कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 118, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें१०४ - महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति - की सैकड़ों धाराएँ निकली हैं। समाधिने सञ्चित कर्म नष्ट | अनिष्टव्य सम्पूर्ण पातकोंको जलाकर भस्म करता है। अपरोक्ष होते हैं तथा निर्मल धर्मकी वृद्धि होती है। प्रथम समाधिद्वारा | ज्ञान तो इस संसारसे उत्पन्न अज्ञानरूपी अन्धकारको नष्ट परोक्ष ब्रह्मज्ञान होता है तदनन्तर अपरोक्ष ब्रह्मज्ञान होता | करनेवाला सूर्य ही है। इम रीतिसे 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों- है। सद्गुरुओंकी कृपासे महावाक्योंद्वारा प्राप्त परोक्ष ज्ञान | द्वारा जीवात्मैक्यकी अपरोक्षानुभूति होती है।
पाश्चात्य पण्डितोंपर उपनिषद्का प्रभाव ( लेखक—श्रीरानमोहन चक्रवर्ती पी-एच० डी०, पुरानरत्न, विद्याविनोद )
वैदिक साहित्यके साथ पाश्चात्य जातिका प्रथम परिचय | पण्डितोंकी दृष्टि इधर कुछ आकर्षित तो हुई, किंतु अनुवाद होता है उपनिषदोंके द्वारा। सम्राट् शाहजहाँके ज्येष्ठ पुत्र | का अनुवाद होनेके कारण वह इतना अस्पष्ट और दुर्बोध हो दाराशिकोह अपनी धर्मसम्बन्धी उदारताके लिये भारतके | गया था कि उसका मर्म समझकर रसास्वादन करना सहज इतिहासमें प्रसिद्ध हैं। उन्होंने हिंदू तथा मुसल्मान-धर्मके | नहीं था। इसी समय नामवन्त फ्रान्सके अङ्गान्तर्वर्ती एक समन्वयके लिये विशेष चेष्टा की थी और इसलिये उन्होंने | सूक्ष्मदर्शी दार्शनिक 'औपनेखत' की आलोचनामें लगे और फारसीमें 'मजमा उल-बहरैन'* नामक एक ग्रन्थका भी | गम्भीर अध्यवसायके साथ दुर्बोध भागके कठिन पर्देको निर्माण किया था। सन् १६४० ईस्वीमें जब दारा कश्मीर- | फाड़कर उन्होंने अन्तर्वाहिनी पीयूषधाराका आविष्कार में थे तब उन्हें सर्वप्रथम उपनिषदोंकी महिमाका पता | किया। ये महाशय थे—जर्मनीके सुप्रसिद्ध दार्शनिक लगा। उन्होंने काशीसे कुछ पण्डितोंको बुलाया और उनकी | श्रीअर्थर शोपेनहर (Aurther Schopenhauer)। सहायतासे पचास उपनिषदोंका फारसीमें अनुवाद किया। | (सन् १७८८—१८६०) शोपेनहरने बहुत कठिन परिश्रम करके १६५७ ईस्वीमें यह अनुवाद पूरा हुआ। इसके प्राय तीन | उक्त अनुवादका अध्ययन किया और मुक्तकण्ठसे यह घोषणा वर्षके बाद सन् १६५९ ईस्वीमें औरंगजेबके द्वारा दाराशिकोह | की कि 'मेरा अपना दार्शनिक मत उपनिषद्के मूल तत्त्वोंके मारे गये। | द्वारा विशेषरूपमे प्रभावित है।' इस प्रसङ्गमे मनीषी शोपेन- अकबरके राज्यकालमें भी (१५५६—१५८५) कुछ | हरने उपनिषद्के महत्त्व और प्रभावके सम्बन्धमे जो कुछ उपनिषदोंका अनुवाद हुआ था, परंतु अकबर अथवा दारा- | कहा है, वह विशेषरूपसे ध्यान देने योग्य है— के द्वारा सम्पादित इन अनुवादोंके प्रति सन् १७७५ ईस्वीसे | 'मैं समझता हूँ कि उपनिषद्के द्वारा वैदिक साहित्यके पहलेतक किसी भी पाश्चात्य विद्वान्की दृष्टि आकर्षित नहीं | साथ परिचय लाभ होना वर्तमान शताब्दी (१८१८) का हुई। अयोध्याके नवाब शुजाउद्दौलाकी राजसभाके फरासी | सबसे अधिक परम लाभ है जो इसके पहले किन्हीं भी रेजिडेंट श्री एम० गेंटिल (M Gentil) ने सन् १७७५में | शताब्दियोंको नहीं मिला। मुझे आशा है, चौदहवीं शताब्दी- प्रसिद्धयात्री और जिन्दावस्ताके आविष्कर्त्ता एन्केतिल डुपेरंन | में ग्रीक-साहित्यके पुनरभ्युदयसे यूरोपीय साहित्यकी जो उन्नति (Anquetil Duperron) को दाराशिकोहके द्वारा | हुई थी, संस्कृत-साहित्यका प्रभाव उसकी अपेक्षा कम फल सम्पादित उक्त फारसी अनुवादकी एक पाण्डुलिपि भेजी। | उत्पन्न करनेवाला नहीं होगा। यदि पाठक प्राचीन भारतीय ऎन्क्वेतिल डुपेरंनने कहींसे एक दूसरी पाण्डुलिपि प्राप्त की | विद्यामें दीक्षित हो सकें और गम्भीर उदारताके साथ उसे और दोनोंको मिलाकर फ्रेंच तथा लैटिन भाषामें उक्त फारसी | ग्रहण कर सकें तो मैं जो कुछ कहना चाहता हूँ, उसे वे अनुवादका पुनः अनुवाद किया। लैटिन अनुवाद | अच्छी तरह समझ सकेंगे। उपनिषद्मे सर्वत्र कितनी सुन्दरता- सन् १८०१-२ में 'औपनेखत' (Oupnekhat) नाम- | के साथ वेदोंके भाव प्रकाशित हैं। जो कोई भी उक्त फारसी- से प्रकाशित हुआ। फ्रेंच अनुवाद नहीं छपा। | लेटिन (Persian-Latin) अनुवादका ध्यान देकर उक्त लैटिन अनुवादके प्रकाशित होनेपर पाश्चात्य | अध्ययन करके उपनिषद्की अनुपम भावधारासे परिचित | होगा, उसकी आत्माके गम्भीरतम प्रदेशतकमे एक हलचल | मच जायगी। एक एक पंक्ति कितना दृढ़, सुनिर्दिष्ट और
- 'Majma-ul Bafuran' - ( एशियाटिक सोसाइटी बङ्गाल, कलकत्ताके द्वारा प्रकाशित १९२९)