भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 119
  • पाश्चात्य पण्डितोंपर उपनिषद्का प्रभाव * १०५ सुसमञ्जस अर्थ प्रकट कर रही है । प्रत्येक वाक्यसे कितना गभीर, मौलिक और गम्भीरतापूर्ण विचारसमूह प्रकट हो रहा है, सम्पूर्ण ग्रन्थ कैसे उच्च, पवित्र और ऐकान्तिक भावोंसे ओतप्रोत है । x x x सारे पृथ्वीमण्डलमे मूल उपनिषद्- के समान इतना फलोत्पादक और उच्च भावोद्दीपक ग्रन्थ कहीं भी नहीं है। इसने मुझको जीवनमे शान्ति प्रदान की है और मरणमे भी यह शान्ति देगा' ।¹ जिस देशमें उपनिषद्के गम्भीर सत्यसमूहका प्रचार था, उस देशमें ईसाई-धर्मके प्रचारका प्रयत्न व्यर्थ होगा और निकट भविष्यमें यूरोपीय विचारधारा उक्त उपनिषद्‌के द्वारा पूर्णरूपसे प्रभावित हो जायगी—इस सम्बन्धमें शोपेनहरने कहा था— 'भारतमें हमारे धर्मकी जड़ कभी नहीं गड़ेगी । मानव- जातिकी 'पुरानी प्रजा' गैलिलिकी घटनाओंसे कभी निराकृत नहीं होगी। वरं भारतीय प्रजाकी धारा यूरोपमे प्रवाहित होगी एवं हमारे ज्ञान और विचारमें आमूल परिवर्तन ला देगी' ।² उनकी यह भविष्य-वाणी सफल हुई । स्वामी विवेकानन्द- की अमेरिकन शिष्या 'सारा बुल' (Sarra Bull) ने अपने एक पत्रमें लिखा था कि 'जर्मनीका दार्शनिक सम्प्रदाय, इङ्गलैंडके प्राच्य पण्डित और हमारे अपने देशके एमरसन आदि साक्षी दे रहे हैं कि पाश्चात्य विचार आजकल सचमुच ही वेदान्तके द्वारा अनुप्राणित हैं।'³ सन् १८४४ में बर्लिनमें श्री शेलिंग (Schelling) महोदयकी उपनिषत्सम्बन्धी व्याख्यान-मालाको सुनकर प्रसिद्ध पाश्चात्य पण्डित श्रीमैक्समूलर (Max Muller) का ध्यान सबसे पहले संस्कृत साहित्यकी ओर आकृष्ट हुआ । उपनिषदोंके सम्बन्धमें विचार आरम्भ करते ही उन्होंने अनुभव किया कि उपनिषदोंका यथार्थ मर्म समझनेके लिये पहले उनसे पूर्वरचित वेद-मन्त्र और ब्राह्मणभागपर विचार करना आवश्यक है । इस प्रकार उपनिषदोंसे उन्होंने वेद- चर्चाके लिये प्रेरणा प्राप्त की । शोपेनहरके बाद अनेकों पाश्चात्य विद्वानोंने उपनिषद्‌पर विचार करके विभिन्न प्रकार- से उसकी महिमा गायी है। किसी-किसीने तो उपनिषद्‌को 'मानव-चेतनाका सर्वोच्च फल' बतलाया है ।⁴ उपनिषत्-प्रतिपादित वैदान्तिक धर्म ही देर सबेर सम्पूर्ण पृथिवीका धर्म होगा—बहुतसे मनीषियोंने ऐसी भविष्य-वाणी की है। शोपेनहरने 'उन्नीसवीं शताब्दी'के प्रथम भागमें लिखा है—"It is destined sooner or later to become the faith of the people " विश्वकवि रवीन्द्रनाथने कहा है—'चक्षुसम्पन्न व्यक्ति देखेंगे कि भारत- का ब्रह्मज्ञान समस्त पृथिवीका धर्म बनने लगा है । प्रातः- कालीन सूर्यकी अरुण किरणोंसे पूर्वदिग्‌ आलोकित होने लगी है, परतु जब वह सूर्य मध्याह्न-गगनमें प्रकाशित होगा, उस समय उसकी दीप्तिसे समग्र भूमण्डल दीप्तिमय हो उठेगा ।' स्वामी विवेकानन्दने वर्तमान भारतके जीवनमें उपनिषद्- की कार्यकारिताकी मुक्तकण्ठसे घोषणा की है। गत सहस्रों वर्षोंसे हमारे जातीय जीवनमे जो दोष-दौर्बल्य आ गया है, जिसने हमको नितान्त निर्वीर्य बना डाला है, उसको हटाने- में एकमात्र उपनिषद्के महान् वीर्यप्रद सत्य ही समर्थ हैं। 'भारतीय जीवनमें वेदान्तकी कार्यकारिता' नामक व्याख्यान- मे स्वामीजीने कहा है— 'बन्धुओ ! स्वदेशवासियो ! मै जितना ही उपनिषदोंको पढता हूँ, उतना ही तुमलोगोंके लिये आँसू बहाता हूँ । हमारे लिये यह आवश्यक हो गया है कि उपनिषदुक्त तेजस्विताको ही हम अपने जीवनमें विशेषरूपसे परिणत करें। शक्ति,—बस, शक्ति ही हमें चाहिये, हमें शक्तिकी विशेष आवश्यकता आ पड़ी है। हमें कौन शक्ति देगा ? । x x x उपनिषदें शक्तिकी महान् खानें हैं । उपनिषद् जिस शक्तिका सञ्चार करनेमें समर्थ है, वह ऐसी है कि सम्पूर्ण 1 From every sentence deep, original and sublime thoughts arise, and the whole is pervaded by a high and holy and earnest spirit In the whole world there is no study, except that of the originals, so beneficial and so elevating as that of the Oupnekhat. It has been the solace of my life, it will be the solace of my death
  1. In India our religion will now and never strike root. The primitive wisdom of the human race will never be pushed aside by the events of Galilee. On the contrary, Indian wisdom will flow back upon Europe, and produce a thorough change in our knowing and thinking
  2. The German schools, the English Orientalists and our own Emerson testify the fact that it is literally true that Vedantic thoughts pervade the Western thought of today उ० अं० १४— 1 'Personally I regard the Upanisads as the highest product of the human mind, the crystallized wisdom of divinely illumined men' Dr Annie Besant