भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 117, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 117
  • जीवात्मा और परमात्माकी एकता * १०३

प्रतिदिन प्रातःकाल एव सायकाल गीताके एक या दो ही श्लोकोंके भावका मनन, चिन्तन एव ध्यान मनुष्यके जीवनमे दिव्य सुधाधाराका मञ्चार करानेमें बहुत बड़ा निमित्त बन जाता है। यदि इन पक्तियोको पढकर किसीके मनमे भगवान्‌के लिये तीव्र लालसा जाग उठे और वह सच्चाईके साथ विस्तार- पूर्वक भगवद्गीताके गम्भीर अध्ययनमे लग जाय तो इस क्षुद्रं लेखके उद्देश्यकी उचित रीतिसे पूर्ति हो जायगी । भगवान् श्रीकृष्ण सबके सखा, तत्त्वोपदेशक और मार्ग- दर्शक बनें ।

जीवात्मा और परमात्माकी एकता ( लेखक--पं० श्री. हरिकृष्णजी झा, व्याकरण-वेदान्ताचार्य, वेद-शास्त्री, साहित्यालङ्कार )

[ तत्त्वमसि ] 'उपनिषद्' शब्दका अर्थ है-उप समीपं निषीदति प्राप्नोति-इति उपनिषद् अर्थात् जिसके द्वारा परम समीप- भूत ब्रह्मका साक्षात्कार हो, वह हुआ उपनिषद् । 'तत्त्वमसि' इम उपनिषद् महावाक्यमे 'तत्, त्वम्, असि' शब्दत्रयका मम्मिन्नण है । 'तत्' अर्थात् वह परवाचक शब्द है, 'त्वम्' (तू) यह मम्बोवाचक है, 'असि' (हो)- यह शब्द 'तत्' और 'त्वम्' दोनोकी एकताका प्रतिपादक है। जहत्-अजहत् भागत्यागके भेदसे लक्षणा तीन प्रकारकी होती है। जिसमें कहे हुएको छोड़कर तथा उसमे सम्बन्धित दूसरोंका ग्रहण किया जाय उसे जहल्लक्षणा कहते हैं । यथा 'गङ्गाया यग्दत्तस्तिष्ठति' यहाँपर गङ्गाको छोड़कर तत्रस्थ गृहका बोध होता है। जिसमे कहे हुए और उमसे सम्बन्ध रखनेवालेका भी ग्रहण हो, उसे अजहल्लक्षणा कहते हैं। यथा--'काकेभ्यो दधि रक्ष्यताम्'-अर्थात् कौओंसे दहीकी रक्षा कीजिये । यहाँ काकातिरिक्त जीवमात्रका भी बोध होता है। भागत्यागलक्षणा उसे कहते हैं, जिसमे उपाधि छोड़कर सत्याशका ग्रहण हो। यथा 'अय मनुष्य, स एव'--यह मनुष्य वही है। इसमें मनुष्यमात्रका ग्रहण होता है । भूत और वर्तमानकालिक उपाधि त्याज्य है। अत्र 'तत्', 'त्वम्' 'असि'मे 'सोऽय देवदत्तः'के समान भागत्यागलक्षणाकी ही प्राप्ति होती है, क्योकि शुद्ध सत्त्वगुण, और मलिन सत्त्वगुण, इन्हीं उपाधियोंसे जीवात्मा और परमात्माके भेद कल्पित हैं । अर्थात् शुद्ध सत्त्वगुणमें पड़ा हुआ बिम्ब मायाको स्वाधीन करनेसे हिरण्यगर्भताको प्राप्त होकर जगत्‌का उपादान कारण है । इसी निमित्त उपादानात्मकको 'तत् ब्रह्म' कहते हैं। फिर वही बिम्ब जो कि मलिन सत्त्वगुणमें पड़ता है, अविद्याके वशीभूत होकर विविध कामनाओं तथा कर्मोंसे दूषित होनेसे 'त्वम्' जीव शब्दसे व्यवहृत होता है । इन परस्परविरोधिनी शुद्ध सत्त्व ओर मलिन सत्त्वरूप उपाधियोंको छोड़ देनेसे 'त्वम्' (जीव) तथा तत् (ईश्वर) की एकता होती है । पुनः शुद्ध सत्त्वगुण उपाधिरहित ईश्वर और मलिन सत्त्वगुण उपाधिरहित जीवका अद्वितीय सच्चिदानन्द परब्रह्ममें ही समावेश होता है । इस प्रकार माया और अविद्या- रूपी उपाधिको त्याग करके ही अखण्ड सच्चिदानन्द 'तत्त्वमसि' इत्यादि वेदान्त-महावाक्यसे लक्षित होता है, इस प्रकार जीवात्मा और परमात्माकी एकता होती है । मायाविद्ये विहायैवमुपाधी परजीवयोः । अखण्डं सच्चिदानन्दं महावाक्येन लक्ष्यते ॥ इस एकताकी प्रक्रिया यों है-- आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्या- सितव्य आत्मसाक्षात्कार. कर्तव्य. । अर्थात् अध्यात्मनिष्ठ गुरुदेवके पास जाकर उक्त तत्त्व- मस्यादि वाक्योका अर्थाध्ययन कर चित्तमे स्थिर रखना 'श्रवण' शब्दसे कथित है । श्रुत पदार्थका सयुक्तिक पुनः-पुनः विचार करना 'मनन' है । मनन और श्रवणद्वारा निस्सन्देह हुई चित्तकी एकाकार वृत्तिको 'निदिध्यासन' कहते हैं-- ताम्या निर्विचिकित्सेऽर्थे चेतस. स्थापितस्य यत् । एकतानत्यमेतद्धि निदिध्यासनमुच्यते ॥ जब पवनरहित दीपकके तुल्य ध्येयमें ही चित्त हो, ध्याता और ध्यानका ज्ञान न रह जाय, उसे समाधि कहते हैं ।

समाधिका दूसरा नाम ध्यातृध्याने परित्यज्य क्रमाद् ध्येयैकगोचरम् । निवातदीपवच्चित्तं समाधिरभिधीयते ॥ समाधिका अन्य नाम धर्ममेघ भी है, क्योंकि इससे धर्म-

कल्याण: उपनिषद् अङ्क · पृष्ठ 117, कुल 832 में से · BharatKosha