कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 120, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें१०६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * जगत्को पुनर्जीवन, शक्ति और शौर्य-वीर्य प्रदान करनेमें समर्थ है। जगत्की समस्त जातियों, समस्त मतो और सभी सम्प्रदायोंके दीन, दुर्बल, दुखी और पददलित प्राणियोंको पुकार पुकारकर कह रही है कि 'सभी अपने पैरोंपर खड़े होकर मुक्त हो जाओ।' मुक्ति या स्वाधीनता-दैहिक स्वाधीनता, मानसिक स्वाधीनता और आध्यात्मिक स्वाधीनता- यही उपनिषद्का मूल मन्त्र है। जगद्भरमे यही एकमात्र शास्त्र है जो उद्धार (Salvation) की बात नहीं कहता, मुक्तिकी बात कहता है। यथार्थ बन्धनसे मुक्त होओ, दुर्बलता- से मुक्त होओ।'
उपनिषदोंमें वाक्का स्वरूप (लेखक---पं० श्रीरामसुरेशजी त्रिपाठी, एम्० ए०)
वाणी चेतनाकी अमर देन है। वाणीके बिना जगत् सूना है, जीवन पङ्गु है। संसारके प्रायः सारे व्यवहार वाणी-व्यापार- पर ही निर्भर हैं। सभ्यता और संस्कृति इसकी गोदमें फूलती फलती हैं। वाणी केवल विचारोंके विनिमयका ही माध्यम नहीं, अपितु विश्वमें जो कुछ सत्य है, शिव है, सुन्दर है, उन सबका भी व्यञ्जक है। इस वाणीकी दूसरी प्राचीन सञ्ज्ञा वाक् है। वाक्के विषयमे उपनिषदोंमें मधुर उद्गार तथा युक्तिपूर्ण विचार भरे पड़े हैं; साथ ही इसके भौतिक, दैविक तथा आध्यात्मिक रूपकी रेखा भी खींची गयी है, जिसे देख आजका भाषा-विज्ञानका विद्यार्थी भी एक बार चकित रह जाता है। उपनिषत्-कालीन वाक्के स्वरूपकी पीठिका वेदोंमे ही तैयार हो गयी थी और उसी समय इसे रहस्यकी कोटिमें डाल दिया गया था। जलमें, थलमें, ओषधियोंमें-सबमें दैवी सत्ताको परखनेवाले वैदिक ऋषि वाक्को अनुकरणमूलक (Onomatopoeic) या मनोराग-व्यञ्जक (Inter- jectional) कैसे मान सकते थे। ऋग्वेदके अनुसार वाक्- को देवोंने पैदा किया- 'देवीं वाचमजनयन्त देवा.।' (ऋक्संहिता, निरुक्त ११। २९ में उद्धृत) इस वाक्के चार विभाग है- 'चत्वारि वाक् परिमिता पदानि।' (ऋक्संहिता १। १६४। ४५) महाभाष्यकार पतञ्जलिने इन चारसे नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपातका ग्रहण किया है। वाक्के परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी रूपका सकेत भी इसी मन्त्रमे माना जाता है। ब्राह्मणग्रन्थोंमे चार प्रकारके विभागको दूसरे रूपोंमें भी व्यक्त किया है (देखिये निरुक्त १३। ९)। ऋग्वेदके दसवें मण्डलके १२५वें सूक्तकी द्रष्टा 'वाक्' नामकी एक विदुषी है। वह अम्भृण महर्षिकी पुत्री थी। उसने स्वय अपनी (वाक्की) स्तुति परमात्माके रूपमें की है। इस सूक्तमें वाक्के अलौकिक रूपकी झलक है। पर साथ ही वैदिक ऋषियोंने वाक्के लौकिक रूपकी भी उपेक्षा नहीं की है। वाक्मे निष्णात व्यक्तियोंकी प्रचुर महिमा गायी गयी है। 'वाक्को कोई देखते हुए भी नहीं देखता, सुनते हुए भी नहीं सुनता। पर कुछ लोग वाक्को निकटसे जानते हैं और उन के सामने वाक् अपना रहस्य वैसे ही खोल देती है जैसे कोई सुसज्जित, उत्कण्ठित पत्नी अपने-आपको अपने पतिके सामने डाल देती है।' (ऋक्संहिता १०। ६१ । ४) विशुद्ध वाक्के व्यवहार करनेवालोके बारेमें निम्नलिखित मन्त्र प्रसिद्ध है- सक्तुमिव तितउना पुनन्तो यत्र धीरा मनसा वाचमक्रत। अत्रा सखायः सख्यानि जानते भद्रैषां लक्ष्मीर्निहिताधिवाचि ॥ (ऋक्संहिता १०। ६१ । २) 'जिस तरह छलनीसे सत्तूको शुद्ध करते हैं, उसी तरह जो विद्वान् ज्ञानसे वाणीको शुद्ध कर उसका प्रयोग करते हैं, वे लोकमें मित्र होते हैं, मित्रताका सुझ पाते हैं, उनकी वाणीमें कल्याणमयी रमणीयता रहती है।' (इस मन्त्रके तृतीय पाद- की व्याख्या पतञ्जलि, दुर्गाचार्य, सायण और नागेशने भिन्न- भिन्न रूपसे की है, जिसे उनके ग्रन्थोंमें देखना चाहिये ।) वेदोंमें वाक्के जो स्वरूप मिलते हैं, वे उपनिषदोंमें विकसित रूपमें देख पड़ते हैं । वैदिक कवियोंके हृदयमें जो भावना उठी, वह छन्दोंके रूपमें बाहर आ गयी। वहाँ बनावट नहीं, अतः किसी वस्तुके परीक्षणकी इच्छाका भी अभाव है। उनकी अधिकांश समस्याएं द्वन्द्वमय जीवनके बाह्यरूपसे सम्बन्ध रखती हैं, जीवनसे परेकी केवल उनमे जिज्ञासा है। सत्यकी