कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 115, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंगीतोपनिषद् (लेखक—स्वामी श्रीराजेश्वरानन्दजी भगवान् श्रीकृष्णने भारतवर्षके कुरुक्षेत्र नामक रण- प्राङ्गणमे अर्जुनको अपनी भगवद्गीता सुनायी और यों अर्जुनको निमित्त बनाकर सारे संसारको वह दिव्य उपदेश प्रदान किया। गीताका मूल स्रोत महाभारत नामक महाकाव्य है, जो एक प्रकारका विश्वकोश है। गीता महाभारतकी मुकुट मणि है। गीता विश्वसंस्कृतिकी कुञ्जी है, और गीताके प्रकाशक स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण हैं। यह समूची मानव-जातिके लिये धर्मग्रन्थ है। यह एक उपनिषद् है; ज्ञानका उज्ज्वल प्रदीप है। यही ब्रह्मविद्या है, योगशास्त्र है एवं आध्यात्मिक जीवनका दिव्य संदेश है। यह श्रीकृष्ण और अर्जुन (नारायण और नर) का संवाद है। गीता मनुष्यको भगवान्का साक्षात्कार कराती है तथा जीवनमे सरसता एव सरलता प्रवाहित करती है। अर्जुनके व्यष्टि चैतन्यका परिच्छिन्न भवन तोड़ देनेपर स्वयं श्रीकृष्ण ही सामने उपस्थित हो जाते हैं। समस्त जीवात्माओंके सामान्य केन्द्र भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं। श्रीकृष्ण पृथिवीके लिये स्वर्गका द्वार खोल देते हैं और बिना जाति, वर्ण, सम्प्रदाय, देश या स्त्री-पुरुषके भेदके जीवमात्रको अपने राज्यमें प्रवेश करनेकी अनुमति प्रदान करते हैं। गीताकी सर्वतोमुखी शिक्षा, जीवनके प्रत्येक क्षेत्रसे लोगोंको उन्नतिकी ओर ले जानेवाली ज्योति है। श्रीकृष्ण जगद्गुरु हैं। वे विश्वात्मा हैं, दिव्य प्रेरणा तथा आध्यात्मिक प्रकाशके केन्द्र हैं। यद्यपि गीता ऊपरसे जगत्कल्याणकी भावनाको लेकर लोकसंग्रहका निष्काम सेवाके सिद्धान्तके रूपमें उपदेश देती है, तथापि उसका हृद्गत ध्येय भगवत्प्राप्ति है। अतएव गीता मानवताको भगवत्सत्तासे ऊपर स्थान नहीं देती, और न उसे भगवान्के स्थानपर ही बिठाती है। गीताकी दृष्टिमें मानव- सेवा माधव-सेवा नहीं है, वर वह माधव सेवामें ही मानव-सेवा मानती है। भगवत्प्राप्त पुरुष ही मनुष्योंकी यथार्थ सेवा कर सकता है। मन, वाणी और कर्मसे दिव्य तत्त्वका अनुभव एव अभिव्यञ्जन ही जीवनका लक्ष्य है, वही जीवात्माका गन्तव्य स्थान है। कर्तव्यके लिये कर्तव्यका अनुष्ठान, केवल समाज-सेवा, लोकहितके कार्य, शाब्दिक सहानुभूति तथा इसी प्रकारके अन्य सिद्धान्त गीताकी सार्वभौम-शिक्षाको विकृत और सीमाबद्ध कर देते हैं। भगवत्-स्वरूपकी अभिव्यक्ति ही इसका मूल मन्त्र है, समाज-पूजा नहीं । व्यावहारिक दृष्टिसे जीवनको साधनके द्वारा सुव्यवस्थित बनाने और अपने स्वधर्मका ज्ञान प्राप्त करनेमें, अपने अधिक- से-अधिक अनुकूल पद्धतिके द्वारा अग्रसर होनेमें एव अपने स्वधर्मका निर्णय करके उसका तदनुसार अनुष्ठान करनेमें गीताके उपदेशोंसे बड़ी सहायता मिलती है। अपने स्वरूपके अनुकूल होनेके कारण स्वधर्म स्वाभावरूप होता है और अपने वास्तविक स्वरूपका अभिव्यञ्जक होनेके कारण वह सहज होता है। स्वधर्ममे सर्वश्रेष्ठ भगवत्ता है और उसीमें भगवदीय श्रेष्ठता रहती है। उसमें नित्य-पूर्णता विद्यमान रहती है। वह भगवान्की मुरलीके स्वर में स्वर मिलाकर जीवनके उद्देश्यको पूरा करता है और इस प्रकार मर्त्यलोकमें दिव्यताको उतार देता है। वह व्यक्तिके समग्र जीवनको भगवान्के एक दिव्य मधुर सङ्गीतमें परिणत कर देता है, क्योंकि वह विश्वात्मा सभी देशों और सभी जातियोंके मनुष्योंमें समान रूपसे व्याप्त है। गीता मनुष्यकी इन्द्रियोंको उसके अधीन करके उसे उनका स्वामी बनाती है। उसका यह स्वामित्व नष्ट न होने पाये, इसके लिये गीता चाहती है कि वह भगवान्के बनाये हुए नियमोंका दृढतासे निरन्तर पालन करे। इस प्रकार चलनेवाले मनुष्यमें एक उज्ज्वल सौम्यता एव सौम्य कान्ति झलकती है। उसके कर्मोंमें योगियोंका-सा, उपासनामें देवताओंका सा एव ज्ञानमें ऋषियोंका सा तेज तथा गौरव दिखायी पड़ता है। गीता बाह्य उपरामताको धार्मिकताके रूपमें नहीं सजाती। प्रकृतिमे अचलता नहीं है। मनुष्य अचानक अथवा एकाएक बादलोंसे नहीं टपक पड़ता। वह यन्त्र भी नहीं है। प्रत्येकका जन्म किसी उद्देश्यकी पूर्तिंके लिये होता है, जिसके लिये उसे भगवदीय शक्तिका साहाय्य मिलता रहता है। जिन प्रश्नोंको हल करनेमें मानवीय बुद्धि कुण्ठित हो जाती है, उनपर गीता प्रचुर प्रकाश डालती है। वह विश्वका नियमन करनेवाले आध्यात्मिक, नैतिक, मानसिक एव भौतिक नियमोंका निर्देश करती है। गीता अपना निराला तेज एव प्रभाव रखनेवाली जीवन-सुधा है।