कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 116, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें१०२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * इस सार्वभौम शास्त्रके विचारपूर्ण अध्ययनसे अहिंसाका मूल तत्त्व प्रकट होता है । श्रीकृष्णने अर्जुनके अज्ञानजनित मोहका नाश करके उसके संकुचित स्वजन-अभिमानको दूर कर दिया । युद्धारम्भ-जैसे अवसरपर अपनेको भगवदीय न्यायकी प्रतिष्ठामें निमित्त न मानना ही उनका अज्ञान था । श्रीकृष्ण अर्जुनके भय, शोक, अमर्ष, द्वेष, कामना और राग आदि उन दोषोंको हर लेते हैं, जो हिंसाके दुष्ट सहचर हैं। बाहरसे देखनेमें हिंसाका स्थूल आवरण अक्षुण्ण बनाये रख- कर भगवान्ने अर्जुनके आध्यात्मिक आधारको सर्वथा परिवर्तित कर उन्हें अहिंसाकी प्रतिमूर्ति बना दिया । इस प्रकार केवल भगवान्के आश्रित होकर, बिना किसी पुरस्कारकी आशाके तथा उनके प्रति आत्मसमर्पणकी भावनामे स्थिर हुआ अर्जुन कर्म करता हुआ भी नहीं करता, मारता हुआ भी नहीं मारता, क्योंकि गीतामे उसकी क्रियाएँ अब अहङ्कारके विषैले दशसे मुक्त हो गयी हैं। अहिंसा और अमरता गीतामें साथ-साथ चलती हैं। कूटस्थ साक्षीके रूपमें रहना अर्थात् संसारमें रहता हुआ प्रतीत होनेपर भी उससे बिल्कुल निर्लिप्त रहना ही वह अमर जीवन है । इसी स्थितिसे अकर्ममें कर्म और कर्ममें अकर्मका विज्ञान प्रकट होता है । श्रीकृष्ण साक्षात् वह आत्मतत्त्व है, जो समस्त ज्ञानका केन्द्र एव परिधि दोनों है । जगत्की लौकिकताके मोहक स्वरूपके परे दृष्टि डालना; अपने स्वरूपके, अपनी स्वाभाविक चरित्रगत विशेषताओंके, सहज प्रवृत्तियोंके सम्बन्धमें विचार करना, नैसर्गिक प्रेरणाओंका तथा एकता एव सामञ्जस्य उत्पन्न करनेवाले रचनात्मक गुणोंका अध्ययन कर उनपर सार्वभौम दृष्टिसे विचार करना, विशाल मानवताके धरातलपर खड़े होकर सुख दु.खका अनुभव करना और अपने अदर भगवत्तत्त्वको अभिव्यक्त करना सीखो। यही मानव-जातिके प्रति श्रीकृष्णका सनातन सन्देश है । इस प्रकार गीता धर्म और अध्यात्मको हमारे दैनन्दिन जीवनसे वियुक्त नहीं करती। संसारमें आज एक धार्मिक भूकम्प हो रहा है। भौतिक- वादपर अवलम्बित वर्तमान वैज्ञानिक दृष्टिकोणसे उत्पन्न 'हुई कृत्रिम जीवनचर्याका अनुगमन धर्मके उच्चतर आदर्शोंको पीछे ढकेल देना और सुखकी मृगतृष्णाके पीछे दौड़ना है। धर्म व्यापारकी वस्तु नही है । धर्म विनिमयका सिद्धान्त नहीं है, सट्टे बाजारमे होनेवाल मानदीय सौदा- नहीं है। धर्म तो जीवनको दिव्य बनाने का एक शक्तिशाली साधन है । धर्म ही वह शक्ति है जो दिनके प्रकाशसे भी तनकर चलती है, जब कि अन्य समस्त विज्ञान रात्रिके अन्धकारमे भी आँखें बचाते हुए टेढे मेढ़े मागोंसे छिपकर चलते हैं । धर्मकी अधिदेवता ही मनुष्यकी भगवत्ताका दावेके साथ प्रतिपादन करके मानव- जातिकी समस्याओंका निश्चयात्मक समाधान करती है। यही अलौकिक जगत्से परेका तत्त्व है और वही मनुष्यके भीतर रहनेवाली वस्तु है। धर्मका बाह्य रूप केवल छिलका और भूसी है । यथार्थ आध्यात्मिक जीवन सनातन तत्त्वमें स्थित और अनन्तमे प्रतिष्ठित है। वह सदा अमर और नित्य वर्तमान है। वह सर्वदा पूर्ण है, जन कि अनित्य एव क्षणभङ्गुर प्रातिभासिक जीवनकी स्थिति इस परिवर्तनशील जगत्में है, वह प्रकृति एव मनतरू पङ्गमें डुबा हुआ है । अतएव यह जीवन प्रतिक्षण होनेवाली मृत्यु है। मृत्युमे ही जीना है। धर्म ही संतोंका सतपना है, ज्ञानियोंका ज्ञान है और बलवानोंका बल है। यही परात्पर शान्ति है, यही व्यक्तियों एव राष्ट्रोंकी पीड़ा यन्त्रणाकी महौषध है। यह समारको, मारे राष्ट्रां एव समस्त जातियोंको मनुष्योंके परस्पर भ्रातृत्व तथा भगवान्के पितृत्वसे भी आगे एकमात्र आत्मभावनाकी ओर ले जाता है। सक्षेपमें आजके विच्छिन्न एव भ्रान्त जगत्के लिये यही एक ध्रुव आशा है । ससारके घावोंको केवल यही निश्चितरूपसे भर सकता है। कहा जाता है कि गायत्री-मन्त्रके प्रत्येक अक्षरके पीछे एक-एकके हिसाबसे श्रीकृष्णने चौबीस गीताएँ कही हैं; परतु उनमेंसे केवल भगवद्गीता तथा उत्तरगीता ही ससारमें प्रसिद्ध हो पायीं। भगवद्गीताका ससारकी प्राय. सभी भाषाओंमें अनुवाद और व्याख्या हो चुकी है। गीताके आध्यात्मिक अर्थ बाह्यावरणोंके आडम्बरपूर्ण त्याग नहीं हैं। समाजका चरम तत्त्व मानव है। मनुष्यके चरम तत्त्व भगवान् हैं। और भगवान्का चरम तत्त्व है- 'मैं' एव 'मेरा' के त्यागद्वारा, सदसद्विवेकके द्वारा तथा एक अद्वितीय निर्गुण सत्ताके अपरोक्षानुभवके द्वारा उनकी प्राप्ति । आत्मतत्त्व ( ब्रह्मतत्त्व) का ज्ञान, जिसकी भूख मनुष्यको सदा बनी रहती है, उनके क्षुद्र अहङ्कारकी सीमामे नहीं ठहरता। अहङ्कारी जीव उसको ग्रहण ही नहीं कर सकता । वह अहङ्कारके परे है। सभी साधनों और फलाके अन्तर्गत भी है तथा उन सबका चरम फल भी यही है । इसकी प्रतीति होती है एकत्वकी अनुभूतिमें, उस नैसर्गिक एव विशुद्ध ज्ञानकी अवस्था में, जो अन्तरतम एव अपरोक्ष है, जहाँ जाननेका अर्थ है वही बन जाना और वही बन जाना ही जानना है।