्यकी पूर्तिंके लिये होता है, जिसके लिये उसे भगवदीय शक्तिका साहाय्य मिलता रहता है। जिन प्रश्नोंको हल करनेमें मानवीय बुद्धि कुण्ठित हो जाती है, उनपर गीता प्रचुर प्रकाश डालती है। वह विश्वका नियमन करनेवाले आध्यात्मिक, नैतिक, मानसिक एव भौतिक नियमोंका निर्देश करती है। गीता अपना निराला तेज एव प्रभाव रखनेवाली जीवन-सुधा है।
१०२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * इस सार्वभौम शास्त्रके विचारपूर्ण अध्ययनसे अहिंसाका मूल तत्त्व प्रकट होता है । श्रीकृष्णने अर्जुनके अज्ञानजनित मोहका नाश करके उसके संकुचित स्वजन-अभिमानको दूर कर दिया । युद्धारम्भ-जैसे अवसरपर अपनेको भगवदीय न्यायकी प्रतिष्ठामें निमित्त न मानना ही उनका अज्ञान था । श्रीकृष्ण अर्जुनके भय, शोक, अमर्ष, द्वेष, कामना और राग आदि उन दोषोंको हर लेते हैं, जो हिंसाके दुष्ट सहचर हैं। बाहरसे देखनेमें हिंसाका स्थूल आवरण अक्षुण्ण बनाये रख- कर भगवान्ने अर्जुनके आध्यात्मिक आधारको सर्वथा परिवर्तित कर उन्हें अहिंसाकी प्रतिमूर्ति बना दिया । इस प्रकार केवल भगवान्के आश्रित होकर, बिना किसी पुरस्कारकी आशाके तथा उनके प्रति आत्मसमर्पणकी भावनामे स्थिर हुआ अर्जुन कर्म करता हुआ भी नहीं करता, मारता हुआ भी नहीं मारता, क्योंकि गीतामे उसकी क्रियाएँ अब अहङ्कारके विषैले दशसे मुक्त हो गयी हैं। अहिंसा और अमरता गीतामें साथ-साथ चलती हैं। कूटस्थ साक्षीके रूपमें रहना अर्थात् संसारमें रहता हुआ प्रतीत होनेपर भी उससे बिल्कुल निर्लिप्त रहना ही वह अमर जीवन है । इसी स्थितिसे अकर्ममें कर्म और कर्ममें अकर्मका विज्ञान प्रकट होता है । श्रीकृष्ण साक्षात् वह आत्मतत्त्व है, जो समस्त ज्ञानका केन्द्र एव परिधि दोनों है । जगत्की लौकिकताके मोहक स्वरूपके परे दृष्टि डालना; अपने स्वरूपके, अपनी स्वाभाविक चरित्रगत विशेषताओंके, सहज प्रवृत्तियोंके सम्बन्धमें विचार करना, नैसर्गिक प्रेरणाओंका तथा एकता एव सामञ्जस्य उत्पन्न करनेवाले रचनात्मक गुणोंका अध्ययन कर उनपर सार्वभौम दृष्टिसे विचार करना, विशाल मानवताके धरातलपर खड़े होकर सुख दु.खका अनुभव करना और अपने अदर भगवत्तत्त्वको अभिव्यक्त करना सीखो। यही मानव-जातिके प्रति श्रीकृष्णका सनातन सन्देश है । इस प्रकार गीता धर्म और अध्यात्मको हमारे दैनन्दिन जीवनसे वियुक्त नहीं करती। संसारमें आज एक धार्मिक भूकम्प हो रहा है। भौतिक- वादपर अवलम्बित वर्तमान वैज्ञानिक दृष्टिकोणसे उत्पन्न 'हुई कृत्रिम जीवनचर्याका अनुगमन धर्मके उच्चतर आदर्शोंको पीछे ढकेल देना और सुखकी मृगतृष्णाके पीछे दौड़ना है। धर्म व्यापारकी वस्तु नही है । धर्म विनिमयका सिद्धान्त नहीं है, सट्टे बाजारमे होनेवाल मानदीय सौदा- नहीं है। धर्म तो जीवनको दिव्य बनाने का एक शक्तिशाली साधन है । धर्म ही वह शक्ति है जो दिनके प्रकाशसे भी तनकर चलती है, जब कि अन्य समस्त विज्ञान रात्रिके अन्धकारमे भी आँखें बचाते हुए टेढे मेढ़े मागोंसे छिपकर चलते हैं । धर्मकी अधिदेवता ही मनुष्यकी भगवत्ताका दावेके साथ प्रतिपादन करके मानव- जातिकी समस्याओंका निश्चयात्मक समाधान करती है। यही अलौकिक जगत्से परेका तत्त्व है और वही मनुष्यके भीतर रहनेवाली वस्तु है। धर्मका बाह्य रूप केवल छिलका और भूसी है । यथार्थ आध्यात्मिक जीवन सनातन तत्त्वमें स्थित और अनन्तमे प्रतिष्ठित है। वह सदा अमर और नित्य वर्तमान है। वह सर्वदा पूर्ण है, जन कि अनित्य एव क्षणभङ्गुर प्रातिभासिक जीवनकी स्थिति इस परिवर्तनशील जगत्में है, वह प्रकृति एव मनतरू पङ्गमें डुबा हुआ है । अतएव यह जीवन प्रतिक्षण होनेवाली मृत्यु है। मृत्युमे ही जीना है। धर्म ही संतोंका सतपना है, ज्ञानियोंका ज्ञान है और बलवानोंका बल है। यही परात्पर शान्ति है, यही व्यक्तियों एव राष्ट्रोंकी पीड़ा यन्त्रणाकी महौषध है। यह समारको, मारे राष्ट्रां एव समस्त जातियोंको मनुष्योंके परस्पर भ्रातृत्व तथा भगवान्के पितृत्वसे भी आगे एकमात्र आत्मभावनाकी ओर ले जाता है। सक्षेपमें आजके विच्छिन्न एव भ्रान्त जगत्के लिये यही एक ध्रुव आशा है । ससारके घावोंको केवल यही निश्चितरूपसे भर सकता है। कहा जाता है कि गायत्री-मन्त्रके प्रत्येक अक्षरके पीछे एक-एकके हिसाबसे श्रीकृष्णने चौबीस गीताएँ कही हैं; परतु उनमेंसे केवल भगवद्गीता तथा उत्तरगीता ही ससारमें प्रसिद्ध हो पायीं। भगवद्गीताका ससारकी प्राय. सभी भाषाओंमें अनुवाद और व्याख्या हो चुकी है। गीताके आध्यात्मिक अर्थ बाह्यावरणोंके आडम्बरपूर्ण त्याग नहीं हैं। समाजका चरम तत्त्व मानव है। मनुष्यके चरम तत्त्व भगवान् हैं। और भगवान्का चरम तत्त्व है- 'मैं' एव 'मेरा' के त्यागद्वारा, सदसद्विवेकके द्वारा तथा एक अद्वितीय निर्गुण सत्ताके अपरोक्षानुभवके द्वारा उनकी प्राप्ति । आत्मतत्त्व ( ब्रह्मतत्त्व) का ज्ञान, जिसकी भूख मनुष्यको सदा बनी रहती है, उनके क्षुद्र अहङ्कारकी सीमामे नहीं ठहरता। अहङ्कारी जीव उसको ग्रहण ही नहीं कर सकता । वह अहङ्कारके परे है। सभी साधनों और फलाके अन्तर्गत भी है तथा उन सबका चरम फल भी यही है । इसकी प्रतीति होती है एकत्वकी अनुभूतिमें, उस नैसर्गिक एव विशुद्ध ज्ञानकी अवस्था में, जो अन्तरतम एव अपरोक्ष है, जहाँ जाननेका अर्थ है वही बन जाना और वही बन जाना ही जानना है।
- जीवात्मा और परमात्माकी एकता * १०३
प्रतिदिन प्रातःकाल एव सायकाल गीताके एक या दो ही श्लोकोंके भावका मनन, चिन्तन एव ध्यान मनुष्यके जीवनमे दिव्य सुधाधाराका मञ्चार करानेमें बहुत बड़ा निमित्त बन जाता है। यदि इन पक्तियोको पढकर किसीके मनमे भगवान्के लिये तीव्र लालसा जाग उठे और वह सच्चाईके साथ विस्तार- पूर्वक भगवद्गीताके गम्भीर अध्ययनमे लग जाय तो इस क्षुद्रं लेखके उद्देश्यकी उचित रीतिसे पूर्ति हो जायगी । भगवान् श्रीकृष्ण सबके सखा, तत्त्वोपदेशक और मार्ग- दर्शक बनें ।
जीवात्मा और परमात्माकी एकता ( लेखक--पं० श्री. हरिकृष्णजी झा, व्याकरण-वेदान्ताचार्य, वेद-शास्त्री, साहित्यालङ्कार )
[ तत्त्वमसि ] 'उपनिषद्' शब्दका अर्थ है-उप समीपं निषीदति प्राप्नोति-इति उपनिषद् अर्थात् जिसके द्वारा परम समीप- भूत ब्रह्मका साक्षात्कार हो, वह हुआ उपनिषद् । 'तत्त्वमसि' इम उपनिषद् महावाक्यमे 'तत्, त्वम्, असि' शब्दत्रयका मम्मिन्नण है । 'तत्' अर्थात् वह परवाचक शब्द है, 'त्वम्' (तू) यह मम्बोवाचक है, 'असि' (हो)- यह शब्द 'तत्' और 'त्वम्' दोनोकी एकताका प्रतिपादक है। जहत्-अजहत् भागत्यागके भेदसे लक्षणा तीन प्रकारकी होती है। जिसमें कहे हुएको छोड़कर तथा उसमे सम्बन्धित दूसरोंका ग्रहण किया जाय उसे जहल्लक्षणा कहते हैं । यथा 'गङ्गाया यग्दत्तस्तिष्ठति' यहाँपर गङ्गाको छोड़कर तत्रस्थ गृहका बोध होता है। जिसमे कहे हुए और उमसे सम्बन्ध रखनेवालेका भी ग्रहण हो, उसे अजहल्लक्षणा कहते हैं। यथा--'काकेभ्यो दधि रक्ष्यताम्'-अर्थात् कौओंसे दहीकी रक्षा कीजिये । यहाँ काकातिरिक्त जीवमात्रका भी बोध होता है। भागत्यागलक्षणा उसे कहते हैं, जिसमे उपाधि छोड़कर सत्याशका ग्रहण हो। यथा 'अय मनुष्य, स एव'--यह मनुष्य वही है। इसमें मनुष्यमात्रका ग्रहण होता है । भूत और वर्तमानकालिक उपाधि त्याज्य है। अत्र 'तत्', 'त्वम्' 'असि'मे 'सोऽय देवदत्तः'के समान भागत्यागलक्षणाकी ही प्राप्ति होती है, क्योकि शुद्ध सत्त्वगुण, और मलिन सत्त्वगुण, इन्हीं उपाधियोंसे जीवात्मा और परमात्माके भेद कल्पित हैं । अर्थात् शुद्ध सत्त्वगुणमें पड़ा हुआ बिम्ब मायाको स्वाधीन करनेसे हिरण्यगर्भताको प्राप्त होकर जगत्का उपादान कारण है । इसी निमित्त उपादानात्मकको 'तत् ब्रह्म' कहते हैं। फिर वही बिम्ब जो कि मलिन सत्त्वगुणमें पड़ता है, अविद्याके वशीभूत होकर विविध कामनाओं तथा कर्मोंसे दूषित होनेसे 'त्वम्' जीव शब्दसे व्यवहृत होता है । इन परस्परविरोधिनी शुद्ध सत्त्व ओर मलिन सत्त्वरूप उपाधियोंको छोड़ देनेसे 'त्वम्' (जीव) तथा तत् (ईश्वर) की एकता होती है । पुनः शुद्ध सत्त्वगुण उपाधिरहित ईश्वर और मलिन सत्त्वगुण उपाधिरहित जीवका अद्वितीय सच्चिदानन्द परब्रह्ममें ही समावेश होता है । इस प्रकार माया और अविद्या- रूपी उपाधिको त्याग करके ही अखण्ड सच्चिदानन्द 'तत्त्वमसि' इत्यादि वेदान्त-महावाक्यसे लक्षित होता है, इस प्रकार जीवात्मा और परमात्माकी एकता होती है । मायाविद्ये विहायैवमुपाधी परजीवयोः । अखण्डं सच्चिदानन्दं महावाक्येन लक्ष्यते ॥ इस एकताकी प्रक्रिया यों है-- आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्या- सितव्य आत्मसाक्षात्कार. कर्तव्य. । अर्थात् अध्यात्मनिष्ठ गुरुदेवके पास जाकर उक्त तत्त्व- मस्यादि वाक्योका अर्थाध्ययन कर चित्तमे स्थिर रखना 'श्रवण' शब्दसे कथित है । श्रुत पदार्थका सयुक्तिक पुनः-पुनः विचार करना 'मनन' है । मनन और श्रवणद्वारा निस्सन्देह हुई चित्तकी एकाकार वृत्तिको 'निदिध्यासन' कहते हैं-- ताम्या निर्विचिकित्सेऽर्थे चेतस. स्थापितस्य यत् । एकतानत्यमेतद्धि निदिध्यासनमुच्यते ॥ जब पवनरहित दीपकके तुल्य ध्येयमें ही चित्त हो, ध्याता और ध्यानका ज्ञान न रह जाय, उसे समाधि कहते हैं ।
समाधिका दूसरा नाम ध्यातृध्याने परित्यज्य क्रमाद् ध्येयैकगोचरम् । निवातदीपवच्चित्तं समाधिरभिधीयते ॥ समाधिका अन्य नाम धर्ममेघ भी है, क्योंकि इससे धर्म-
१०४ - महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति - की सैकड़ों धाराएँ निकली हैं। समाधिने सञ्चित कर्म नष्ट | अनिष्टव्य सम्पूर्ण पातकोंको जलाकर भस्म करता है। अपरोक्ष होते हैं तथा निर्मल धर्मकी वृद्धि होती है। प्रथम समाधिद्वारा | ज्ञान तो इस संसारसे उत्पन्न अज्ञानरूपी अन्धकारको नष्ट परोक्ष ब्रह्मज्ञान होता है तदनन्तर अपरोक्ष ब्रह्मज्ञान होता | करनेवाला सूर्य ही है। इम रीतिसे 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों- है। सद्गुरुओंकी कृपासे महावाक्योंद्वारा प्राप्त परोक्ष ज्ञान | द्वारा जीवात्मैक्यकी अपरोक्षानुभूति होती है।
पाश्चात्य पण्डितोंपर उपनिषद्का प्रभाव ( लेखक—श्रीरानमोहन चक्रवर्ती पी-एच० डी०, पुरानरत्न, विद्याविनोद )
वैदिक साहित्यके साथ पाश्चात्य जातिका प्रथम परिचय | पण्डितोंकी दृष्टि इधर कुछ आकर्षित तो हुई, किंतु अनुवाद होता है उपनिषदोंके द्वारा। सम्राट् शाहजहाँके ज्येष्ठ पुत्र | का अनुवाद होनेके कारण वह इतना अस्पष्ट और दुर्बोध हो दाराशिकोह अपनी धर्मसम्बन्धी उदारताके लिये भारतके | गया था कि उसका मर्म समझकर रसास्वादन करना सहज इतिहासमें प्रसिद्ध हैं। उन्होंने हिंदू तथा मुसल्मान-धर्मके | नहीं था। इसी समय नामवन्त फ्रान्सके अङ्गान्तर्वर्ती एक समन्वयके लिये विशेष चेष्टा की थी और इसलिये उन्होंने | सूक्ष्मदर्शी दार्शनिक 'औपनेखत' की आलोचनामें लगे और फारसीमें 'मजमा उल-बहरैन'* नामक एक ग्रन्थका भी | गम्भीर अध्यवसायके साथ दुर्बोध भागके कठिन पर्देको निर्माण किया था। सन् १६४० ईस्वीमें जब दारा कश्मीर- | फाड़कर उन्होंने अन्तर्वाहिनी पीयूषधाराका आविष्कार में थे तब उन्हें सर्वप्रथम उपनिषदोंकी महिमाका पता | किया। ये महाशय थे—जर्मनीके सुप्रसिद्ध दार्शनिक लगा। उन्होंने काशीसे कुछ पण्डितोंको बुलाया और उनकी | श्रीअर्थर शोपेनहर (Aurther Schopenhauer)। सहायतासे पचास उपनिषदोंका फारसीमें अनुवाद किया। | (सन् १७८८—१८६०) शोपेनहरने बहुत कठिन परिश्रम करके १६५७ ईस्वीमें यह अनुवाद पूरा हुआ। इसके प्राय तीन | उक्त अनुवादका अध्ययन किया और मुक्तकण्ठसे यह घोषणा वर्षके बाद सन् १६५९ ईस्वीमें औरंगजेबके द्वारा दाराशिकोह | की कि 'मेरा अपना दार्शनिक मत उपनिषद्के मूल तत्त्वोंके मारे गये। | द्वारा विशेषरूपमे प्रभावित है।' इस प्रसङ्गमे मनीषी शोपेन- अकबरके राज्यकालमें भी (१५५६—१५८५) कुछ | हरने उपनिषद्के महत्त्व और प्रभावके सम्बन्धमे जो कुछ उपनिषदोंका अनुवाद हुआ था, परंतु अकबर अथवा दारा- | कहा है, वह विशेषरूपसे ध्यान देने योग्य है— के द्वारा सम्पादित इन अनुवादोंके प्रति सन् १७७५ ईस्वीसे | 'मैं समझता हूँ कि उपनिषद्के द्वारा वैदिक साहित्यके पहलेतक किसी भी पाश्चात्य विद्वान्की दृष्टि आकर्षित नहीं | साथ परिचय लाभ होना वर्तमान शताब्दी (१८१८) का हुई। अयोध्याके नवाब शुजाउद्दौलाकी राजसभाके फरासी | सबसे अधिक परम लाभ है जो इसके पहले किन्हीं भी रेजिडेंट श्री एम० गेंटिल (M Gentil) ने सन् १७७५में | शताब्दियोंको नहीं मिला। मुझे आशा है, चौदहवीं शताब्दी- प्रसिद्धयात्री और जिन्दावस्ताके आविष्कर्त्ता एन्केतिल डुपेरंन | में ग्रीक-साहित्यके पुनरभ्युदयसे यूरोपीय साहित्यकी जो उन्नति (Anquetil Duperron) को दाराशिकोहके द्वारा | हुई थी, संस्कृत-साहित्यका प्रभाव उसकी अपेक्षा कम फल सम्पादित उक्त फारसी अनुवादकी एक पाण्डुलिपि भेजी। | उत्पन्न करनेवाला नहीं होगा। यदि पाठक प्राचीन भारतीय ऎन्क्वेतिल डुपेरंनने कहींसे एक दूसरी पाण्डुलिपि प्राप्त की | विद्यामें दीक्षित हो सकें और गम्भीर उदारताके साथ उसे और दोनोंको मिलाकर फ्रेंच तथा लैटिन भाषामें उक्त फारसी | ग्रहण कर सकें तो मैं जो कुछ कहना चाहता हूँ, उसे वे अनुवादका पुनः अनुवाद किया। लैटिन अनुवाद | अच्छी तरह समझ सकेंगे। उपनिषद्मे सर्वत्र कितनी सुन्दरता- सन् १८०१-२ में 'औपनेखत' (Oupnekhat) नाम- | के साथ वेदोंके भाव प्रकाशित हैं। जो कोई भी उक्त फारसी- से प्रकाशित हुआ। फ्रेंच अनुवाद नहीं छपा। | लेटिन (Persian-Latin) अनुवादका ध्यान देकर उक्त लैटिन अनुवादके प्रकाशित होनेपर पाश्चात्य | अध्ययन करके उपनिषद्की अनुपम भावधारासे परिचित | होगा, उसकी आत्माके गम्भीरतम प्रदेशतकमे एक हलचल | मच जायगी। एक एक पंक्ति कितना दृढ़, सुनिर्दिष्ट और
- 'Majma-ul Bafuran' - ( एशियाटिक सोसाइटी बङ्गाल, कलकत्ताके द्वारा प्रकाशित १९२९)
- पाश्चात्य पण्डितोंपर उपनिषद्का प्रभाव * १०५ सुसमञ्जस अर्थ प्रकट कर रही है । प्रत्येक वाक्यसे कितना गभीर, मौलिक और गम्भीरतापूर्ण विचारसमूह प्रकट हो रहा है, सम्पूर्ण ग्रन्थ कैसे उच्च, पवित्र और ऐकान्तिक भावोंसे ओतप्रोत है । x x x सारे पृथ्वीमण्डलमे मूल उपनिषद्- के समान इतना फलोत्पादक और उच्च भावोद्दीपक ग्रन्थ कहीं भी नहीं है। इसने मुझको जीवनमे शान्ति प्रदान की है और मरणमे भी यह शान्ति देगा' ।¹ जिस देशमें उपनिषद्के गम्भीर सत्यसमूहका प्रचार था, उस देशमें ईसाई-धर्मके प्रचारका प्रयत्न व्यर्थ होगा और निकट भविष्यमें यूरोपीय विचारधारा उक्त उपनिषद्के द्वारा पूर्णरूपसे प्रभावित हो जायगी—इस सम्बन्धमें शोपेनहरने कहा था— 'भारतमें हमारे धर्मकी जड़ कभी नहीं गड़ेगी । मानव- जातिकी 'पुरानी प्रजा' गैलिलिकी घटनाओंसे कभी निराकृत नहीं होगी। वरं भारतीय प्रजाकी धारा यूरोपमे प्रवाहित होगी एवं हमारे ज्ञान और विचारमें आमूल परिवर्तन ला देगी' ।² उनकी यह भविष्य-वाणी सफल हुई । स्वामी विवेकानन्द- की अमेरिकन शिष्या 'सारा बुल' (Sarra Bull) ने अपने एक पत्रमें लिखा था कि 'जर्मनीका दार्शनिक सम्प्रदाय, इङ्गलैंडके प्राच्य पण्डित और हमारे अपने देशके एमरसन आदि साक्षी दे रहे हैं कि पाश्चात्य विचार आजकल सचमुच ही वेदान्तके द्वारा अनुप्राणित हैं।'³ सन् १८४४ में बर्लिनमें श्री शेलिंग (Schelling) महोदयकी उपनिषत्सम्बन्धी व्याख्यान-मालाको सुनकर प्रसिद्ध पाश्चात्य पण्डित श्रीमैक्समूलर (Max Muller) का ध्यान सबसे पहले संस्कृत साहित्यकी ओर आकृष्ट हुआ । उपनिषदोंके सम्बन्धमें विचार आरम्भ करते ही उन्होंने अनुभव किया कि उपनिषदोंका यथार्थ मर्म समझनेके लिये पहले उनसे पूर्वरचित वेद-मन्त्र और ब्राह्मणभागपर विचार करना आवश्यक है । इस प्रकार उपनिषदोंसे उन्होंने वेद- चर्चाके लिये प्रेरणा प्राप्त की । शोपेनहरके बाद अनेकों पाश्चात्य विद्वानोंने उपनिषद्पर विचार करके विभिन्न प्रकार- से उसकी महिमा गायी है। किसी-किसीने तो उपनिषद्को 'मानव-चेतनाका सर्वोच्च फल' बतलाया है ।⁴ उपनिषत्-प्रतिपादित वैदान्तिक धर्म ही देर सबेर सम्पूर्ण पृथिवीका धर्म होगा—बहुतसे मनीषियोंने ऐसी भविष्य-वाणी की है। शोपेनहरने 'उन्नीसवीं शताब्दी'के प्रथम भागमें लिखा है—"It is destined sooner or later to become the faith of the people " विश्वकवि रवीन्द्रनाथने कहा है—'चक्षुसम्पन्न व्यक्ति देखेंगे कि भारत- का ब्रह्मज्ञान समस्त पृथिवीका धर्म बनने लगा है । प्रातः- कालीन सूर्यकी अरुण किरणोंसे पूर्वदिग् आलोकित होने लगी है, परतु जब वह सूर्य मध्याह्न-गगनमें प्रकाशित होगा, उस समय उसकी दीप्तिसे समग्र भूमण्डल दीप्तिमय हो उठेगा ।' स्वामी विवेकानन्दने वर्तमान भारतके जीवनमें उपनिषद्- की कार्यकारिताकी मुक्तकण्ठसे घोषणा की है। गत सहस्रों वर्षोंसे हमारे जातीय जीवनमे जो दोष-दौर्बल्य आ गया है, जिसने हमको नितान्त निर्वीर्य बना डाला है, उसको हटाने- में एकमात्र उपनिषद्के महान् वीर्यप्रद सत्य ही समर्थ हैं। 'भारतीय जीवनमें वेदान्तकी कार्यकारिता' नामक व्याख्यान- मे स्वामीजीने कहा है— 'बन्धुओ ! स्वदेशवासियो ! मै जितना ही उपनिषदोंको पढता हूँ, उतना ही तुमलोगोंके लिये आँसू बहाता हूँ । हमारे लिये यह आवश्यक हो गया है कि उपनिषदुक्त तेजस्विताको ही हम अपने जीवनमें विशेषरूपसे परिणत करें। शक्ति,—बस, शक्ति ही हमें चाहिये, हमें शक्तिकी विशेष आवश्यकता आ पड़ी है। हमें कौन शक्ति देगा ? । x x x उपनिषदें शक्तिकी महान् खानें हैं । उपनिषद् जिस शक्तिका सञ्चार करनेमें समर्थ है, वह ऐसी है कि सम्पूर्ण 1 From every sentence deep, original and sublime thoughts arise, and the whole is pervaded by a high and holy and earnest spirit In the whole world there is no study, except that of the originals, so beneficial and so elevating as that of the Oupnekhat. It has been the solace of my life, it will be the solace of my death
- In India our religion will now and never strike root. The primitive wisdom of the human race will never be pushed aside by the events of Galilee. On the contrary, Indian wisdom will flow back upon Europe, and produce a thorough change in our knowing and thinking
- The German schools, the English Orientalists and our own Emerson testify the fact that it is literally true that Vedantic thoughts pervade the Western thought of today उ० अं० १४— 1 'Personally I regard the Upanisads as the highest product of the human mind, the crystallized wisdom of divinely illumined men' Dr Annie Besant
१०६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * जगत्को पुनर्जीवन, शक्ति और शौर्य-वीर्य प्रदान करनेमें समर्थ है। जगत्की समस्त जातियों, समस्त मतो और सभी सम्प्रदायोंके दीन, दुर्बल, दुखी और पददलित प्राणियोंको पुकार पुकारकर कह रही है कि 'सभी अपने पैरोंपर खड़े होकर मुक्त हो जाओ।' मुक्ति या स्वाधीनता-दैहिक स्वाधीनता, मानसिक स्वाधीनता और आध्यात्मिक स्वाधीनता- यही उपनिषद्का मूल मन्त्र है। जगद्भरमे यही एकमात्र शास्त्र है जो उद्धार (Salvation) की बात नहीं कहता, मुक्तिकी बात कहता है। यथार्थ बन्धनसे मुक्त होओ, दुर्बलता- से मुक्त होओ।'
उपनिषदोंमें वाक्का स्वरूप (लेखक---पं० श्रीरामसुरेशजी त्रिपाठी, एम्० ए०)
वाणी चेतनाकी अमर देन है। वाणीके बिना जगत् सूना है, जीवन पङ्गु है। संसारके प्रायः सारे व्यवहार वाणी-व्यापार- पर ही निर्भर हैं। सभ्यता और संस्कृति इसकी गोदमें फूलती फलती हैं। वाणी केवल विचारोंके विनिमयका ही माध्यम नहीं, अपितु विश्वमें जो कुछ सत्य है, शिव है, सुन्दर है, उन सबका भी व्यञ्जक है। इस वाणीकी दूसरी प्राचीन सञ्ज्ञा वाक् है। वाक्के विषयमे उपनिषदोंमें मधुर उद्गार तथा युक्तिपूर्ण विचार भरे पड़े हैं; साथ ही इसके भौतिक, दैविक तथा आध्यात्मिक रूपकी रेखा भी खींची गयी है, जिसे देख आजका भाषा-विज्ञानका विद्यार्थी भी एक बार चकित रह जाता है। उपनिषत्-कालीन वाक्के स्वरूपकी पीठिका वेदोंमे ही तैयार हो गयी थी और उसी समय इसे रहस्यकी कोटिमें डाल दिया गया था। जलमें, थलमें, ओषधियोंमें-सबमें दैवी सत्ताको परखनेवाले वैदिक ऋषि वाक्को अनुकरणमूलक (Onomatopoeic) या मनोराग-व्यञ्जक (Inter- jectional) कैसे मान सकते थे। ऋग्वेदके अनुसार वाक्- को देवोंने पैदा किया- 'देवीं वाचमजनयन्त देवा.।' (ऋक्संहिता, निरुक्त ११। २९ में उद्धृत) इस वाक्के चार विभाग है- 'चत्वारि वाक् परिमिता पदानि।' (ऋक्संहिता १। १६४। ४५) महाभाष्यकार पतञ्जलिने इन चारसे नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपातका ग्रहण किया है। वाक्के परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी रूपका सकेत भी इसी मन्त्रमे माना जाता है। ब्राह्मणग्रन्थोंमे चार प्रकारके विभागको दूसरे रूपोंमें भी व्यक्त किया है (देखिये निरुक्त १३। ९)। ऋग्वेदके दसवें मण्डलके १२५वें सूक्तकी द्रष्टा 'वाक्' नामकी एक विदुषी है। वह अम्भृण महर्षिकी पुत्री थी। उसने स्वय अपनी (वाक्की) स्तुति परमात्माके रूपमें की है। इस सूक्तमें वाक्के अलौकिक रूपकी झलक है। पर साथ ही वैदिक ऋषियोंने वाक्के लौकिक रूपकी भी उपेक्षा नहीं की है। वाक्मे निष्णात व्यक्तियोंकी प्रचुर महिमा गायी गयी है। 'वाक्को कोई देखते हुए भी नहीं देखता, सुनते हुए भी नहीं सुनता। पर कुछ लोग वाक्को निकटसे जानते हैं और उन के सामने वाक् अपना रहस्य वैसे ही खोल देती है जैसे कोई सुसज्जित, उत्कण्ठित पत्नी अपने-आपको अपने पतिके सामने डाल देती है।' (ऋक्संहिता १०। ६१ । ४) विशुद्ध वाक्के व्यवहार करनेवालोके बारेमें निम्नलिखित मन्त्र प्रसिद्ध है- सक्तुमिव तितउना पुनन्तो यत्र धीरा मनसा वाचमक्रत। अत्रा सखायः सख्यानि जानते भद्रैषां लक्ष्मीर्निहिताधिवाचि ॥ (ऋक्संहिता १०। ६१ । २) 'जिस तरह छलनीसे सत्तूको शुद्ध करते हैं, उसी तरह जो विद्वान् ज्ञानसे वाणीको शुद्ध कर उसका प्रयोग करते हैं, वे लोकमें मित्र होते हैं, मित्रताका सुझ पाते हैं, उनकी वाणीमें कल्याणमयी रमणीयता रहती है।' (इस मन्त्रके तृतीय पाद- की व्याख्या पतञ्जलि, दुर्गाचार्य, सायण और नागेशने भिन्न- भिन्न रूपसे की है, जिसे उनके ग्रन्थोंमें देखना चाहिये ।) वेदोंमें वाक्के जो स्वरूप मिलते हैं, वे उपनिषदोंमें विकसित रूपमें देख पड़ते हैं । वैदिक कवियोंके हृदयमें जो भावना उठी, वह छन्दोंके रूपमें बाहर आ गयी। वहाँ बनावट नहीं, अतः किसी वस्तुके परीक्षणकी इच्छाका भी अभाव है। उनकी अधिकांश समस्याएं द्वन्द्वमय जीवनके बाह्यरूपसे सम्बन्ध रखती हैं, जीवनसे परेकी केवल उनमे जिज्ञासा है। सत्यकी
- उपनिषदोंमें स्वरूप * १०७ ओर उनकी पहुँच बहुत कुछ प्रातिभज्ञानके द्वारा है। उपनिषद्के ऋषियोंके सामने बाह्य-जीवनकी समस्याएँ नहीं थीं। उनका मुख्य उद्देश्य सत्यकी खोज था । अतः उनकी विचारपरम्परामें तारतम्यका सौष्ठव है । उनकी रहस्यानुभूति- तकमें तर्ककी छाया देख पड़ती है। उन्होंने जीवनको गति देनेवाले अन्न, प्राण, मन आदि जो कुछ हैं, उन सबके याथार्थ्यकी बारी-बारीसे समीक्षा की है। उपनिषदोंमें वाक्के स्वरूपका निर्देश भी इसी समीक्षाका फल है। मोटे रूपमें उपनिषत्-कालीन वाक् शब्दकी व्युत्पत्ति वही है, जो वेदोंमें देख पड़ती है अर्थात् वाक् वह है, जो बोली जाय ( वाक् कस्माद्, वचेः—निरुक्त २।२२।२) । जिस-किसी भी शब्द- को वाक् कहते हैं (यः कश्च शब्दः वागेव सा—बृहदारण्यक उपनिषद् १ । ५ । ३) (तैत्तिरीय उपनिषद् १ । ३ । ५) के 'वाक् सन्धिः, जिह्वा सन्धानम्' यह वाक्य वाक् और जिह्वा- के सम्बन्धका स्पष्ट संकेत कर रहा है। उपनिषद्के ऋषियों- ने इस जिह्वा-व्यापारके पीछे छिपी हुई प्राणशक्ति और मानसिक शक्तिका भी सङ्केत किया है, जिनका अत्यन्त सूक्ष्म विवेचन बादके उपनिषदों और तान्त्रिक ग्रन्थोंमें बीज, बिन्दु, नाद आदिके रूपसे और व्याकरण-दर्शनमें स्फोटके रूपमें किया गया है। यह वाक् लोक-यात्रामे अद्वितीय सहायक है । जनकने याज्ञवल्क्यसे पूछा—'जब सूर्य अस्त हो जाता है, चन्द्रमाकी चाँदनी भी नहीं रहती, जब आग भी बुझी रहती है, उस समय मानवको प्रकाश देनेवाली कौन सी वस्तु है?' उत्तर मिला 'वह वाक् है। वाक् ही पुरुषका प्रकाशक है' (बृहदा- रण्यक उपनिषद् ४।३।५) । 'यदि वाक्की सृष्टि न होती तो धर्म-अधर्मका ज्ञान न होता, साँच-झूठका पता न चलता, कौन साधु है और कौन असाधु है, कौन सहृदय है और कौन अनुभूति-शून्य है—इसकी जानकारी न होती। वाक् ही इन सबको सूचित करती है । वाक्की उपासना करो' (छान्दोग्य उपनिषद् ७।२) । 'ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेदका ज्ञान वाक्से ही होता है। इतिहास, पुराण और अनेक विद्याएँ वाक्से ही जानी जाती हैं। उपनिषद्, श्लोक, सूत्र, व्याख्यान और अनुव्याख्यान वाक्के ही विषय हैं। जो कुछ हवन किया गया, खाया गया, पीया गया—ये सभी वाक्से ही ज्ञात होते हैं। इस लोकका, परलोकका, सम्पूर्ण भूतोंका ज्ञान वाक्से ही होता है।' (बृहदारण्यक उपनिषद् ४।१।२) । ज्ञानका एकमात्र अधिष्ठान वाक् है ( सर्वेषा वेदाना वागेवायतनम्—बृहदारण्यक उपनिषद् २।४।११) । उपनिषदोंमें वाक् और विचारके परस्पर सम्बन्धकी भी व्यञ्जना है। बिना भाषाके विचार सम्भव है कि नहीं, यह एक विवादात्मक प्रश्न है । भाषाविज्ञानके भाषाकी उत्पत्ति- विषयक कुछ मत भाषा और विचारके परस्पर सम्बन्धपर ही आश्रित हैं। हेस (Heyse) और मैक्समूलर (Max Muller) इसी मतके समर्थक हैं। प्राचीन आचार्योंमें भर्तृहरिका भी यही मत है। 'संसारमें ऐसा कोई ज्ञान (प्रत्यय) नहीं जो शब्दके बिना जाना जा सके' (वाक्यपदीय १।१२४) । पतञ्जलिके 'नित्ये शब्दार्थसम्बन्धे' और कालिदासके 'वागर्थाविव संपृक्तौ' में भी वाक् और विचारके नित्य सम्बन्धकी अभिव्यक्ति है। उपर्युक्त प्रश्नका उत्तर यदि उपनिषदोंमें ढूँढा जाय तो समाधानके दो पहलू दिखायी देंगे। पहला यह कि विचार अथवा ज्ञान वाक्की सहायताके बिना भी सम्भव है। ज्ञान इस कोटिका भी हो सकता है जो वाक्से परे हो। जब उपनिषद्के ऋषि यह उद्घोषित करते हैं कि 'वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम्' मैं उस परम पुरुषको जानता हूँ और दूसरे क्षण यह कहते हैं कि 'नैव वाचा न मनसा' ( कठोपनिषद् ६ । १३) वह न तो वाणीसे न मनसे जाना जा सकता है तो इससे स्पष्ट है कि ज्ञानकी गहराईतक वाणी- की पहुँच नहीं। यह भी कहा गया है— वाग्वै मनसो हसीयसी । अपरिमिततरमिव हि मन । परिमिततरेव वाक् । ( शतपथब्राह्मण १।३।६) अर्थात् वाक् विचारसे हलकी है। विचार असीम-सा है, जब कि वाक् सीमित-सी है। समाधानका दूसरा पहलू यह है कि वाक् और विचारका घना सम्बन्ध है। सृष्टिक्रममें मन और वाक्के, विचार और वाणीके परस्पर संक्रमणका उल्लेख उपनिषदोंमें मिलता है (स मनसा वाचं मिथुनं समभवत्—बृहदारण्यक उपनिषद् १।२।४) । एक स्थानपर कहा गया है कि वाक् धेनु है, प्राण इसका ऋषभ (साँड़) है और मन (विचार) इसका वत्स है (बृहदा- रण्यक उपनिषद् ५।८।१)। वाक् और विचारके परस्पर सहयोगीकी अनिवार्यता देखकर ही कहा गया था— वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता, मनो मे वाचि प्रतिष्ठितम् । ( ऐतरेय उपनिषद्, अन्तिम अंश ) अस्तु, उपनिषद् वाक् और विचारके सम्बन्धको, उनके असम्बन्धको और वाक्के मूलमें स्थित मानसिक क्रियाको अच्छी तरह प्रकट करते हैं ।
१०८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * [बायाँ स्तम्भ] उपनिषदोंमे वाक्के कलापक्षकी भी अभिव्यञ्जना है। वाक् स्वयं एक प्रकारकी अभिव्यक्ति है। प्रभावान्वित अभिव्यक्तिका नाम कला है। अतः जब वाक्की अभिव्यक्ति संवेदनशील हो उठती है, जब वाक् आह्लादकता, माधुर्यभाव या सत्त्वोद्रेकको जगानेमें समर्थ होती है, उसका कलात्मक रूप निखर उठता है, जिसके भीतर रस और बाहर सौन्दर्य लहराता रहता है। वाक्की सौन्दर्य-मीमांसामे कहा गया— वाच ऋग्रस, ऋच साम रस, साम्न उद्गीथो रस । (छान्दोग्य उपनिषद् १।१।२) वाक्का रस (सौन्दर्य) ऋक् (कविता) है। ऋक्का रस साम (लय-नाद-सौन्दर्य या समरसता) है। सामका रस उद्गीथ है। (उद्गीथ सामवेदका द्वितीय भाग, छान्दोग्य उपनिषद्में उद्गीथसे प्रणवका ग्रहण किया गया है।) भाव यह है कि वाक्का सौन्दर्य छन्दका परिधान पाकर चमक उठता है। तब वाक् ऋक्, छन्द, श्लोक अथवा कविताके नामसे पुकारी जाती है। कविता वाक्का निष्पन्द है। गीतोंमें एक समरसता (एक सतुलन) देख पड़ती है, जिससे उनका सौन्दर्य कविताके क्षेत्रमें बढ़ जाता है। साम- गानमें केवल स्वरोंका ही सामञ्जस्य नहीं लाना पड़ता, अपितु बाहरके नाद-सौन्दर्यका भीतरकी प्राण-शक्तिके साथ ऐक्य स्थापित करना पड़ता है। कविताके बाह्य और आभ्यन्तरिक गुणोंका गीतोंमें स्वभावतः समन्वय हो जाया करता है। गीत कविताके श्रृङ्गार हैं। उद्गीथ गीतोंका परिपाक है। यह गीत (साम) के आह्लादक स्वरूपका द्योतक है। आह्लादकतामें माधुर्य और माधुर्यमें रस है। रसका ही नाम आनन्द है। अतः वाक्के कला पक्षकी विश्रान्ति आनन्दमें ही होती है। उपर्युक्त बातें वाक्के भौतिक स्वरूपको सामने रखकर कही गयी हैं। उपनिषदोंमें वाक्की अधिदैवत व्याख्या भी मिलती है। 'वाक् ही यजका होता है, वही अग्नि है, वही मुक्ति है, वही अतिमुक्ति है' (बृहदारण्यक ३।१।३)। 'वह दैवी वाक् है, जिससे जो कहा जाय, हो जाता है' (बृहदा रण्यक उपनिषद् १।५।१८)। 'वाक् ब्रह्मका चतुर्थ पाद है' (छान्दोग्य-उपनिषद् ३।१८)। इससे कुछ और गहराईमे उतरकर उपनिषद्के ऋषियों- ने वाक्के उस स्वरूपके भी दर्शन किये हैं, जिसे हम रहस्यात्मक कह सकते हैं। यहाँ वाक् न तो एक साधारण बोलचालकी वस्तु है और न ज्ञानका असाधारण साधन है। वह साधारण असाधारण दोनोसे परे है। वह सूक्ष्म है। नित्य है। अनन्त है। सम्पूर्ण विश्वका विकास वाक्से हुआ है। [दायाँ स्तम्भ] बृहदारण्यक-उपनिषद्मे उल्लेख है कि वाक्के द्वारा सृष्टि की गयी। स तया वाचा तेनात्मना इदं सर्वमसृजत्। वाक्से सृष्टि हुई इसकी पोषक श्रुति भी है— वागेव विश्वा भुवनानि जज्ञे । आचार्य शङ्कर-जैसे दार्शनिक भी इस मतका अनुमोदन करते हैं। 'हम सभी इस बातको जानते हैं कि मनुष्य जो कुछ करता है, उसके वाचक शब्द उसके मनमे पहले आते हैं बादमे वह उस कामको करता है। इसी तरह सृष्टि रचनेके पूर्व प्रजापतिके मनमे भी वैदिक शब्दोंका आभार हुआ, पीछे उन शब्दोंके अनुरूप वस्तुओंकी उन्होंने रचना की'— (वेदान्तसूत्र १।३।२८ पर शाङ्करभाष्य) वाक्के रहस्यात्मक स्वरूपका निर्देशक प्रणव है। प्रणव वाक् का मूल तत्त्व है। वाक्का सम्पूर्ण वैभव प्रणवका विलास है। जो उद्गीथ है, वही प्रणव है। जो प्रणव है, वही ओम् है। 'यह ओ३म् अक्षर है। यह सब कुछ—भूत, भविष्य और वर्तमान—ओंकार ही है और जो इन तीन कालोंसे परे है वह भी ओम् ही है (माण्डूक्य-उपनिषद् १।१)। इतनी दूर आ जानेपर उपनिषद्के ऋषियोंको यह कहनेमे कोई उलझन न रही कि 'वाक् ही परम ब्रह्म है' ('वाग् वै सम्राट् परम ब्रह्म' बृहदारण्यक उपनिषद् ४।१।२)। वाक्का यह रहस्यात्मक रूप अवश्य ही दैनिक व्यवहार- के वाक्से दूरका जान पड़ेगा। परंतु विचार करनेपर ऐसा लगता है कि वाक्को जो यह उच्चतम आसन दिया गया है, वह साधार है। इस गतिशील संसारमें किसी भी पदार्थका सत्य जगत्के किसी दूसरे पदार्थद्वारा ठीक-ठीक जाना नहीं जा सकता, क्योकि वह मापक पदार्थ स्वयं गतिशील है। अन्तमें हमें वहाँतक जाना पड़ेगा, जहाँसे सभी गतिशील पदार्थोंको—जगत्को गति मिलती है। वह, जहाँसे सभी गति पाते हैं, अवश्य ही जगत्से तटस्थ होगा, साथ ही स्थिर भी होगा। पर गति देनेके कारण जगत्से उसका एक सम्बन्ध हो जाता है। और इस सम्बन्धके सहारे प्रत्येक गतिशील पदार्थ उस स्थिर विन्दुसे अपना नाता जोड़ सकता है। जगत्से तटस्थ होनेका अभिप्राय यह नहीं कि जगत्की कोई सीमा है और स्थिर-विन्दु उससे कहीं परे है। गतिशीलता ही जगत् है और उसमें जो तटस्थ है, वही स्थिर-विन्दु है। दूसरे शब्दोंमें प्रत्येक परिवर्तनशील पदार्थमें कुछ ऐसा है जो अपरिवर्तनशील है। यही अपरिवर्तनशीलता उसका स्थिर- विन्दु है। चाहे कोई इसे शक्ति, एनर्जी, चिति या ब्रह्म कहे, इससे उसके रूपमें कोई अन्तर नहीं आता । पर बात यहीं
- वैष्णव-उपनिषद् * १०९ समाप्त नहीं होती । हम यह भी देख सकते हैं कि उस परिवर्तनशील वस्तु और उस स्थिर-बिन्दुमें कोई तात्त्विक भेद नहीं है। केवल इतना ही है कि एक अपने शुद्ध रूपमें है और दूसरा विकृत रूपमें । यदि उसकी विकृतिको परिशुद्ध कर दिया जाय तो केवल एक ही शुद्ध रूप रह जाता है। अभी कलतक इस चिर-प्रतिपादित सिद्धान्तको केवल दार्शनिकोंकी कल्पना समझा जाता था। परन्तु आजका भौतिक- विज्ञान यह सिद्ध कर रहा है कि भौतिक पदार्थ (मैटर) को शक्ति (फोर्स) के रूपमें परिणत किया जा सकता है। 'अणु बंम' इस परिवर्तनका प्रत्यक्ष प्रमाण है । साथ ही यह भी ध्यान देनेकी बात है कि वह स्थिर-बिन्दु या यों कहिये कि वह शक्ति जो प्रत्येक पदार्थमें अपरिवर्तनीय और अविनाशी है, दो नहीं हो सकती । दो पदार्थोंकी शक्तियोंमें मात्राका (डिग्रीका) अन्तर हो सकता है, पर स्वभावका (नेचरका) भेद नहीं हो सकता । अस्तु, 'यह सब ब्रह्म है' के पीछे एक दृढ़ सिद्धान्त है और इसी दृष्टिसे वाक् भी ब्रह्म है। वाक् सूक्ष्म ब्रह्मसे भिन्न कोई दूसरी वस्तु हो ही नहीं सकता । स्थूल जगत् ब्रह्मका विवर्त है । स्थूल-जगत् वाक्का विकार है, क्योंकि रूप और नाम एकहीके दो पहलू हैं। उनमें कोई भेद नहीं। अतः वाक् और ब्रह्ममें भी कोई भेद नहीं। इस प्रकार हम देखते हैं कि उपनिषदोंमें जहाँ जीव और जगत्-सम्बन्धी अनेक गूढ़ तथ्योंका विवेचन है, वहाँ वाक्पर भी प्रकाश डाला ही गया है। अवश्य ही विचार-शैली भिन्न होनेके कारण और वाक्का मुख्य विषय न होनेके कारण किसी एक स्थानपर वाक्पर क्रम-बद्ध गवेषणा नहीं मिलती । फिर भी जहाँ-तहाँ जो विचार बिखरे पड़े हैं, उन्हींके सहारे हम देख रहे हैं कि उपनिषदोंमें वाक्के प्रायः प्रत्येक अङ्गपर दृष्टि डाली गयी है। लोक-जीवनमें वाक्का जितना महत्त्व उपनिषद्के ऋषियोंने दिखाया है, उससे अधिक कोई क्या कह सकता है। उनके लिये वाक् केवल जिह्वा-व्यापार न होकर अन्तरात्माकी पुकार है। वह दैवी है। आजका भौतिक-विज्ञान ध्वनि (साउंड) के अनेकानेक व्यापक रहस्योंका उद्घाटन- कर हमारे जीवनमे प्रतिदिन नया रूप-रङ्ग डाल रहा है। भाषाविज्ञान वाक्के नित्य-नवीन विश्लेषणमें निरत है। पर उपनिषदोंमे जो वाक्का स्वरूप है, उसकी महत्ता ज्यों-की-त्यों है। वाक्की उपासना होती आ रही है और होती रहेगी । 'विन्देय देवता वाचममृतामात्मन. कलाम्' । (भवभूति) हम आत्माकी कलारूप शाश्वत दैवी वाक्को पावें । वैष्णव-उपनिषद् (लेखक—प० श्रीबलदेवजी उपाध्याय, एम्० ए०, साहित्याचार्य) भारतीय धर्म तथा दर्शनके विकासका अनुशीलन हमें इसी सिद्धान्तपर पहुँचाता है कि उनके बीज उपनिषदोंमे संकेतरूपसे निहित हैं। वैष्णव-धर्मके मूलरूपके अध्ययनकी सामग्री इन उपादेय उपनिषदोंमें ही बिखरी हुई है, परंतु कतिपय उपनिषद् तो सर्वथा विष्णु तथा उनके विभिन्न अवतारोंके रहस्योंके प्रतिपादनमें ही व्यस्त दीख पड़ते हैं। इन्हीं-उपनिषदोंका संक्षिप्त परिचय कराना इस छोटे लेखका उद्देश्य है। वैष्णव-उपनिषद् संख्यामें चौदह हैं और इन सबका एक सम्पुटमें प्रकाशन थियासोफ़िकल सोसाइटीने अड्यार (मद्रास) से किया है। अक्षर-क्रमसे इनका सामान्य निर्देश इस प्रकार है— १. अव्यक्तोपनिषद्—इस उपनिषद्में सात खण्ड हैं। विषय है अव्यक्त पुरुषको व्यक्तरूपकी प्राप्ति । इसमें 'आनुष्टुभी-विद्या' के स्वरूप तथा फलका पर्याप्त निर्णय किया गया है। इसीके बलपर परमेष्ठीको नृसिंहका दर्शन होता है और वे जगत्की सृष्टिमें समर्थ तथा सफल होते हैं। २. कलिसन्तरणोपनिषद्—इस उपनिषद्में नारदजी- के प्रार्थना करनेपर हिरण्यगर्भने कलिके प्रपञ्चोंको पार करनेवाला उपाय बतलाया है। यह उपाय है भगवान्का षोडश नामवाला मन्त्र— हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे । हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥ इस मन्त्रका एक रहस्य है। जीव षोडश कलाओंसे आवृत रहता है। इसीलिये उसकी प्रत्येक कलाको दूर करनेके लिये सोलह नामवाला मन्त्र अतीव समर्थ बतलाया गया है। इति षोडशकं नाम्ना कलिकल्मषनाशनम् । नात परतर्रोपाय सर्ववेदेषु दृश्यते ॥ इति षोडशकलादृतस्य जीवस्यावरणविनाशनम् । ततः प्रकाशते पर ब्रह्म मेघापाये रविरश्मिमण्डलीवेति ॥ ३. कृष्णोपनिषद्—यह उपनिषद् बहुत ही छोटा है। इसमें श्रीकृष्णकी भगवत्ताका परम प्रामाणिक वर्णन किया गया है। भगवान् श्रीकृष्णने भक्तोंके ऊपर अनुग्रह करनेके