कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 114, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें१०० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * सङ्गत है। गुरुकी स्थिति प्रभुसे, मित्रसे सर्वथा भिन्न है। एक अर्थमें गुरु प्रभुसे भी बड़ा है। कबीरजी तो स्पष्ट कहते हैं- गुरु साहब दोनों खड़े, काके लागूँ पाइ । बलिहारी गुरुदेवकी, जिन साहब दियो दिखाइ ॥ ७-फिर तत्त्वात्तत्त्वदर्शी गुरुकी कृपासे ही तो हम तत्त्वको और अतत्त्वको देख सकेंगे-जान सकेंगे, अतः गुरुकी कक्षा इस संसारमें सबसे ऊँची है। गुरुसे ही हमें 'उपनयन' द्वारा माया- विषयक (संसारोपयोगी) ज्ञान प्राप्त होता है और गुरुसे ही हमें 'उपनिषद्' द्वारा मायातीत ज्ञान प्राप्त होता है। कहा भी है-'बिन गुरु होइ न ज्ञान ।' उपनिषद् भी कहती है- 'समित्पाणिः श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठम्' इत्यादि । इसीको लक्ष्य करके भगवान् श्रीकृष्ण भी अर्जुनको लोक शिक्षार्थ उपदेश करते हैं- तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ ( गीता ४ । ३४ ) 'अर्जुन ! तू उस तत्त्वज्ञानको तत्त्वदर्शी ज्ञानी गुरुओंके समीप जाकर प्रणामपूर्वक युक्त प्रश्नद्वारा तथा उनकी सेवा करते हुए प्राप्त कर ।' इस प्रकार वे अवश्य तुझे तत्त्व- ज्ञानका उपदेश करेंगे। वस्तुतः गुरु-कृपासे सब कुछ सुलभ है। प्रभु परमेश्वरकी कृपाका आधार भी गुरु-कृपा ही है। बिना गुरुकी कृपाके परम प्रभुकी कृपा नहीं होती, और बिना प्रभुकी कृपा तत्त्वज्ञान नहीं मिलता। उपनिषद्का स्पष्ट प्रवचन है- यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनू स्स्वाम् ॥ (कठ० १।२।२३) अर्थात् यह परमात्मा जिसके ऊपर कृपा करता है, वही इसे प्राप्त कर पाता है। उसीके लिये यह अपने यथार्थस्वरूप- को प्रकाशित कर देता है। ८-इस प्रकार हमने देखा कि गुरुकी महिमा अनन्त है। उपनिषद्-वाङ्मय अनेक तत्त्वदर्शी गुरुओके वाक्य ही तो हैं जो कि भिन्न भिन्न कालोंमें भिन्न-भिन्न रीतियोसे उसी एक तत्त्वज्ञानका उपदेश कर रहे हैं। हमे गुरुपदेशके समान श्रद्धापूर्वक औपनिषदिक वाक्योंका अनुशीलन करना चाहिये। इतस्ततः उठी हुई शङ्काओंके उत्तर भी श्रद्धापूर्वक उन्हींमें इतस्ततः खोजने चाहिये। अथवा किसी ज्ञानी गुरुसे उन शङ्काओंका निवारण करना चाहिये। यदि श्रद्धा है तो अवश्य ही शङ्काओंका समाधान होता जायगा-यह मेरा दृढ विश्वास है। भगवान् श्रीकृष्णजीके द्वारा कितना दृढ आश्वासन दिया गया है- श्रद्धावाँल्लभते ज्ञान तत्पर सयतेन्द्रियः । ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥ ( गीता ४ । ३९ ) 'ज्ञान परायण, जितेन्द्रिय पुरुष, यदि श्रद्धावान् है, तो अवश्य तत्त्वज्ञानको प्राप्त करता है। ज्ञानको प्राप्त करके वह शीघ्र ही परम शान्तिको भी पाता है।' ९-सारांश यह कि उपनिषद्-वाङ्मयसे पाठकोंका सम्बन्ध गुरु शिष्य-सम्बन्ध होना चाहिये। शङ्काएँ उठें, कोई चिन्ता नहीं ! धैर्यपूर्वक श्रद्धा-समन्वित होकर उनका समाधान प्राप्त करनेकी उत्कण्ठा रक्खे, समाधान अवश्य प्राप्त होगा- शीघ्र ही प्राप्त होगा। श्रद्धाकी महिमा अपार है। अतः उपनिषद् (वेदान्त) के वाक्य साक्षात् गुरुवाक्य हैं। इसी- को निःश्रेयस वाक्य भी कह सकते हैं। यही परा विद्या है। यह आत्मानुभव प्रमाण है। इसको जानकर फिर कुछ जानना शेष नहीं रहता। यही जानना परम प्रयोजनरूप मोक्षका साधन है। त्वमेव सर्वम् (रचयिता--श्रीभगवतीप्रसादजी त्रिपाठी, विशारद, काव्यतीर्थ, एम्० ए०, एल्-एल्० बी०) यात्री तुम्हीं भवसागर केवट पोत तुम्हीं पतवार तुम्ही हो । दर्शक दृश्य तुम्हीं नटनागर नायक नाटककार तुम्हीं हो ॥ व्यष्टि समष्टि अहंकृति हो मन बुद्धि तुम्हीं हो, विचार तुम्हीं हो । जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति तुरीय अकार उकार मकार तुम्हीं हो ॥१॥ विष्णु पुकारते कोई तुम्हें शिव कोई हैं शक्ति महा बतलाते । ईश्वर कोई परंरस कारण ब्रह्म हैं कोई तुम्हें ठहराते ॥ शंकर एक ही राम कभी घनश्याम स्वरूप तुम्हीं बन जाते । बुद्बुद वीचि प्रवाह यथा जल एक अनेक स्वरूपमें पाते ॥२॥