भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 121
  • उपनिषदोंमें स्वरूप * १०७ ओर उनकी पहुँच बहुत कुछ प्रातिभज्ञानके द्वारा है। उपनिषद्‌के ऋषियोंके सामने बाह्य-जीवनकी समस्याएँ नहीं थीं। उनका मुख्य उद्देश्य सत्यकी खोज था । अतः उनकी विचारपरम्परामें तारतम्यका सौष्ठव है । उनकी रहस्यानुभूति- तकमें तर्ककी छाया देख पड़ती है। उन्होंने जीवनको गति देनेवाले अन्न, प्राण, मन आदि जो कुछ हैं, उन सबके याथार्थ्यकी बारी-बारीसे समीक्षा की है। उपनिषदोंमें वाक्‌के स्वरूपका निर्देश भी इसी समीक्षाका फल है। मोटे रूपमें उपनिषत्-कालीन वाक् शब्दकी व्युत्पत्ति वही है, जो वेदोंमें देख पड़ती है अर्थात् वाक् वह है, जो बोली जाय ( वाक् कस्माद्, वचेः—निरुक्त २।२२।२) । जिस-किसी भी शब्द- को वाक् कहते हैं (यः कश्च शब्दः वागेव सा—बृहदारण्यक उपनिषद् १ । ५ । ३) (तैत्तिरीय उपनिषद् १ । ३ । ५) के 'वाक् सन्धिः, जिह्वा सन्धानम्' यह वाक्य वाक् और जिह्वा- के सम्बन्धका स्पष्ट संकेत कर रहा है। उपनिषद्‌के ऋषियों- ने इस जिह्वा-व्यापारके पीछे छिपी हुई प्राणशक्ति और मानसिक शक्तिका भी सङ्केत किया है, जिनका अत्यन्त सूक्ष्म विवेचन बादके उपनिषदों और तान्त्रिक ग्रन्थोंमें बीज, बिन्दु, नाद आदिके रूपसे और व्याकरण-दर्शनमें स्फोटके रूपमें किया गया है। यह वाक् लोक-यात्रामे अद्वितीय सहायक है । जनकने याज्ञवल्क्यसे पूछा—'जब सूर्य अस्त हो जाता है, चन्द्रमाकी चाँदनी भी नहीं रहती, जब आग भी बुझी रहती है, उस समय मानवको प्रकाश देनेवाली कौन सी वस्तु है?' उत्तर मिला 'वह वाक् है। वाक् ही पुरुषका प्रकाशक है' (बृहदा- रण्यक उपनिषद् ४।३।५) । 'यदि वाक्‌की सृष्टि न होती तो धर्म-अधर्मका ज्ञान न होता, साँच-झूठका पता न चलता, कौन साधु है और कौन असाधु है, कौन सहृदय है और कौन अनुभूति-शून्य है—इसकी जानकारी न होती। वाक् ही इन सबको सूचित करती है । वाक्‌की उपासना करो' (छान्दोग्य उपनिषद् ७।२) । 'ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेदका ज्ञान वाक्‌से ही होता है। इतिहास, पुराण और अनेक विद्याएँ वाक्‌से ही जानी जाती हैं। उपनिषद्, श्लोक, सूत्र, व्याख्यान और अनुव्याख्यान वाक्‌के ही विषय हैं। जो कुछ हवन किया गया, खाया गया, पीया गया—ये सभी वाक्‌से ही ज्ञात होते हैं। इस लोकका, परलोकका, सम्पूर्ण भूतोंका ज्ञान वाक्‌से ही होता है।' (बृहदारण्यक उपनिषद् ४।१।२) । ज्ञानका एकमात्र अधिष्ठान वाक् है ( सर्वेषा वेदाना वागेवायतनम्—बृहदारण्यक उपनिषद् २।४।११) । उपनिषदोंमें वाक् और विचारके परस्पर सम्बन्धकी भी व्यञ्जना है। बिना भाषाके विचार सम्भव है कि नहीं, यह एक विवादात्मक प्रश्न है । भाषाविज्ञानके भाषाकी उत्पत्ति- विषयक कुछ मत भाषा और विचारके परस्पर सम्बन्धपर ही आश्रित हैं। हेस (Heyse) और मैक्समूलर (Max Muller) इसी मतके समर्थक हैं। प्राचीन आचार्योंमें भर्तृहरिका भी यही मत है। 'संसारमें ऐसा कोई ज्ञान (प्रत्यय) नहीं जो शब्दके बिना जाना जा सके' (वाक्यपदीय १।१२४) । पतञ्जलिके 'नित्ये शब्दार्थसम्बन्धे' और कालिदासके 'वागर्थाविव संपृक्तौ' में भी वाक् और विचारके नित्य सम्बन्धकी अभिव्यक्ति है। उपर्युक्त प्रश्नका उत्तर यदि उपनिषदोंमें ढूँढा जाय तो समाधानके दो पहलू दिखायी देंगे। पहला यह कि विचार अथवा ज्ञान वाक्‌की सहायताके बिना भी सम्भव है। ज्ञान इस कोटिका भी हो सकता है जो वाक्‌से परे हो। जब उपनिषद्‌के ऋषि यह उद्घोषित करते हैं कि 'वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम्' मैं उस परम पुरुषको जानता हूँ और दूसरे क्षण यह कहते हैं कि 'नैव वाचा न मनसा' ( कठोपनिषद् ६ । १३) वह न तो वाणीसे न मनसे जाना जा सकता है तो इससे स्पष्ट है कि ज्ञानकी गहराईतक वाणी- की पहुँच नहीं। यह भी कहा गया है— वाग्वै मनसो हसीयसी । अपरिमिततरमिव हि मन । परिमिततरेव वाक् । ( शतपथब्राह्मण १।३।६) अर्थात् वाक् विचारसे हलकी है। विचार असीम-सा है, जब कि वाक् सीमित-सी है। समाधानका दूसरा पहलू यह है कि वाक् और विचारका घना सम्बन्ध है। सृष्टिक्रममें मन और वाक्‌के, विचार और वाणीके परस्पर संक्रमणका उल्लेख उपनिषदोंमें मिलता है (स मनसा वाचं मिथुनं समभवत्—बृहदारण्यक उपनिषद् १।२।४) । एक स्थानपर कहा गया है कि वाक् धेनु है, प्राण इसका ऋषभ (साँड़) है और मन (विचार) इसका वत्स है (बृहदा- रण्यक उपनिषद् ५।८।१)। वाक् और विचारके परस्पर सहयोगीकी अनिवार्यता देखकर ही कहा गया था— वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता, मनो मे वाचि प्रतिष्ठितम् । ( ऐतरेय उपनिषद्, अन्तिम अंश ) अस्तु, उपनिषद् वाक् और विचारके सम्बन्धको, उनके असम्बन्धको और वाक्‌के मूलमें स्थित मानसिक क्रियाको अच्छी तरह प्रकट करते हैं ।