भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 122

१०८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * [बायाँ स्तम्भ] उपनिषदोंमे वाक्‌के कलापक्षकी भी अभिव्यञ्जना है। वाक् स्वयं एक प्रकारकी अभिव्यक्ति है। प्रभावान्वित अभिव्यक्तिका नाम कला है। अतः जब वाक्‌की अभिव्यक्ति संवेदनशील हो उठती है, जब वाक् आह्लादकता, माधुर्यभाव या सत्त्वोद्रेकको जगानेमें समर्थ होती है, उसका कलात्मक रूप निखर उठता है, जिसके भीतर रस और बाहर सौन्दर्य लहराता रहता है। वाक्‌की सौन्दर्य-मीमांसामे कहा गया— वाच ऋग्रस, ऋच साम रस, साम्न उद्गीथो रस । (छान्दोग्य उपनिषद् १।१।२) वाक्‌का रस (सौन्दर्य) ऋक् (कविता) है। ऋक्‌का रस साम (लय-नाद-सौन्दर्य या समरसता) है। सामका रस उद्गीथ है। (उद्गीथ सामवेदका द्वितीय भाग, छान्दोग्य उपनिषद्‌में उद्गीथसे प्रणवका ग्रहण किया गया है।) भाव यह है कि वाक्‌का सौन्दर्य छन्दका परिधान पाकर चमक उठता है। तब वाक् ऋक्, छन्द, श्लोक अथवा कविताके नामसे पुकारी जाती है। कविता वाक्‌का निष्पन्द है। गीतोंमें एक समरसता (एक सतुलन) देख पड़ती है, जिससे उनका सौन्दर्य कविताके क्षेत्रमें बढ़ जाता है। साम- गानमें केवल स्वरोंका ही सामञ्जस्य नहीं लाना पड़ता, अपितु बाहरके नाद-सौन्दर्यका भीतरकी प्राण-शक्तिके साथ ऐक्य स्थापित करना पड़ता है। कविताके बाह्य और आभ्यन्तरिक गुणोंका गीतोंमें स्वभावतः समन्वय हो जाया करता है। गीत कविताके श्रृङ्गार हैं। उद्गीथ गीतोंका परिपाक है। यह गीत (साम) के आह्लादक स्वरूपका द्योतक है। आह्लादकतामें माधुर्य और माधुर्यमें रस है। रसका ही नाम आनन्द है। अतः वाक्‌के कला पक्षकी विश्रान्ति आनन्दमें ही होती है। उपर्युक्त बातें वाक्‌के भौतिक स्वरूपको सामने रखकर कही गयी हैं। उपनिषदोंमें वाक्‌की अधिदैवत व्याख्या भी मिलती है। 'वाक् ही यजका होता है, वही अग्नि है, वही मुक्ति है, वही अतिमुक्ति है' (बृहदारण्यक ३।१।३)। 'वह दैवी वाक् है, जिससे जो कहा जाय, हो जाता है' (बृहदा रण्यक उपनिषद् १।५।१८)। 'वाक् ब्रह्मका चतुर्थ पाद है' (छान्दोग्य-उपनिषद् ३।१८)। इससे कुछ और गहराईमे उतरकर उपनिषद्‌के ऋषियों- ने वाक्‌के उस स्वरूपके भी दर्शन किये हैं, जिसे हम रहस्यात्मक कह सकते हैं। यहाँ वाक् न तो एक साधारण बोलचालकी वस्तु है और न ज्ञानका असाधारण साधन है। वह साधारण असाधारण दोनोसे परे है। वह सूक्ष्म है। नित्य है। अनन्त है। सम्पूर्ण विश्वका विकास वाक्‌से हुआ है। [दायाँ स्तम्भ] बृहदारण्यक-उपनिषद्मे उल्लेख है कि वाक्‌के द्वारा सृष्टि की गयी। स तया वाचा तेनात्मना इदं सर्वमसृजत्। वाक्‌से सृष्टि हुई इसकी पोषक श्रुति भी है— वागेव विश्वा भुवनानि जज्ञे । आचार्य शङ्कर-जैसे दार्शनिक भी इस मतका अनुमोदन करते हैं। 'हम सभी इस बातको जानते हैं कि मनुष्य जो कुछ करता है, उसके वाचक शब्द उसके मनमे पहले आते हैं बादमे वह उस कामको करता है। इसी तरह सृष्टि रचनेके पूर्व प्रजापतिके मनमे भी वैदिक शब्दोंका आभार हुआ, पीछे उन शब्दोंके अनुरूप वस्तुओंकी उन्होंने रचना की'— (वेदान्तसूत्र १।३।२८ पर शाङ्करभाष्य) वाक्‌के रहस्यात्मक स्वरूपका निर्देशक प्रणव है। प्रणव वाक् का मूल तत्त्व है। वाक्‌का सम्पूर्ण वैभव प्रणवका विलास है। जो उद्गीथ है, वही प्रणव है। जो प्रणव है, वही ओम् है। 'यह ओ३म् अक्षर है। यह सब कुछ—भूत, भविष्य और वर्तमान—ओंकार ही है और जो इन तीन कालोंसे परे है वह भी ओम् ही है (माण्डूक्य-उपनिषद् १।१)। इतनी दूर आ जानेपर उपनिषद्‌के ऋषियोंको यह कहनेमे कोई उलझन न रही कि 'वाक् ही परम ब्रह्म है' ('वाग् वै सम्राट् परम ब्रह्म' बृहदारण्यक उपनिषद् ४।१।२)। वाक्‌का यह रहस्यात्मक रूप अवश्य ही दैनिक व्यवहार- के वाक्‌से दूरका जान पड़ेगा। परंतु विचार करनेपर ऐसा लगता है कि वाक्‌को जो यह उच्चतम आसन दिया गया है, वह साधार है। इस गतिशील संसारमें किसी भी पदार्थका सत्य जगत्‌के किसी दूसरे पदार्थद्वारा ठीक-ठीक जाना नहीं जा सकता, क्योकि वह मापक पदार्थ स्वयं गतिशील है। अन्तमें हमें वहाँतक जाना पड़ेगा, जहाँसे सभी गतिशील पदार्थोंको—जगत्‌को गति मिलती है। वह, जहाँसे सभी गति पाते हैं, अवश्य ही जगत्‌से तटस्थ होगा, साथ ही स्थिर भी होगा। पर गति देनेके कारण जगत्‌से उसका एक सम्बन्ध हो जाता है। और इस सम्बन्धके सहारे प्रत्येक गतिशील पदार्थ उस स्थिर विन्दुसे अपना नाता जोड़ सकता है। जगत्‌से तटस्थ होनेका अभिप्राय यह नहीं कि जगत्‌की कोई सीमा है और स्थिर-विन्दु उससे कहीं परे है। गतिशीलता ही जगत् है और उसमें जो तटस्थ है, वही स्थिर-विन्दु है। दूसरे शब्दोंमें प्रत्येक परिवर्तनशील पदार्थमें कुछ ऐसा है जो अपरिवर्तनशील है। यही अपरिवर्तनशीलता उसका स्थिर- विन्दु है। चाहे कोई इसे शक्ति, एनर्जी, चिति या ब्रह्म कहे, इससे उसके रूपमें कोई अन्तर नहीं आता । पर बात यहीं