कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
- पाश्चात्य पण्डितोंपर उपनिषद्का प्रभाव * १०५ सुसमञ्जस अर्थ प्रकट कर रही है । प्रत्येक वाक्यसे कितना गभीर, मौलिक और गम्भीरतापूर्ण विचारसमूह प्रकट हो रहा है, सम्पूर्ण ग्रन्थ कैसे उच्च, पवित्र और ऐकान्तिक भावोंसे ओतप्रोत है । x x x सारे पृथ्वीमण्डलमे मूल उपनिषद्- के समान इतना फलोत्पादक और उच्च भावोद्दीपक ग्रन्थ कहीं भी नहीं है। इसने मुझको जीवनमे शान्ति प्रदान की है और मरणमे भी यह शान्ति देगा' ।¹ जिस देशमें उपनिषद्के गम्भीर सत्यसमूहका प्रचार था, उस देशमें ईसाई-धर्मके प्रचारका प्रयत्न व्यर्थ होगा और निकट भविष्यमें यूरोपीय विचारधारा उक्त उपनिषद्के द्वारा पूर्णरूपसे प्रभावित हो जायगी—इस सम्बन्धमें शोपेनहरने कहा था— 'भारतमें हमारे धर्मकी जड़ कभी नहीं गड़ेगी । मानव- जातिकी 'पुरानी प्रजा' गैलिलिकी घटनाओंसे कभी निराकृत नहीं होगी। वरं भारतीय प्रजाकी धारा यूरोपमे प्रवाहित होगी एवं हमारे ज्ञान और विचारमें आमूल परिवर्तन ला देगी' ।² उनकी यह भविष्य-वाणी सफल हुई । स्वामी विवेकानन्द- की अमेरिकन शिष्या 'सारा बुल' (Sarra Bull) ने अपने एक पत्रमें लिखा था कि 'जर्मनीका दार्शनिक सम्प्रदाय, इङ्गलैंडके प्राच्य पण्डित और हमारे अपने देशके एमरसन आदि साक्षी दे रहे हैं कि पाश्चात्य विचार आजकल सचमुच ही वेदान्तके द्वारा अनुप्राणित हैं।'³ सन् १८४४ में बर्लिनमें श्री शेलिंग (Schelling) महोदयकी उपनिषत्सम्बन्धी व्याख्यान-मालाको सुनकर प्रसिद्ध पाश्चात्य पण्डित श्रीमैक्समूलर (Max Muller) का ध्यान सबसे पहले संस्कृत साहित्यकी ओर आकृष्ट हुआ । उपनिषदोंके सम्बन्धमें विचार आरम्भ करते ही उन्होंने अनुभव किया कि उपनिषदोंका यथार्थ मर्म समझनेके लिये पहले उनसे पूर्वरचित वेद-मन्त्र और ब्राह्मणभागपर विचार करना आवश्यक है । इस प्रकार उपनिषदोंसे उन्होंने वेद- चर्चाके लिये प्रेरणा प्राप्त की । शोपेनहरके बाद अनेकों पाश्चात्य विद्वानोंने उपनिषद्पर विचार करके विभिन्न प्रकार- से उसकी महिमा गायी है। किसी-किसीने तो उपनिषद्को 'मानव-चेतनाका सर्वोच्च फल' बतलाया है ।⁴ उपनिषत्-प्रतिपादित वैदान्तिक धर्म ही देर सबेर सम्पूर्ण पृथिवीका धर्म होगा—बहुतसे मनीषियोंने ऐसी भविष्य-वाणी की है। शोपेनहरने 'उन्नीसवीं शताब्दी'के प्रथम भागमें लिखा है—"It is destined sooner or later to become the faith of the people " विश्वकवि रवीन्द्रनाथने कहा है—'चक्षुसम्पन्न व्यक्ति देखेंगे कि भारत- का ब्रह्मज्ञान समस्त पृथिवीका धर्म बनने लगा है । प्रातः- कालीन सूर्यकी अरुण किरणोंसे पूर्वदिग् आलोकित होने लगी है, परतु जब वह सूर्य मध्याह्न-गगनमें प्रकाशित होगा, उस समय उसकी दीप्तिसे समग्र भूमण्डल दीप्तिमय हो उठेगा ।' स्वामी विवेकानन्दने वर्तमान भारतके जीवनमें उपनिषद्- की कार्यकारिताकी मुक्तकण्ठसे घोषणा की है। गत सहस्रों वर्षोंसे हमारे जातीय जीवनमे जो दोष-दौर्बल्य आ गया है, जिसने हमको नितान्त निर्वीर्य बना डाला है, उसको हटाने- में एकमात्र उपनिषद्के महान् वीर्यप्रद सत्य ही समर्थ हैं। 'भारतीय जीवनमें वेदान्तकी कार्यकारिता' नामक व्याख्यान- मे स्वामीजीने कहा है— 'बन्धुओ ! स्वदेशवासियो ! मै जितना ही उपनिषदोंको पढता हूँ, उतना ही तुमलोगोंके लिये आँसू बहाता हूँ । हमारे लिये यह आवश्यक हो गया है कि उपनिषदुक्त तेजस्विताको ही हम अपने जीवनमें विशेषरूपसे परिणत करें। शक्ति,—बस, शक्ति ही हमें चाहिये, हमें शक्तिकी विशेष आवश्यकता आ पड़ी है। हमें कौन शक्ति देगा ? । x x x उपनिषदें शक्तिकी महान् खानें हैं । उपनिषद् जिस शक्तिका सञ्चार करनेमें समर्थ है, वह ऐसी है कि सम्पूर्ण 1 From every sentence deep, original and sublime thoughts arise, and the whole is pervaded by a high and holy and earnest spirit In the whole world there is no study, except that of the originals, so beneficial and so elevating as that of the Oupnekhat. It has been the solace of my life, it will be the solace of my death
- In India our religion will now and never strike root. The primitive wisdom of the human race will never be pushed aside by the events of Galilee. On the contrary, Indian wisdom will flow back upon Europe, and produce a thorough change in our knowing and thinking
- The German schools, the English Orientalists and our own Emerson testify the fact that it is literally true that Vedantic thoughts pervade the Western thought of today उ० अं० १४— 1 'Personally I regard the Upanisads as the highest product of the human mind, the crystallized wisdom of divinely illumined men' Dr Annie Besant
१०६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * जगत्को पुनर्जीवन, शक्ति और शौर्य-वीर्य प्रदान करनेमें समर्थ है। जगत्की समस्त जातियों, समस्त मतो और सभी सम्प्रदायोंके दीन, दुर्बल, दुखी और पददलित प्राणियोंको पुकार पुकारकर कह रही है कि 'सभी अपने पैरोंपर खड़े होकर मुक्त हो जाओ।' मुक्ति या स्वाधीनता-दैहिक स्वाधीनता, मानसिक स्वाधीनता और आध्यात्मिक स्वाधीनता- यही उपनिषद्का मूल मन्त्र है। जगद्भरमे यही एकमात्र शास्त्र है जो उद्धार (Salvation) की बात नहीं कहता, मुक्तिकी बात कहता है। यथार्थ बन्धनसे मुक्त होओ, दुर्बलता- से मुक्त होओ।'
उपनिषदोंमें वाक्का स्वरूप (लेखक---पं० श्रीरामसुरेशजी त्रिपाठी, एम्० ए०)
वाणी चेतनाकी अमर देन है। वाणीके बिना जगत् सूना है, जीवन पङ्गु है। संसारके प्रायः सारे व्यवहार वाणी-व्यापार- पर ही निर्भर हैं। सभ्यता और संस्कृति इसकी गोदमें फूलती फलती हैं। वाणी केवल विचारोंके विनिमयका ही माध्यम नहीं, अपितु विश्वमें जो कुछ सत्य है, शिव है, सुन्दर है, उन सबका भी व्यञ्जक है। इस वाणीकी दूसरी प्राचीन सञ्ज्ञा वाक् है। वाक्के विषयमे उपनिषदोंमें मधुर उद्गार तथा युक्तिपूर्ण विचार भरे पड़े हैं; साथ ही इसके भौतिक, दैविक तथा आध्यात्मिक रूपकी रेखा भी खींची गयी है, जिसे देख आजका भाषा-विज्ञानका विद्यार्थी भी एक बार चकित रह जाता है। उपनिषत्-कालीन वाक्के स्वरूपकी पीठिका वेदोंमे ही तैयार हो गयी थी और उसी समय इसे रहस्यकी कोटिमें डाल दिया गया था। जलमें, थलमें, ओषधियोंमें-सबमें दैवी सत्ताको परखनेवाले वैदिक ऋषि वाक्को अनुकरणमूलक (Onomatopoeic) या मनोराग-व्यञ्जक (Inter- jectional) कैसे मान सकते थे। ऋग्वेदके अनुसार वाक्- को देवोंने पैदा किया- 'देवीं वाचमजनयन्त देवा.।' (ऋक्संहिता, निरुक्त ११। २९ में उद्धृत) इस वाक्के चार विभाग है- 'चत्वारि वाक् परिमिता पदानि।' (ऋक्संहिता १। १६४। ४५) महाभाष्यकार पतञ्जलिने इन चारसे नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपातका ग्रहण किया है। वाक्के परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी रूपका सकेत भी इसी मन्त्रमे माना जाता है। ब्राह्मणग्रन्थोंमे चार प्रकारके विभागको दूसरे रूपोंमें भी व्यक्त किया है (देखिये निरुक्त १३। ९)। ऋग्वेदके दसवें मण्डलके १२५वें सूक्तकी द्रष्टा 'वाक्' नामकी एक विदुषी है। वह अम्भृण महर्षिकी पुत्री थी। उसने स्वय अपनी (वाक्की) स्तुति परमात्माके रूपमें की है। इस सूक्तमें वाक्के अलौकिक रूपकी झलक है। पर साथ ही वैदिक ऋषियोंने वाक्के लौकिक रूपकी भी उपेक्षा नहीं की है। वाक्मे निष्णात व्यक्तियोंकी प्रचुर महिमा गायी गयी है। 'वाक्को कोई देखते हुए भी नहीं देखता, सुनते हुए भी नहीं सुनता। पर कुछ लोग वाक्को निकटसे जानते हैं और उन के सामने वाक् अपना रहस्य वैसे ही खोल देती है जैसे कोई सुसज्जित, उत्कण्ठित पत्नी अपने-आपको अपने पतिके सामने डाल देती है।' (ऋक्संहिता १०। ६१ । ४) विशुद्ध वाक्के व्यवहार करनेवालोके बारेमें निम्नलिखित मन्त्र प्रसिद्ध है- सक्तुमिव तितउना पुनन्तो यत्र धीरा मनसा वाचमक्रत। अत्रा सखायः सख्यानि जानते भद्रैषां लक्ष्मीर्निहिताधिवाचि ॥ (ऋक्संहिता १०। ६१ । २) 'जिस तरह छलनीसे सत्तूको शुद्ध करते हैं, उसी तरह जो विद्वान् ज्ञानसे वाणीको शुद्ध कर उसका प्रयोग करते हैं, वे लोकमें मित्र होते हैं, मित्रताका सुझ पाते हैं, उनकी वाणीमें कल्याणमयी रमणीयता रहती है।' (इस मन्त्रके तृतीय पाद- की व्याख्या पतञ्जलि, दुर्गाचार्य, सायण और नागेशने भिन्न- भिन्न रूपसे की है, जिसे उनके ग्रन्थोंमें देखना चाहिये ।) वेदोंमें वाक्के जो स्वरूप मिलते हैं, वे उपनिषदोंमें विकसित रूपमें देख पड़ते हैं । वैदिक कवियोंके हृदयमें जो भावना उठी, वह छन्दोंके रूपमें बाहर आ गयी। वहाँ बनावट नहीं, अतः किसी वस्तुके परीक्षणकी इच्छाका भी अभाव है। उनकी अधिकांश समस्याएं द्वन्द्वमय जीवनके बाह्यरूपसे सम्बन्ध रखती हैं, जीवनसे परेकी केवल उनमे जिज्ञासा है। सत्यकी
- उपनिषदोंमें स्वरूप * १०७ ओर उनकी पहुँच बहुत कुछ प्रातिभज्ञानके द्वारा है। उपनिषद्के ऋषियोंके सामने बाह्य-जीवनकी समस्याएँ नहीं थीं। उनका मुख्य उद्देश्य सत्यकी खोज था । अतः उनकी विचारपरम्परामें तारतम्यका सौष्ठव है । उनकी रहस्यानुभूति- तकमें तर्ककी छाया देख पड़ती है। उन्होंने जीवनको गति देनेवाले अन्न, प्राण, मन आदि जो कुछ हैं, उन सबके याथार्थ्यकी बारी-बारीसे समीक्षा की है। उपनिषदोंमें वाक्के स्वरूपका निर्देश भी इसी समीक्षाका फल है। मोटे रूपमें उपनिषत्-कालीन वाक् शब्दकी व्युत्पत्ति वही है, जो वेदोंमें देख पड़ती है अर्थात् वाक् वह है, जो बोली जाय ( वाक् कस्माद्, वचेः—निरुक्त २।२२।२) । जिस-किसी भी शब्द- को वाक् कहते हैं (यः कश्च शब्दः वागेव सा—बृहदारण्यक उपनिषद् १ । ५ । ३) (तैत्तिरीय उपनिषद् १ । ३ । ५) के 'वाक् सन्धिः, जिह्वा सन्धानम्' यह वाक्य वाक् और जिह्वा- के सम्बन्धका स्पष्ट संकेत कर रहा है। उपनिषद्के ऋषियों- ने इस जिह्वा-व्यापारके पीछे छिपी हुई प्राणशक्ति और मानसिक शक्तिका भी सङ्केत किया है, जिनका अत्यन्त सूक्ष्म विवेचन बादके उपनिषदों और तान्त्रिक ग्रन्थोंमें बीज, बिन्दु, नाद आदिके रूपसे और व्याकरण-दर्शनमें स्फोटके रूपमें किया गया है। यह वाक् लोक-यात्रामे अद्वितीय सहायक है । जनकने याज्ञवल्क्यसे पूछा—'जब सूर्य अस्त हो जाता है, चन्द्रमाकी चाँदनी भी नहीं रहती, जब आग भी बुझी रहती है, उस समय मानवको प्रकाश देनेवाली कौन सी वस्तु है?' उत्तर मिला 'वह वाक् है। वाक् ही पुरुषका प्रकाशक है' (बृहदा- रण्यक उपनिषद् ४।३।५) । 'यदि वाक्की सृष्टि न होती तो धर्म-अधर्मका ज्ञान न होता, साँच-झूठका पता न चलता, कौन साधु है और कौन असाधु है, कौन सहृदय है और कौन अनुभूति-शून्य है—इसकी जानकारी न होती। वाक् ही इन सबको सूचित करती है । वाक्की उपासना करो' (छान्दोग्य उपनिषद् ७।२) । 'ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेदका ज्ञान वाक्से ही होता है। इतिहास, पुराण और अनेक विद्याएँ वाक्से ही जानी जाती हैं। उपनिषद्, श्लोक, सूत्र, व्याख्यान और अनुव्याख्यान वाक्के ही विषय हैं। जो कुछ हवन किया गया, खाया गया, पीया गया—ये सभी वाक्से ही ज्ञात होते हैं। इस लोकका, परलोकका, सम्पूर्ण भूतोंका ज्ञान वाक्से ही होता है।' (बृहदारण्यक उपनिषद् ४।१।२) । ज्ञानका एकमात्र अधिष्ठान वाक् है ( सर्वेषा वेदाना वागेवायतनम्—बृहदारण्यक उपनिषद् २।४।११) । उपनिषदोंमें वाक् और विचारके परस्पर सम्बन्धकी भी व्यञ्जना है। बिना भाषाके विचार सम्भव है कि नहीं, यह एक विवादात्मक प्रश्न है । भाषाविज्ञानके भाषाकी उत्पत्ति- विषयक कुछ मत भाषा और विचारके परस्पर सम्बन्धपर ही आश्रित हैं। हेस (Heyse) और मैक्समूलर (Max Muller) इसी मतके समर्थक हैं। प्राचीन आचार्योंमें भर्तृहरिका भी यही मत है। 'संसारमें ऐसा कोई ज्ञान (प्रत्यय) नहीं जो शब्दके बिना जाना जा सके' (वाक्यपदीय १।१२४) । पतञ्जलिके 'नित्ये शब्दार्थसम्बन्धे' और कालिदासके 'वागर्थाविव संपृक्तौ' में भी वाक् और विचारके नित्य सम्बन्धकी अभिव्यक्ति है। उपर्युक्त प्रश्नका उत्तर यदि उपनिषदोंमें ढूँढा जाय तो समाधानके दो पहलू दिखायी देंगे। पहला यह कि विचार अथवा ज्ञान वाक्की सहायताके बिना भी सम्भव है। ज्ञान इस कोटिका भी हो सकता है जो वाक्से परे हो। जब उपनिषद्के ऋषि यह उद्घोषित करते हैं कि 'वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम्' मैं उस परम पुरुषको जानता हूँ और दूसरे क्षण यह कहते हैं कि 'नैव वाचा न मनसा' ( कठोपनिषद् ६ । १३) वह न तो वाणीसे न मनसे जाना जा सकता है तो इससे स्पष्ट है कि ज्ञानकी गहराईतक वाणी- की पहुँच नहीं। यह भी कहा गया है— वाग्वै मनसो हसीयसी । अपरिमिततरमिव हि मन । परिमिततरेव वाक् । ( शतपथब्राह्मण १।३।६) अर्थात् वाक् विचारसे हलकी है। विचार असीम-सा है, जब कि वाक् सीमित-सी है। समाधानका दूसरा पहलू यह है कि वाक् और विचारका घना सम्बन्ध है। सृष्टिक्रममें मन और वाक्के, विचार और वाणीके परस्पर संक्रमणका उल्लेख उपनिषदोंमें मिलता है (स मनसा वाचं मिथुनं समभवत्—बृहदारण्यक उपनिषद् १।२।४) । एक स्थानपर कहा गया है कि वाक् धेनु है, प्राण इसका ऋषभ (साँड़) है और मन (विचार) इसका वत्स है (बृहदा- रण्यक उपनिषद् ५।८।१)। वाक् और विचारके परस्पर सहयोगीकी अनिवार्यता देखकर ही कहा गया था— वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता, मनो मे वाचि प्रतिष्ठितम् । ( ऐतरेय उपनिषद्, अन्तिम अंश ) अस्तु, उपनिषद् वाक् और विचारके सम्बन्धको, उनके असम्बन्धको और वाक्के मूलमें स्थित मानसिक क्रियाको अच्छी तरह प्रकट करते हैं ।
१०८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * [बायाँ स्तम्भ] उपनिषदोंमे वाक्के कलापक्षकी भी अभिव्यञ्जना है। वाक् स्वयं एक प्रकारकी अभिव्यक्ति है। प्रभावान्वित अभिव्यक्तिका नाम कला है। अतः जब वाक्की अभिव्यक्ति संवेदनशील हो उठती है, जब वाक् आह्लादकता, माधुर्यभाव या सत्त्वोद्रेकको जगानेमें समर्थ होती है, उसका कलात्मक रूप निखर उठता है, जिसके भीतर रस और बाहर सौन्दर्य लहराता रहता है। वाक्की सौन्दर्य-मीमांसामे कहा गया— वाच ऋग्रस, ऋच साम रस, साम्न उद्गीथो रस । (छान्दोग्य उपनिषद् १।१।२) वाक्का रस (सौन्दर्य) ऋक् (कविता) है। ऋक्का रस साम (लय-नाद-सौन्दर्य या समरसता) है। सामका रस उद्गीथ है। (उद्गीथ सामवेदका द्वितीय भाग, छान्दोग्य उपनिषद्में उद्गीथसे प्रणवका ग्रहण किया गया है।) भाव यह है कि वाक्का सौन्दर्य छन्दका परिधान पाकर चमक उठता है। तब वाक् ऋक्, छन्द, श्लोक अथवा कविताके नामसे पुकारी जाती है। कविता वाक्का निष्पन्द है। गीतोंमें एक समरसता (एक सतुलन) देख पड़ती है, जिससे उनका सौन्दर्य कविताके क्षेत्रमें बढ़ जाता है। साम- गानमें केवल स्वरोंका ही सामञ्जस्य नहीं लाना पड़ता, अपितु बाहरके नाद-सौन्दर्यका भीतरकी प्राण-शक्तिके साथ ऐक्य स्थापित करना पड़ता है। कविताके बाह्य और आभ्यन्तरिक गुणोंका गीतोंमें स्वभावतः समन्वय हो जाया करता है। गीत कविताके श्रृङ्गार हैं। उद्गीथ गीतोंका परिपाक है। यह गीत (साम) के आह्लादक स्वरूपका द्योतक है। आह्लादकतामें माधुर्य और माधुर्यमें रस है। रसका ही नाम आनन्द है। अतः वाक्के कला पक्षकी विश्रान्ति आनन्दमें ही होती है। उपर्युक्त बातें वाक्के भौतिक स्वरूपको सामने रखकर कही गयी हैं। उपनिषदोंमें वाक्की अधिदैवत व्याख्या भी मिलती है। 'वाक् ही यजका होता है, वही अग्नि है, वही मुक्ति है, वही अतिमुक्ति है' (बृहदारण्यक ३।१।३)। 'वह दैवी वाक् है, जिससे जो कहा जाय, हो जाता है' (बृहदा रण्यक उपनिषद् १।५।१८)। 'वाक् ब्रह्मका चतुर्थ पाद है' (छान्दोग्य-उपनिषद् ३।१८)। इससे कुछ और गहराईमे उतरकर उपनिषद्के ऋषियों- ने वाक्के उस स्वरूपके भी दर्शन किये हैं, जिसे हम रहस्यात्मक कह सकते हैं। यहाँ वाक् न तो एक साधारण बोलचालकी वस्तु है और न ज्ञानका असाधारण साधन है। वह साधारण असाधारण दोनोसे परे है। वह सूक्ष्म है। नित्य है। अनन्त है। सम्पूर्ण विश्वका विकास वाक्से हुआ है। [दायाँ स्तम्भ] बृहदारण्यक-उपनिषद्मे उल्लेख है कि वाक्के द्वारा सृष्टि की गयी। स तया वाचा तेनात्मना इदं सर्वमसृजत्। वाक्से सृष्टि हुई इसकी पोषक श्रुति भी है— वागेव विश्वा भुवनानि जज्ञे । आचार्य शङ्कर-जैसे दार्शनिक भी इस मतका अनुमोदन करते हैं। 'हम सभी इस बातको जानते हैं कि मनुष्य जो कुछ करता है, उसके वाचक शब्द उसके मनमे पहले आते हैं बादमे वह उस कामको करता है। इसी तरह सृष्टि रचनेके पूर्व प्रजापतिके मनमे भी वैदिक शब्दोंका आभार हुआ, पीछे उन शब्दोंके अनुरूप वस्तुओंकी उन्होंने रचना की'— (वेदान्तसूत्र १।३।२८ पर शाङ्करभाष्य) वाक्के रहस्यात्मक स्वरूपका निर्देशक प्रणव है। प्रणव वाक् का मूल तत्त्व है। वाक्का सम्पूर्ण वैभव प्रणवका विलास है। जो उद्गीथ है, वही प्रणव है। जो प्रणव है, वही ओम् है। 'यह ओ३म् अक्षर है। यह सब कुछ—भूत, भविष्य और वर्तमान—ओंकार ही है और जो इन तीन कालोंसे परे है वह भी ओम् ही है (माण्डूक्य-उपनिषद् १।१)। इतनी दूर आ जानेपर उपनिषद्के ऋषियोंको यह कहनेमे कोई उलझन न रही कि 'वाक् ही परम ब्रह्म है' ('वाग् वै सम्राट् परम ब्रह्म' बृहदारण्यक उपनिषद् ४।१।२)। वाक्का यह रहस्यात्मक रूप अवश्य ही दैनिक व्यवहार- के वाक्से दूरका जान पड़ेगा। परंतु विचार करनेपर ऐसा लगता है कि वाक्को जो यह उच्चतम आसन दिया गया है, वह साधार है। इस गतिशील संसारमें किसी भी पदार्थका सत्य जगत्के किसी दूसरे पदार्थद्वारा ठीक-ठीक जाना नहीं जा सकता, क्योकि वह मापक पदार्थ स्वयं गतिशील है। अन्तमें हमें वहाँतक जाना पड़ेगा, जहाँसे सभी गतिशील पदार्थोंको—जगत्को गति मिलती है। वह, जहाँसे सभी गति पाते हैं, अवश्य ही जगत्से तटस्थ होगा, साथ ही स्थिर भी होगा। पर गति देनेके कारण जगत्से उसका एक सम्बन्ध हो जाता है। और इस सम्बन्धके सहारे प्रत्येक गतिशील पदार्थ उस स्थिर विन्दुसे अपना नाता जोड़ सकता है। जगत्से तटस्थ होनेका अभिप्राय यह नहीं कि जगत्की कोई सीमा है और स्थिर-विन्दु उससे कहीं परे है। गतिशीलता ही जगत् है और उसमें जो तटस्थ है, वही स्थिर-विन्दु है। दूसरे शब्दोंमें प्रत्येक परिवर्तनशील पदार्थमें कुछ ऐसा है जो अपरिवर्तनशील है। यही अपरिवर्तनशीलता उसका स्थिर- विन्दु है। चाहे कोई इसे शक्ति, एनर्जी, चिति या ब्रह्म कहे, इससे उसके रूपमें कोई अन्तर नहीं आता । पर बात यहीं
- वैष्णव-उपनिषद् * १०९ समाप्त नहीं होती । हम यह भी देख सकते हैं कि उस परिवर्तनशील वस्तु और उस स्थिर-बिन्दुमें कोई तात्त्विक भेद नहीं है। केवल इतना ही है कि एक अपने शुद्ध रूपमें है और दूसरा विकृत रूपमें । यदि उसकी विकृतिको परिशुद्ध कर दिया जाय तो केवल एक ही शुद्ध रूप रह जाता है। अभी कलतक इस चिर-प्रतिपादित सिद्धान्तको केवल दार्शनिकोंकी कल्पना समझा जाता था। परन्तु आजका भौतिक- विज्ञान यह सिद्ध कर रहा है कि भौतिक पदार्थ (मैटर) को शक्ति (फोर्स) के रूपमें परिणत किया जा सकता है। 'अणु बंम' इस परिवर्तनका प्रत्यक्ष प्रमाण है । साथ ही यह भी ध्यान देनेकी बात है कि वह स्थिर-बिन्दु या यों कहिये कि वह शक्ति जो प्रत्येक पदार्थमें अपरिवर्तनीय और अविनाशी है, दो नहीं हो सकती । दो पदार्थोंकी शक्तियोंमें मात्राका (डिग्रीका) अन्तर हो सकता है, पर स्वभावका (नेचरका) भेद नहीं हो सकता । अस्तु, 'यह सब ब्रह्म है' के पीछे एक दृढ़ सिद्धान्त है और इसी दृष्टिसे वाक् भी ब्रह्म है। वाक् सूक्ष्म ब्रह्मसे भिन्न कोई दूसरी वस्तु हो ही नहीं सकता । स्थूल जगत् ब्रह्मका विवर्त है । स्थूल-जगत् वाक्का विकार है, क्योंकि रूप और नाम एकहीके दो पहलू हैं। उनमें कोई भेद नहीं। अतः वाक् और ब्रह्ममें भी कोई भेद नहीं। इस प्रकार हम देखते हैं कि उपनिषदोंमें जहाँ जीव और जगत्-सम्बन्धी अनेक गूढ़ तथ्योंका विवेचन है, वहाँ वाक्पर भी प्रकाश डाला ही गया है। अवश्य ही विचार-शैली भिन्न होनेके कारण और वाक्का मुख्य विषय न होनेके कारण किसी एक स्थानपर वाक्पर क्रम-बद्ध गवेषणा नहीं मिलती । फिर भी जहाँ-तहाँ जो विचार बिखरे पड़े हैं, उन्हींके सहारे हम देख रहे हैं कि उपनिषदोंमें वाक्के प्रायः प्रत्येक अङ्गपर दृष्टि डाली गयी है। लोक-जीवनमें वाक्का जितना महत्त्व उपनिषद्के ऋषियोंने दिखाया है, उससे अधिक कोई क्या कह सकता है। उनके लिये वाक् केवल जिह्वा-व्यापार न होकर अन्तरात्माकी पुकार है। वह दैवी है। आजका भौतिक-विज्ञान ध्वनि (साउंड) के अनेकानेक व्यापक रहस्योंका उद्घाटन- कर हमारे जीवनमे प्रतिदिन नया रूप-रङ्ग डाल रहा है। भाषाविज्ञान वाक्के नित्य-नवीन विश्लेषणमें निरत है। पर उपनिषदोंमे जो वाक्का स्वरूप है, उसकी महत्ता ज्यों-की-त्यों है। वाक्की उपासना होती आ रही है और होती रहेगी । 'विन्देय देवता वाचममृतामात्मन. कलाम्' । (भवभूति) हम आत्माकी कलारूप शाश्वत दैवी वाक्को पावें । वैष्णव-उपनिषद् (लेखक—प० श्रीबलदेवजी उपाध्याय, एम्० ए०, साहित्याचार्य) भारतीय धर्म तथा दर्शनके विकासका अनुशीलन हमें इसी सिद्धान्तपर पहुँचाता है कि उनके बीज उपनिषदोंमे संकेतरूपसे निहित हैं। वैष्णव-धर्मके मूलरूपके अध्ययनकी सामग्री इन उपादेय उपनिषदोंमें ही बिखरी हुई है, परंतु कतिपय उपनिषद् तो सर्वथा विष्णु तथा उनके विभिन्न अवतारोंके रहस्योंके प्रतिपादनमें ही व्यस्त दीख पड़ते हैं। इन्हीं-उपनिषदोंका संक्षिप्त परिचय कराना इस छोटे लेखका उद्देश्य है। वैष्णव-उपनिषद् संख्यामें चौदह हैं और इन सबका एक सम्पुटमें प्रकाशन थियासोफ़िकल सोसाइटीने अड्यार (मद्रास) से किया है। अक्षर-क्रमसे इनका सामान्य निर्देश इस प्रकार है— १. अव्यक्तोपनिषद्—इस उपनिषद्में सात खण्ड हैं। विषय है अव्यक्त पुरुषको व्यक्तरूपकी प्राप्ति । इसमें 'आनुष्टुभी-विद्या' के स्वरूप तथा फलका पर्याप्त निर्णय किया गया है। इसीके बलपर परमेष्ठीको नृसिंहका दर्शन होता है और वे जगत्की सृष्टिमें समर्थ तथा सफल होते हैं। २. कलिसन्तरणोपनिषद्—इस उपनिषद्में नारदजी- के प्रार्थना करनेपर हिरण्यगर्भने कलिके प्रपञ्चोंको पार करनेवाला उपाय बतलाया है। यह उपाय है भगवान्का षोडश नामवाला मन्त्र— हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे । हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥ इस मन्त्रका एक रहस्य है। जीव षोडश कलाओंसे आवृत रहता है। इसीलिये उसकी प्रत्येक कलाको दूर करनेके लिये सोलह नामवाला मन्त्र अतीव समर्थ बतलाया गया है। इति षोडशकं नाम्ना कलिकल्मषनाशनम् । नात परतर्रोपाय सर्ववेदेषु दृश्यते ॥ इति षोडशकलादृतस्य जीवस्यावरणविनाशनम् । ततः प्रकाशते पर ब्रह्म मेघापाये रविरश्मिमण्डलीवेति ॥ ३. कृष्णोपनिषद्—यह उपनिषद् बहुत ही छोटा है। इसमें श्रीकृष्णकी भगवत्ताका परम प्रामाणिक वर्णन किया गया है। भगवान् श्रीकृष्णने भक्तोंके ऊपर अनुग्रह करनेके
११० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
लिये ही समग्र वैकुण्ठको ही अपने साथ इस भूतलपर अवतीर्ण किया था; इसका रोचक वर्णन यहाँ उपलब्ध होता है। श्रीकृष्णके जीवनके आध्यात्मिक रूप जाननेके लिये इस उपनिषद्की महती उपयोगिता है। श्रीकृष्ण तो स्वयं शाश्वत ब्रह्म ही हैं और उनकी सेविका गोपिकाएँ तथा सोलह हजार एक सौ आठ रानियाँ उपनिषद्की ऋचाएँ ही हैं— अष्टादशसहस्रे द्वे शताधिक्य स्त्रियस्तथा । ऋचोपनिषदस्ता वै ब्रह्मरूपा ऋचः स्त्रियः ॥ ४. गरुडोपनिषद्—इस स्वल्पकाय उपनिषद्में गारुडी विद्याके रहस्यका उद्घाटन है । गरुडके स्वरूपका आध्यात्मिक रीतिसे विवेचन इस ग्रन्थकी विशिष्टता है । ५. गोपालतापिनो-उपनिषद्—इस ग्रन्थके दो भाग हैं—(क) पूर्व, (ख) उत्तर । पूर्वतापिनोके छः अध्याय हैं जिनमें गोपाल कृष्णके अष्टादश अक्षरवाले मन्त्रके रूप, फल तथा जपविधानका पूर्णतया विस्तृत वर्णन है । उत्तर- तापिनोमें अनेक आध्यात्मिक रहस्योंका वर्णन है। मथुराके आध्यात्मिक रूपका निर्णय बड़ा ही मार्मिक है। इस उपनिषद्में गोविन्दकी बड़ी ही सुन्दर स्तुति उपलब्ध होती है— नमो विज्ञानरूपाय परमानन्दरूपिणे । कृष्णाय गोपीनाथाय गोविन्दाय नमो नम ॥ श्रीकृष्ण रुक्मिणीकान्त गोपीजनमनोहर । संसारसागरे मग्नं मामुद्धर जगद्गुरो ॥ ६. तारसारोपनिषद्—इसमें तारक मन्त्रके स्वरूपका निर्णय किया गया है। भगवान् नारायणके अष्टाक्षर मन्त्रका विस्तारके साथ उपदेश कथन है। ७. त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद्—यह उपनिषद् वैष्णव उपनिषदोंमें सबसे बड़ा है। महत्त्व तथा विस्तार दोनोंकी दृष्टिमें इस उपनिषद्को गौरव प्राप्त है। इसमें आठ अध्याय हैं । प्रथम अध्यायमें परमेष्ठीने भगवान् नारायणसे ब्रह्मस्वरूपकी जिज्ञासा की और इसी जिज्ञासाकी पूर्तिके लिये इस उपनिषद्का उपदेश है। ब्रह्मके चार पाद बतलाये गये हैं—(क) अविद्यापाद, (ख) विद्यापाद, (ग) आनन्दपाद और (घ) तुर्यपाद । प्रथम पादमें अविद्याका संसर्ग रहता है। अन्तिम पाद इससे नितान्त विशुद्ध रहते हैं। विद्यापाद तथा आनन्दपादमें अमित तेजः- प्रवाहके रूपमें नित्य वैकुण्ठ विराजता है और यहीं तुरीय
ब्रह्म अपने समग्र तेज तथा वैभवके साथ स्थित रहते हैं। अन्य अध्यायोंमें साकार तथा निराकार शब्दोंकी व्याख्या है। ब्रह्म स्वतः अपरिच्छिन्न है। अतः वह साकार होते हुए भी निराकार रहता है और इन दोनोंसे भी परे वर्त्तमान रहता है। महामायाका ही यह जगत् विलास है और अन्तमें यह जगत् महाविष्णुमें लीन हो जाता है। पञ्चम अध्यायमें मोक्षके उपायका कथन है। मुक्ति तत्त्वज्ञानके लाभसे ही होती है और उस ज्ञानका परिपाक भक्ति तथा वैराग्यके कारण सम्पन्न होता है। षष्ठ अध्यायमें ब्रह्माण्डके स्वरूपका परिचय कराया गया है तथा विष्णुके विभिन्न रूपोंकी उपासनासे भिन्न भिन्न लोकोंकी प्राप्तिका निर्देश किया गया है। सप्तम अध्यायमें नारायणके यन्त्रका वर्णन है। अन्तिम अध्यायमें आदि नारायण ही गुरुरूपसे निर्दिष्ट किये गये हैं जिनकी एकमात्र निष्ठा करनेसे ही प्रपञ्चका उपशम होता है। इस उपनिषद्के मूल सिद्धान्त पुरुषसूक्तमे उल्लिखित हैं । रामानुजदर्शन तथा अन्य वैष्णवदर्शनोंपर इस उपनिषद्का प्रचुर प्रभाव पड़ा है। रामानुजके अनुसार अचित् तत्त्वके तीन प्रकारोंमें प्रथम भेद है—शुद्धसत्त्व और यही शुद्धसत्त्व त्रिपाद्विभूति, परमपद, परमव्योम, अयोध्या आदि शब्दोंके द्वारा व्यवहृत होता है। (द्रष्टव्य मेरा भारतीय दर्शन पृ० ४७२–४७३) ८. दत्तात्रेयोपनिषद्—इसमें दत्तात्रेयकी उपासनाका वर्णन है तथा तत्सम्बद्ध नाना मन्त्रोंके वर्णन तथा विधान- का कथन है। दत्तात्रेयके मन्त्रके बीजकी भी विशिष्ट व्याख्या है। उपनिषद् छोटा ही है। ९. नारायणोपनिषद्—यह उपनिषद् परिमाणमें बहुत छोटा है। इसमें चार खण्ड हैं जिनमें नारायणके अष्टाक्षर मन्त्रका उद्धार तथा माहात्म्य प्रतिपादित किया गया है। १०. नृसिंहतापिनो-उपनिषद्—इस उपनिषद्के दो खण्ड हैं—पूर्व और उत्तर। इसमें नृसिंहके रूप तथा मन्त्रका विस्तृत वर्णन है। नृसिंहकी तान्त्रिकी पूजाका रहस्य इसमें विस्तारसे उद्घाटित किया है। इस प्रकार तान्त्रिक उपनिषदोंमें यह उपनिषद् महत्त्वपूर्ण तथा महनीय है। इसके ऊपर शङ्कराचार्यकी भी टीका मिलती है, जिसे अनेक आलोचक आद्य शङ्कराचार्यकी रचना माननेमें संकोच करते हैं। नृसिंह- के महाचक्रका वर्णन पूर्वतापिनोके पञ्चम उपनिषद्में विस्तारके साथ किया गया है। उत्तरतापिनोमें नव खण्ड हैं, जिनमें
- ब्रह्मका स्मरण करो और आसक्तिका त्याग करो * १११ निर्विशेष ब्रह्मके स्वरूपका प्रामाणिक विवेचन है। अष्टम खण्ड तुर्य ब्रह्मकी महनीयता तथा व्यापकताके वर्णनमे समाप्त हुआ है। नवम खण्डमें जीव तथा मायाके साथ ब्रह्मके सम्बन्धका प्रतिपादन है। इस प्रकार यह ग्रन्थ अद्वैततत्त्वके सिद्धान्तोंकी जानकारीके लिये नितान्त प्रौढ तथा उपादेय है। ११. रामतापिनो-उपनिषद्—इसके भी दो खण्ड है जिनमें रामकी तान्त्रिक उपासनाका विस्तृत विवेचन उपलब्ध होता है। राम तथा सीताके मन्त्र तथा मन्त्रके क्रमशः उद्धार तथा लेखनप्रकारका वर्णन है। रामका षडक्षर मन्त्र यन्त्रमें किस प्रकार निविष्ट किया जा सकता है तथा उसका पूजन किस विधिसे किया जाता है, इसी विषयका यहाँ प्रामाणिक प्रतिपादन है। योगीलोग जिस परमात्मामें रमण करते हैं वही 'राम' शब्दके द्वारा अभिहित किया जाता है— रमन्ते योगिनोऽनन्ते नित्यानन्दे चिदात्मनि । इति रामपदेनासौ परं ब्रह्माभिधीयते ॥ राम-मन्त्रका बीज है—रा और इसीके भीतर देवत्रय तथा उनकी शक्तियोंका समुच्चय विद्यमान रहता है। रेफसे ब्रह्माका, तदनन्तर आकारसे विष्णुका तथा मकारसे शिवका तात्पर्य माना जाता है और इस प्रकार इन तीनों देवताओंकी शक्तियाँ—सरस्वती, लक्ष्मी तथा गौरी इस बीजमे विद्यमान रहती हैं— तथैव रामबीजस्थं जगदेतच्चराचरम् । रेफारूढा मूर्तय स्यु. शक्तयस्तिस्र एव च ॥ तदनन्तर राममन्त्रके उद्धारका विस्तृत विवरण उपलब्ध होता है। उत्तरतापिनीमें राम-मन्त्रके तारकत्व तथा जपके फलका निर्देश है। प्रणवका अर्थ 'राम'में बड़ी युक्तिसे सिद्ध किया गया है। रामके साक्षात्कार करा देनेवाले मन्त्रोंका भी यहाँ निर्देश मिलता है। राम-मन्त्रके माहात्म्यकां प्रतिपादन कर यह उपनिषद् समाप्त होता है। 'उपनिषद् ब्रह्मयोगी'की व्याख्याके अतिरिक्त 'आनन्दवन' नामक ग्रन्थकारने भी बड़ी सुबोध टीका इस ग्रन्थपर लिखी है। यह टीका मूल ग्रन्थके साथ सरस्वती-भवन ग्रन्थमाला (न० २४) में काशीसे १९२७ ई० मे प्रकाशित हुई है। १२. रामरहस्य-उपनिषद्—इस उपनिषद्का विषय है रामकी पूजाका प्रतिपादन तथा तदुपयोगी मन्त्रों तथा विधानोंका विवेचन । राम-मन्त्र एक अक्षरसे आरम्भ होकर इकर्तीस अक्षरोंतकका होता है। इसका पर्याप्त वर्णन यहाँ मिलता है। इसके अतिरिक्त सीता, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न तथा हनुमान्के मन्त्रोंका भी वर्णन है। राम-मन्त्रके पुरश्चरण- का भी विधान यहाँ किया गया है। १३ वासुदेवोपनिषद्—इसमें वासुदेवकी महिमा बतलाकर गोपीचन्दनके धारण करनेका विशिष्ट वर्णन है। वैष्णवजनोंके मस्तकपर विराजमान त्रिपुण्ड्र, ब्रह्मादि देवतात्रय, तीन व्याहृति, तीन छन्द, तीन अग्नि, तीन काल, तीन अवस्था, प्रणवके तीनों अक्षरोंका प्रतीक बतलाया गया है। वासुदेव जगत्के आत्मस्वरूप हैं। उनका ध्यान प्रत्येक भक्तको करना चाहिये । १४. हयग्रीवोपनिषद्—हयग्रीव भगवान्के नाना मन्त्रोंके उद्धारका प्रकार इस छोटे उपनिषद्में विशेषरूपसे किया गया है। वैष्णव-उपनिषदोंका यही संक्षिप्त वर्णन है। इसके अनुशीलनसे स्पष्ट प्रतीत होता है कि वैष्णवमतके नाना सम्प्रदायोमे जो उपासना-विधि इस समय प्रचलित है, उसका मूलरूप हमें यहाँ उपलब्ध होता है। इन्हीं उपनिषदोंके आधारपर ही पिछले मतोंका विकास सम्पन्न हुआ है। अतः वैष्णवमतके रहस्योंको भलीभाँति जाननेके लिये इन ग्रन्थ- रत्नोंका अनुशीलन नितान्त आवश्यक है। ब्रह्मका स्मरण करो और आसक्तिका त्याग करो अहो नु चित्रं यत्सत्य ब्रह्म तद् विस्मृतं नृणाम् । तिष्ठतस्त्व कार्येषु मास्तु रागानुरञ्जना ॥ अहो ! यह बड़े आश्चर्यकी बात है कि जो परब्रह्म परमात्मा नितान्त सत्य हैं, उन्हींको मनुष्योंने भुला दिया है। भले ही कर्मोंमें लगे रहनेपर भी तुम्हारे मनमें रागानुरञ्जना—उन कर्मोंमें आसक्ति नहीं होनी चाहिये।
औपनिषद आत्मतत्त्व
(लेखक—याज्ञिक पं० श्रीवेणीरामजी शर्मा गौड़, वेदाचार्य, वेदरत्न)
[स्तम्भ १]
(१) वाङ्मय, मानवकी विशेषताओंका (आदर्श) पुञ्ज है। आहार-विहारपर्यन्त ही अपनी चर्चाको सीमित न करते हुए, भावीकी ओर अग्रसर रहना, उसके लिये सतत प्रयत्न करना, मानव-जीवनकी एक विशेषता है। यह उसकी जन्म- जात कला है। वाङ्मयमें इसी कलाका सङ्कलन रहता है। जिसका आकलन कर अन्य मानव अपने लिये गतिपथ पाते हैं। वह कला साहित्यिक हो, आलंकारिक हो, भौतिक हो अथवा आध्यात्मिक हो, मानवके जीवन-विकासमे पर्यायेण आवश्यक है। प्रत्येक कलाका अपना वाङ्मय अपने विषयमें अवश्य सराहनीय है, तथापि अध्यात्मविवेक-कलापूर्ण वाङ्मय- का स्थान सर्वोच्च है। क्योंकि प्रत्येक वस्तु जो कि विश्वकी रङ्गभूमिपर प्रस्तुत हुई हो अथवा होनेवाली हो, दीप-ज्योतिके समान इस अध्यात्मसे ही, आत्मसत्त्व किंवा आत्मप्रकाश प्राप्त करती है। यह बात स्पष्ट ही है कि जगत्का कोई भी व्यवहार 'मै' इस आत्मतत्त्वके बिना नहीं चल सकता। जगत्के किसी भी देश एव कालका उच्चकोटिका दार्शनिक हो, चाहे 'आत्मानं सतत रक्षेत्' कहनेवाला कोई महास्वार्थी व्यवहारी पुरुष हो, दोनों आत्मसापेक्ष है। इसीलिये अध्यात्म-वाङ्मय किसी भी देश-कालका हो, प्रशसनीय है, सबके लिये आदरणीय है, सग्राह्य है, जेय है। उपनिषद्- वाङ्मय यह एक ऐसा अद्भुत वाङ्मय है जो अध्यात्मका प्रकाश देनेवाला है। इस दिशामें विश्वकी यह अद्वितीय वस्तु है। इस बातको सभी विद्वान् मानते हैं। बस, हम यहाँ उपनिषद्के उसी अध्यात्म-तत्त्वका दिग्दर्शन उपस्थित करना चाहते हैं।
(२) उपनिषदोंका क्या विषय है या होना चाहिये, इसमें कोई विवाद नहीं, क्योंकि इस बातको सभी जानते है तथा मानते हैं कि उपनिषद्का मुख्य विषय 'ब्रह्म' है। और मुख्य प्रयोजन 'ब्रह्मज्ञान' है, जिससे कि ब्रह्म-प्राप्तिरूप मोक्ष मिलता है। उपनिषद् शब्द—उप-उपसर्गपूर्वक तथा नि उपसर्गपूर्वक 'षद्ल विशरणगत्यवसादनेषु' धातुसे निष्पन्न है, यही अर्थ बतलाता है। नि शेषतया आत्मतत्त्वके समीप पहुँचा देनेवाली विद्या, इस अर्थमें उपनिषद् शब्द यथार्थ है।
विवाद यदि है तो केवल इस विषयमें ही कि—वह
[स्तम्भ २]
ब्रह्म क्या है, ब्रह्म शब्दका अर्थ क्या लिया जाय अथवा उसका लक्षण क्या किया जाय ? इसका कारण यह है कि— 'ब्रह्म' शब्द जिस प्रकार उलझी हुई वर्णमालासे बना है, उसी प्रकार वह अर्थके सम्बन्धमें भी गुथा हुआ है।
'ब्रह्म' शब्द निम्नलिखित अर्थोंमे व्यवहृत है— परमात्मा, जीव, जगत्कारण, जड-प्रकृति, परमाणु, शब्द और विद्या।
'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' 'जन्माद्यस्य यतः' 'तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः'— यहाँ 'ब्रह्म' शब्द परमेश्वरवाचक है। मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम्। (गीता १४। ३) यहाँपर जड प्रकृति तथा परमाणु अर्थमें 'ब्रह्म' शब्द मतभेदसे माना जाता है। 'ब्रह्म एवेदमग्र आसीत्' यहाँपर जगत्कारण ( उपादान ) ब्रह्म शब्दार्थ है।
'सर्वेषामेव दानानां ब्रह्मदान विशिष्यते।' यहाँ विद्या, शब्द (वेद) आदि अर्थ है। उपनिषदोंमें 'जगत्कारण' इस अर्थमें ब्रह्म शब्द लेना उचित है (वह वाक्य शेष आदि प्रमाणसे सङ्गत है)।
इसपर भी शङ्का अवश्य है कि 'जगत्-कारण जड प्रकृत्यादि लिये जायँ अथवा चेतन आत्मा ?' इसका समाधान भी अति सरल है। उसी ब्रह्मके बारेमें वहीं मिलता है— 'तदैक्षत बहु स्या प्रजायेय' अर्थात् उस ब्रह्मने इच्छा की कि 'मै सृष्टि करूँ' इस प्रकारकी इच्छा किंवा मनन जड- प्रकृतिमें सम्भव नहीं है, अतः 'ब्रह्म' शब्दसे चेतन आत्मा लेना ही उचित है। 'अयमात्मा ब्रह्म' इन समानाधिकरण शब्दोंका भी यही स्वारस्य है।
यही चेतन आत्मा स्वयप्रकाश है। इसे ही ब्रह्म, औपनिषद पुरुष किंवा उपनिषत्प्रतिपाद्य आत्मतत्त्व कहते हैं। इस उपनिषत्प्रतिपाद्य आत्मतत्त्वके स्वरूपके विषयमें उपनिषदों- के आधारपर ही वादियोंके अनेक मत हैं। उनपर सप्रमाण समालोचना करते हुए हम कुछ लिखना उचित समझते हैं, जिससे उपनिषत्प्रतिपाद्य आत्मतत्त्वका वास्तविक स्वरूप स्फुट हो सके।
❊ औपनिषद आत्मतत्त्व ❊ ११३ ( ३ ) औपनिषद आत्मतत्त्वसम्बन्धी निम्न प्रकारकी विप्रतिपत्तियाँ उपस्थित की जा सकती हैं— १—औपनिषद आत्मतत्त्व शरीरादि (भौतिक तत्त्व) से विलक्षण है या नहीं ? २- ,, विभु किंवा अणु ? ३- ,, परिणामी सावयव किं वा नहीं ? ४- ,, ज्ञानादिका आश्रय किं वा तत्स्वरूप ? ५- ,, जगत्का उपादानकारण किंवा निमित्त ? ६- ,, अद्वितीय ही कारण, किं वा अनेक अन्य भी ? ७- ,, का जीवसे भेद किं वा अभेद ? १. आत्मतत्त्व शरीरादिसे विलक्षण पूर्वपक्ष— ‘कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतः समाः ।' ( ईश० २ ) कर्म करते हुए ही सैकड़ो वर्ष जीवनेच्छाका आदेश देते हुए यह श्रुति बतलाती है कि 'जीवन ही सब कुछ है और मरनेके बाद कुछ नहीं है।' इसलिये इस प्रकारके कर्म करो जिससे तुम्हारा जीवन, जो कि पृथिव्यादि जड़तत्त्वोंके समुदाय- में 'किण्वादिभ्यो मदशक्तिवत्' है, बहुत समयतक रहे। यदि शरीरादिसे विलक्षण आत्मा हो और मरनेपर भी वह विद्यमान हो, तो फिर सैकड़ों वर्ष जीवित रहनेकी इच्छाका क्या महत्त्व ? जब कि वृद्धावस्था भी सन्निकट ही रहती है। शरीरमें कष्ट होनेपर उसके रक्षणका भी क्यों उपाय करें, यदि आत्माका कुछ बिगड़ता न हो। 'यदेतद्रेतस्तदेतत्सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यः तेजः समुद्भूतम्, स्त्रिया सिञ्चति सास्यैतमात्मानम् अत्रगतं भावयति।' ( ऐतरेय० ) 'वीर्यस्वरूप आत्मा स्त्रीमें सिञ्चित होता है और स्त्री उसे ( पतिकी ) आत्मा मानकर पालती है।' • 'सस्यमिव मर्त्यं पच्यते' ( कठोपनिषद् ) 'अथ चैनं नित्यजातम्' ( गीता २ । २६ ) 'जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म' ( गीता २ । २७ ) उपर्युक्त वचनोंसे भी यही ज्ञात होता है कि आत्मा भौतिक तत्त्व है, शरीरादिसे विलक्षण नहीं है। उत्तरपक्ष—'कुर्वन्नेवेह' इस श्रुतिका पूर्वोक्त तात्पर्य नहीं है। आत्मतत्त्वको समझकर पुत्रैषणादिको छोड़कर ससार उ० अ० १५— से परे जो निरतिशय सुख प्राप्त नहीं कर सकता, वह अनात्मज्ञ पुरुष यज्ञादि शुभ कर्म करते हुए ही अपना आयुष्य पूर्ण करे। यही तात्पर्य है । रेत:सिञ्चनको प्रथम जन्म एव उत्पत्तिको द्वितीय जन्म जो कहा है, वह आत्माके प्राकट्यके अवच्छेदक शरीरके सम्बन्धमें है, आत्मामें औपचारिक कथन है। इसी शरीरात्माका निराकरण यमराजने नचिकेताके प्रश्नोत्तरमे किया है— ‘येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीतिचैके।' ( कठोपनिषद् १ । १ । २० ) 'मनुष्य मरनेके बाद रहता है या नहीं ?' इस प्रश्नका उत्तर यमराजने यही दिया कि— तत्ते पदँ संग्रहण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥' न जायते म्रियते वा विपश्चि- न्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् । अजो नित्य शाश्वतोऽय पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ ( कठोपनिषद् १ । २ । १५, १८ ) यहाँ यही आत्माका लक्षण बतलाते हुए सिद्ध कर दिया कि शरीरादि भौतिक तत्त्व सब विनाशी हैं । वे आत्मा नहीं है, क्योकि आत्मा अजर-अमर है । अर्थात् वह 'जायते' आदि षड्भावोसे रहित है । इन्द्रियेभ्य परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च पर मन । मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान् परः ॥ ( कठोपनिषद् १ । ३ । १० ) वह आत्मा इन्द्रिय, पृथिव्यादि विषय, अन्त:करणादि सबसे भिन्न है । शरीरसे सुतरा विलक्षण है । २. औ० आत्मतत्त्व विभु पूर्वपक्ष—शरीरादि विलक्षण आत्मा अणु है, ऐसा सम्प्रदायाचार्यादि मानते हैं । उनका आशय है कि— ‘अणोरणीयान्' ( कठोपनिषद् १ । २ । २० ) यह आत्माका स्वरूप है । अङ्गुष्ठमात्र पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनाना हृदये सन्निविष्ट । ( कठोपनिषद् २ । ३ । १७ ) एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा तमात्मस्थम् ॥ ( कठोपनिषद् २ । २ । १२ ) इन श्रुतियोंसे आत्माका परिमाण अङ्गुष्ठमात्र ही मालूम होता है ।
११४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
'बालाग्रशतभागस्य' (श्वेताश्वतर० ५ । ९) इस मन्त्रमे आत्माका अणु परिमाण स्पष्ट ही बतलाया है, एव अणु परिमाण आत्माका तत्तल्लोकगमन भी सम्भव है । अतः आत्मा-का परिमाण अणु है—
उत्तरपक्ष—'अणोरणीयान्' इस मन्त्रवर्णमे जो 'अणुमे भी अणु ऐसा आत्माका स्वरूप कहा है, यह उसकी स्तुतिमात्र है, परिमाण निर्णय नहीं ।
अणिमा महिमा चैव गरिमा लघिमा तथा । प्राप्ति प्राकाम्यमीशित्व वशित्व चाष्टसिद्धय ॥
ये अष्टसिद्धियाँ आत्मामे बतलायी गयी है । इसीलिये आगे 'महतो महीयान्' (बड़े से-बड़ा) यह वाक्य-शेष भी सगत होगा, अन्यथा परस्पर व्याघात उपस्थित होगा । जो अणु है वह महान् कैसे ? यदि माना जाय तो परिमाणभेदसे आत्मामे भी भेद माना जायगा, जिससे कि आत्माको अनित्य मानना अनिवार्य हो जायगा । अस्तु, अङ्गुष्ठादिमात्रस्वरूपका जो कथन है वह लिङ्ग शरीरादिके तात्पर्यसे है । आत्मामे औपचारिक है । इस प्रकार विपक्षका बाधन करके स्वपक्ष-(विभुत्व) माधवार्य श्रुतियोंको प्रमाणरूपेण देते है—
'एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा' (कठोपनिषद् १ । ३ । १२)
यहाँ बतलाया गया है कि प्रच्छन्नतया सर्वभूतोमे आत्मा स्थित है । यह बात विना आत्माके विभु माने नहीं घटित हो सकती है । इसलिये आत्मा विभु है ।
ईशा वास्यमिद५ सर्वं यत्किञ्च जगत्या जगत् । (ईशोपनिषद १)
साग जगत् परमेश्वरेण (ईशा) व्याप्त है—आच्छादित है (वास्यम्) ।
'एतस्मादात्मन आकाश सम्भूत ।'
आत्मासे विभु आकाश प्रकट हुआ । अणु आत्मासे विभु आकाशका होना सम्भव नहीं है ।
'अयमात्मा ब्रह्म' 'एकमेवाद्वितीयम्'
ब्रह्म शब्दका ही अर्थ व्यापक है । ब्रह्मपदाभिधेय आत्मा अणु कैसा ? अद्वितीयता तथा एकताके विना विभुताका सम्भव नहीं है ।
'तमाहुरग्र्य पुरुष महान्तम्' (श्वेताश्वतरोपनिषद्)
उस पुरुषको अनादि और महान् कहा है ।
'अस्थूलमनण्वह्रस्वम्' (बृहदारण्यक०)
यहाँ अणुताका शब्दशः प्रतिषेध भी मिलता है । अत औपनिषद आत्मा अणु नहीं, प्रत्युत विभु है, सर्वान्तर्यामी है ।
३. आत्मा परिणामी तथा सावयव नही
पूर्वपक्ष—कायाकार परिणामी आत्मा है । यह सावयव होनेपर भी कथञ्चित् नित्य ही है । उनका कहना है कि जिस पदार्थके गुण जहाँ उपलब्ध हो, उस परिधिमे ही वह पदार्थ मानना उचित है । आत्माके ज्ञानादि गुणोकी उपलब्धि यदि शरीरावच्छेदेन ही है तो शरीरव्यापी ही आत्मा मानना चाहिये । न अणु और न विभु । अवयवोमे सकोच-विकास होता है, अत. चींटीकी आत्मा हस्ति शरीरमे व्याप्त हो सकती है और हस्तीकी आत्मा चींटीमे भी । ये उपनिषद्को प्रमाण न माननेवाले कुतार्किकोंमेंसे हे । (जैन)
उत्तरपक्ष—यह सिद्धान्त युक्त्या और श्रुत्या दोनोके विरुद्ध है । सकोच विकास ये परिमाणभेद एक वस्तुमे सम्भव नहीं । यदि माना जाय तो आत्माको उत्पाद विनाशशाली मानना पडेगा । जिसमे कृतहानि और अकृताभ्यागमरूप दोष आ सकेंगे ।
अवस्थान्तरापत्तिको परिणाम कहते ह । नित्य आत्माका अवस्थान्तर प्राप्त करना भी सगत नहीं है । उपनिषदोमे कूटस्थता बतायी है ।
'ध्रुव तत्' (कठोपनिषद) 'न जायते म्रियते वा०' (कठोपनिषद् १ । २ । १८) 'अविकार्योऽयमुच्यते' (गीता २ । २५)
इस प्रकार औपनिषद आत्मतत्त्व आत्मा परिणामी किंवा सावयव भी नहीं है, यही ठीक है ।
४. आत्मा ज्ञानस्वरूप, ज्ञानाश्रय नहीं
पूर्वपक्ष—न्यायादि दर्शनोंमें आत्माका यही मुख्य लक्षण माना गया है कि आत्मा वही है जो ज्ञानाधार है । आत्मा स्वतन्त्र द्रव्य है, उसमे समवायसे ज्ञान, सुख, दुःख, इच्छा आदि चतुर्दश गुण उत्पन्न होते है और कार्यकारणभावके पौर्वापर्य नियमके (Theory of Causation) अनुसार युक्ति भी सङ्गत है । प्रमाण, प्रमिति, प्रमेय, प्रमाता—इनमे भेद आवश्यक है । इसी प्रकार यदि ज्ञान ही आत्मा है तो घटविषयक ज्ञान आत्मा है या पटूविषयक ? यह प्रश्न निरुत्तर रहेगा ।
'य सर्वज्ञ सर्ववित्' इस श्रुतिमे 'सर्वज्ञ शब्दका यही अर्थ है कि 'सर्वपदार्थविषयक ज्ञानवान्' । यहाँ आधारका
ः औपनिषद आत्मतत्त्व ः ११५
वाव अनिवार्य है। इसी प्रकार 'असुखम्' इस श्रुतिका भी 'आत्मा सुखभिन्न है' यह अर्थ मानना चाहिये । उत्तरपक्ष—आत्मा ज्ञानस्वरूप ही है। ज्ञानभिन्न सभी पदार्थ जड़ होते हैं और आत्माको जड़ मानना महामूर्खताका लक्षण है। उपनिषदोंमें कहा है— 'अत्रायं पुरुष स्वयं ज्योति.' (बृहदारण्यकोपनिषद्) 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तैत्तिरीयोपनिषद्) 'अयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभू.' (बृहदारण्यकोपनिषद्) 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' (" ") इन वाक्योंमें आत्माको ज्ञानस्वरूप कहा है। 'विज्ञानम्' इस वाक्यमें विशेषेण ज्ञान जिसका है, इत्यादि रीतिसे व्याख्यान स्वरशास्त्रके विपरीत होनेके कारण नहीं माना जा सकता। इसलिये औपनिषद आत्मा ज्ञानस्वरूप है यह मानना उचित है। घटविषयक विज्ञान आत्मा है किंवा पटविषयक ? इस प्रश्नका यही उत्तर है कि—'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तैत्तिरीय०) यहाँपर सभी पद लक्षणवृत्तिसे स्वार्थतर- व्यावृत्त वस्तुस्वरूपके बोधक हैं । ज्ञान शब्द जानेतरव्यावृत्त ब्रह्मका बोधक है । अर्थात् ब्रह्म अज्ञानरूप नहीं है अथवा सर्वविषयक ज्ञानको आत्मा कहा जाय तो कोई आपत्ति नहीं है, क्योंकि प्रत्येक सर्वज्ञ इसलिये नहीं हो सकेगा कि वह उपाधिपरिच्छिन्न है । एव ज्ञानके साधन जो कि अन्तःकरणवृत्त्यादिक हैं, वे सन्निहित नहीं होते, जिस विषयके लिये सामग्री होती है उस विषयमें ज्ञान अवश्य ही होता है। ५. आत्मा उपादान-कारण और निमित्त-कारण पूर्वपक्ष—'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तद् ब्रह्म ।' —इत्यादि श्रुतियोंसे जगत्का कारण 'ब्रह्मात्मतत्त्व' है, यह अवगत हुआ। यहाँ यह शङ्का हो सकती है कि घटकी मृत्तिकाके समान उपादान-कारण है कि वा घटके प्रति कुलालके समान निमित्तकारण है ? उचित यही होगा कि उसे 'निमित्त-कारण' माना जाय । क्योंकि उस ब्रह्मके विषय- में उपनिषद्में कहा गया है कि—'स ऐक्षत ईक्षाञ्चक्रे' (प्रश्नोपनिषद्) (सृष्टिकी उसने इच्छा की) । इच्छा तथा मननपूर्वक कार्य करना यह निमित्त कारणका ही लक्षण है। आदान कारणके गुणधर्मोंकि कार्यमें अनुवृत्ति पायी जाती है। यदि चेतन आत्माको जगतका उपादान कहा जाय तो जगतम कुछ भी जड़ न होकर सब चेतनस्वरूप ही होना चाहिये ।
उत्तरपक्ष—यह ठीक है कि ईक्षण करनेवाला ब्रह्म जगत- का कारण है, किंतु उपादान भी मानना चाहिये । जो गुणधर्मके अनुवर्तनका प्रश्न है वह विवर्त माननेसे समाहित हो सकता है। जगत् अविद्याका परिणाम है और ब्रह्मात्मतत्त्वका विवर्त्त है। किसी निश्चयात्मक वस्तुका यदि अन्य रूपसे भान होने लगे तो उसे 'विवर्त्त' कहते हैं। जिस प्रकार रज्जुका सर्पाकार भान होता है। उपादानके जानसे कार्यका भी ज्ञान सरल होता है, यह विषय आत्माके सम्बन्धमे भी उपपन्न है। उपनिषद्में प्रश्न किया गया है कि— 'कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति ।' 'किसके जानसे यह सब जाना जा सकता है।' इस प्रश्नका उत्तर यही है कि— आत्मनि खल्वरे दृष्टे श्रुते मते विज्ञाते इद५ सर्वं विदितं भवतीति । आत्मतत्त्वके श्रवण-मननादिसे यह सर्व जगत् ज्ञात हो सकता है। यह भान बिना आत्मानुवृत्ति (आत्माव्यतिरिक्ता) के नहीं हो सकता, और अव्यतिरिक्तिा आत्माको उपादान माने बिना नहीं आ सकती। अतः आत्माको उपादान मानना भी आवश्यक है। ६. औपनिषद् आत्मा ही केवल जगत्कारण जो भी यह कार्यजाल दिखायी दे रहा है इस सबका कारण वह एक आत्मा ही है और कोई अन्य उसे अपेक्षित नहीं है। ऐतरेयोपनिषद्मे कहा गया है कि— ॐ आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत, नान्यत्किञ्चन मिषत् । स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति । (१।१।१) 'यह सारा जगत् पूर्वम आत्मा ही था, अन्य कोई और तत्त्व नहीं था, उस आत्माने अपनी इच्छासे लोकका सर्जन किया ।' इससे यह सिद्ध है कि सृष्टिके मूलम एक ब्रह्म तत्त्व ही रहा है। सर्व जगत् उसका विवर्त्त है, इसलिये उससे विरूप है। तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ (कठोपनिषद) यह एक कारणवाद युक्तिसङ्गत भी है, दर्शनशास्त्रका उद्देश्य मूलतत्त्वका परिचय कराना ही है, क्योंकि मानव-
११६ ४ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि वह अनेकोंमे एकता देखना चाहता है। अनेक वस्तुओंका भी किसी रूपसे एकीकरण चाहता है। उदाहरणके रूपमे देखिये- राम, शिव, यज्ञदत्त, देवदत्त नामके व्यक्ति जब हमारे सम्मुख आते हैं तो हमारे अन्तस्तलमे प्रश्न उपस्थित होता है कि 'ये भिन्न ही हैं कि या किसी रूपसे एक भी हैं ?' उत्तर मिलेगा-'ये सब पुरुष ह।' इसी प्रकार सीता, सावित्री, गोमती, रम्भा आदिमें भी शङ्का होगी। फलतः स्त्रीरूपमे उन्हें एक मान सकते हैं। इन स्त्री पुरुषसमुदायम भी मनुष्यत्वेन एकता मिलती है। यह मनुष्यसमूह, दूसरी ओर पशुसमूह, अन्य पक्षिसमूह और कुक्कुरसमूह-इनमे यदि भेद-शङ्का हो तो उसका समाधान है-'ये सब सजीव हं', अर्थात् प्राणित्वेन ( आत्मत्वेन ) सबको एक कहेंगे। इस ओर आत्मा है, कुछ जड़ पदार्थ भी हैं, इनमें भेदाभेद विचारमे ही समस्त दार्शनिकोंका मस्तिष्क स्फोट है। कोई भी इनका एकीकरण नहीं कर पाते तथा जडोंके लिये एक प्रकृति-तत्त्व पृथक् भी मानते हैं, किंतु उपनिषद्की विचारधारामें-इसमे सन्तोष करना उचित नही माना गया तथा जड और आत्मा-इनमे भी एकताका अनुभव चाहा और सकल जडकोभी 'आत्मैवेदमग्र आसीत्' कहकर आत्मामें समाविष्ट किया गया। इस प्रकार आत्मा एक ही मूल कारण सिद्ध हुआ, यह श्रुति सिद्धान्त ही नही, बल्कि युक्तियुक्त भी है। जैसा कि पूर्वमे आत्माको कारण सिद्ध किया जा चुका है। लोक- व्यवहारमे भी यह 'न्यूनतम कारणवाद' (Law of parsimony of causes) तथा सृष्टिकी मितव्ययिता (Law of economy of nature) प्रसिद्ध ही है। हम किसी कार्यकी उत्पत्ति यदि स्वल्प कारणोंसे कर सके तो अधिक एकत्रित ( सामग्री) करना उचित नहीं मानते। प्रत्युत ऐसा करनेवालेको 'अविद्वान्' कहते हैं। इस प्रकार आत्मतत्त्व ही केवल जगत्का उपादान माना जाय, यह श्रुतिसम्मत ही नहीं, प्रत्युत युक्तिसम्मत भी है। ७. आत्मा और जीवमें अद्वैत उपनिषत्प्रतिपाद्य आत्मतत्त्वका उसके कार्यभूत जगत्से तथा जीवमे भेद है अथवा अभेद ? इस दिशामे उपनिषत्- सिद्धान्त तो यही है कि आत्मतत्त्व और जीवतत्त्व-इनमें भेद नहीं है और जगत् भी उसमे वस्तुत भिन्न नहीं है। इस विषयमें महान् मतभेद हैं- पूर्वपक्ष-कुछ दार्शनिक प्रत्येक शरीरमे भिन्न-भिन्न आत्मा हैं और ईश्वर नहीं है, ऐसा मानते हैं। उनका कहना है कि यदि आत्मा एक हो तो एक ही आत्मामे एक काल- में भिन्न-भिन्न विरोधी गुण कैसे आ सकते हैं। कुछ अन्य दार्शनिक ईश्वरको मानते हुए भी आत्माओंसे उसी प्रकार भिन्न मानते हैं, जिस प्रकार आत्माएँ सब परस्पर भिन्न हैं। मुण्डकोपनिषद्में कहा है कि- 'द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया' (३।१।१) यहाँपर ईश्वर और जीवके अभिप्रायसे ही 'द्वि' शब्दका प्रयोग किया गया है। 'निरञ्जन' परम साम्यमुपैति' आत्मा निरञ्जन होकर परमेश्वरकी समानता प्राप्त करता है। वह समानता दो भिन्न तत्त्वोंके ही व्यवहारमें आ सकती है। ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे। छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः ॥ (कठोपनिषद् १।३।१) संसारमे सुकृतके फलका पान करते हुए यद्यपि जीव और ईश्वर-ये दोनों ही फल पान नहीं करते, तथापि जीवसे सम्बन्ध होनेके कारण 'पिबन्तौ' कहा है। छाया तथा आतपके समान विलक्षण अर्थात् जीव संसारी और ईश्वर असंसारी है-ऐसा ब्रह्मज्ञजन कहते हैं। इस अर्थमें जीवेश्वर-भेद स्फुट बतलाया है। X X X इसी प्रकार अन्य उपनिषदोंमें भी अनेक प्रकारसे आत्मतत्त्वका निर्देश है। १ कर्ता भोक्ता संसारी पुरुष है। २ साक्षी जीव कर्मफलदाता ईश्वर है। ३ 'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह, नेति नेति' आदि वचनोंसे बोध्य असंसारी आत्मा। (ऐतरेयोपनिषद्- शाङ्करभाष्यके अनुसार) X X X १. विश्व-जागरितावस्थामें जिसको बाह्यका ज्ञान होता है। (माण्डूक्योपनिषद्) २ तैजस-स्वप्नावस्थामें जिसको आभ्यन्तरका ज्ञान होता है। (माण्डूक्योपनिषद्)
- औपनिषद आत्मतत्त्व * ११७
३ प्राज्ञ-सुषुप्तावस्थामे जिसे कुछ भी भान नहीं होता है । ( माण्डूक्योपनिषद् ) ४ तुरीय-सर्वथा ईश्वर सर्वज्ञ अन्तर्यामी चतुर्थ है । ( माण्डूक्योपनिषद् )
जब कि आत्माके ये भेद उपलब्ध हैं, तो एकात्मवाद ( अद्वैत ) कैसे समझा जाय ? यदि कहा जाय कि— 'तत्सत्यम् ... स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो'
इस छान्दोग्योपनिषद्मे तत्=ब्रह्मके साथ 'त्वम्' पदार्थ जीवका अभेद बताया है, तो द्वैत कैसे माना जाय ? ठीक है, किंतु यह अर्थ ठीक नहीं है। तत् शब्द सत्यका परामर्श करता है और 'तत्त्वमसि'का प्रसङ्गसे यही अर्थ होगा कि—'हे श्वेतकेतो ! तू सत्य है, तेरे बिना यह शरीर आदि सब शून्य हैं। अब अद्वैत कैसे माना जाय ?'
यदि कहा जाय कि—'एकमेवाद्वितीयम्' यहाँ अद्वितीय तत्त्वका उल्लेख है, तो फिर जीव भिन्न कहाँसे रहेंगे ? यह भी ठीक नहीं। यहाँ 'एक' शब्दसे एक जातीय भी ले सकते हैं, जैसे समस्त घट एकजातीय मृत्तिकासे जायमान हैं न कि एक ही मृत्तिकासे समस्त घट बनें । यह अनुचित भी है, क्योंकि एक ही मृत्तिकासे नाना घट कैसे बन सकते हैं ?
उत्तरपक्ष—पूर्वोक्त विषय उपनिषत्-सिद्धान्तके प्रतिकूल है तथा आपातरमणीय भी है। जो हमें प्रति शरीरमें आत्मभेदको अनुभव होता है वह शरीरके भेदसे ही है, जैसा कि एक ही आकाशके घट, मठ आदि उपाधि-भेदसे भेद व्यवहारमें आता है, वस्तुतः भेद नहीं होता है ।
जो यह कहा गया कि विपरीत गुणोंका समावेश कैसे ? उसका उत्तर पहले ही दिया जा चुका है कि आत्मा निर्गुण है। सभी गुण अन्तःकरणके ही आत्मामें प्रतिफलित होते हैं। आत्माके लिये कहा गया है कि 'असङ्गो हि सः' ( वह असङ्ग=गुणादि धर्मरहित है । ) बृहदारण्यकोपनिषद्में कहा है कि—
'कामो विचिकित्सा धीर्ह्रीरित्येतत्सर्वं मन एव ।'
इससे यह सिद्ध है कि—आत्मामें ये सब धर्म नहीं हैं, सुख-दुःखादि सब गुण अन्तःकरणमें ही हैं।
'द्वा सुपर्णा' आदि वाक्योंमें जो जीवेश्वर-भेदकी कल्पना बतलायी है, वह भी औपचारिक है, वास्तविक नहीं है ।
कर्ता, ईश्वर, असंसारी, प्राज्ञ, विश्व, तैजस, तुरीय आदि एक ही आत्माकी औपाधिक दशाएं हैं, न कि इन नामवाले कोई भिन्न आत्मा हैं ।
तत्सत्यम् ... ... स आत्मा तत्त्वमसि ।' —का जो आधुनिक आर्यजन अर्थ करते हैं, वह ठीक नहीं है, क्योंकि उससे प्रकरणसङ्गति नहीं बैठती ।
तत् सत्यम्=वह ब्रह्म सत्य है ( असत्यव्यावृत्त है ) । स आत्मा=वही ब्रह्म आत्मा है । तत्त्वम्=तुम भी वही ब्रह्म हो, तत् शब्दसे विशेषणवाचक सत्यका परामर्श करना अनुचित है । इससे जीवब्रह्मैक्य सिद्ध है ।
'एकमेवाद्वितीयम्' यहाँ 'एक' शब्दका अर्थ 'कैवल्य' है, जो कि 'सजातीय, विजातीय और स्वगतभेदशून्य' अर्थमें आता है । यदि पूर्वोक्त ही अर्थ माना जाय तो 'नेह नानास्ति किञ्चन' इत्यादि वचन भी असङ्गत होंगे । निम्नलिखित वाक्योंसे भी अद्वैत कथित है—
'यथाग्ने क्षुद्रा स्फुलिङ्गा व्युच्चरन्ति, एवमेवा- स्मादात्मन सर्वे आत्मानो व्युच्चरन्ति ।' ( बृहदारण्यकोपनिषद् )
प्रथमावस्थामें एक ही आत्मतत्त्व है और उसीके समस्त अग्निकणके समान भेद है ।
'सदेव सोम्येदमग्र आसीत् ।' ( छान्दोग्योपनिषद् ) 'ऐतदात्म्यमिदं सर्वम् ।' ( ,, ) 'अहं ब्रह्मास्मि ।' ( ,, ) 'अयमात्मा ब्रह्म ।' ( ,, )
इन वाक्योंसे जीव और ब्रह्मकी वास्तविक एकता स्फुट ही है ।
✕ ✕ ✕
'नेति' 'यतो वाचो निवर्तन्ते' आदि वाक्योंसे भी पूर्वोक्त अद्वितीय आत्मतत्त्व ही प्रतिपाद्य है । जैसे—एक अपराधी मुग्ध-पुरुषसे उसका स्वामी कह दे कि 'तुझे धिक्कार है, तू मनुष्य नहीं है।' यह सुनकर मुग्ध पुरुष सन्दिग्ध होकर अन्य किसी विज्ञके पास जाकर अपने स्वरूपके सम्बन्धमें पूछने लगे कि 'कृपया मुझे बतलाइये मैं कौन हूँ ।' वह विज्ञ पुरुष उसकी मुग्धतापर मन ही मन हँसकर उससे कहेगा कि—'मै क्रमशः तुझे समझा दूँगा।' इतना कहकर वह विज्ञ पुरुष मुग्ध पुरुषको समझायेगा कि 'तू घट, पट, पृथिवी, शरीर आदि नहीं है, न पाषाण है, न जल है और
११८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * न तेन हे अर्थात् तू अमनुष्य नहीं है।' इस प्रकार विज्ञ युष्मद्भाग अमनुष्य प्रतिषेधरूपसे 'तू मनुष्य है' यह समझाया जा सकता है किंतु वह मुग्ध पुरुष यदि समझदार होगा तभी समझ सकेगा न कि मुग्धावस्थासे । इसी प्रकार 'नेति' शास्त्र मसारकी दृश्य सकल वस्तुओ- का प्रतिषेध करते हुए ब्रह्मस्वरूपका परिचय कराते हैं। किंतु इन वाद्योंसे आत्मावबोध अन्तःशुद्धि होनेपर ही होगा, १ कि उम मुग्ध पुरुषकी तरह जिसे 'तू अमनुष्य नहीं' यह कहनेपर तो क्या, किंतु 'तू मनुष्य है' यह कहनेपर भी बोध नहीं हो पाता, अपवित्र रहनपर । इस प्रकार पूर्व शङ्का-समाधानोंसे औपनिषद आत्मतत्त्वका सक्षिप्त परिचय कराया जा सकता है। वस्तुत वह अससारी, अनिर्वचनीय अद्वितीय हे । लेखके क्लेवरवृद्धिके भयसे इस विषयको यहीं समाप्त किया जाता है। यदि इस लेखके द्वारा पाठकोंका किञ्चिन्मात्र भी लाभ होगा तो लेखक अपना परिश्रम सफल समझेगा । उपनिषदोंका महत्त्व और उद्देश्य ( लेखक—श्रीताराचन्द्रजी पाण्ड्या, बी० ए० ) वेदोंके कर्मकाण्ड-भागकी तो गीताने अप्रशंसा-सी ही की है ( श्रीमद्भगवद्गीता २ । ४२-४५, ९ । २०-२१), परन्तु उपनिषदोंसे ही तो गीताकी उत्पत्ति हुई है—वह उपनिषद्- रूपी गायोंका दूध है और जैसा कि गीताके प्रत्येक अध्यायको समाप्त करनेवाले शब्दोंसे सूचित है, गीता स्वय भी एक उपनिषद् है। उपनिषदोंके अनेक मन्त्र प्राय' ज्यो के त्यो गीतामें गुम्फित हे । अशाश्वत, जड, परम्परूप सासारिक पदार्थोंको छोड़कर शाश्वत, विज्ञानघन आनन्दमय, निजस्वरूप आत्माको पहचाननेका और उसमे तन्मय हो जानेका जो दिव्य और सनातन ज्ञान आदिम कालमे उद्भूत—अवतरित—हुआ था, वह उपनिषद्दोमे निहित है। उपनिषदोंका लक्ष्य है—'आत्मान विद्धि'—आत्माको-अपने आपको जानो-पहचानो। जो इस आत्माको नहीं जानते और उसके स्वरूपसे विमुख रहते हैं। वे आत्मघाती हैं, उनकी अधोगति होती हे— असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृता । ताँस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जना. ॥ ( ईशावास्योपनिषद् ३ ) आत्मज्ञानको ही विद्या माना है और शेषको अविद्या। अविद्यामे मोहजनक विनश्वर लौकिक सुख भले ही प्राप्त हो जायँ, परन्तु अनन्त और वास्तविक आनन्द (अमृतत्व) तो विद्यासे ही उपलब्ध हो सकता है। जो विद्यासे रहित है, वह न तो म्वय कल्याण पथपर चल सकता है और न दूसरोंका ही मार्ग-प्रदर्शन कर सकता है— अविद्यायामन्तरे वर्तमाना स्वयं धीरा पण्डितम्मन्यमाना। दन्द्रम्यमाणा परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धा ॥ ( कठोपनिषद् १ । २ । ५) किंतु विद्या वही सुफल दे सकती है जो सच्ची और हार्दिक हो; मिथ्या या कपटपूर्ण (Hypocritical) होने- पर तो वह विद्या (या विद्याभास) अविद्यासे भी अधिक अनर्थकारिणी हो जाती है— अन्धं तम प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ विद्याया ँरता. ॥ ( ईशावास्योपनिषद् ९ ) विद्या श्रेय है और अविद्या प्रेय है। प्रेयसे श्रेय अधिक उपादेय है। जो विद्या और अविद्याकी भिन्न-भिन्न सिद्धियोंको समझता है और अपने उच्चतर एव एकमात्र लक्ष्य आत्मो- पलब्धिसे च्युत नहीं होता, वह दोनोंका सदुपयोग करके लाभ उठा सकता है अर्थात् अविद्यासे मृत्यु अर्थात् लौकिक कष्टोको दूर करके और इस प्रकार अपेक्षाकृत सुखपूर्वक विद्याका साधन करके अमृतत्वको प्राप्त कर सकता है— अविद्यया मृत्यु तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते । ( ईशावास्यो० १४) परतु यथार्थ और एकमात्र उद्देश्य तो अमृतत्वकी प्राप्ति ही रखना चाहिये और अन्य सब कामनाओंको हेय ही समझना चाहिये । पराच कामाननुयन्ति बाला- स्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम् । अथ धीरा अमृतत्व विदित्वा ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते ॥ ( कठोपनिषद् २ । १ । २)
~ उपनिषद्-ग्रन्थोंका रचनाकाल * ११९
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिता । अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥ ( कठोपनिषद् २ । ३ । १४ )
आत्माके लिये शरीर है, न कि शरीरके लिये आत्मा । शरीर तो आत्माकी गति (ऊर्ध्वगति या अधोगति) के लिये एक साधन है । इसका उपयोग करनेवाला इससे भिन्न है ।
आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु । बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मन प्रग्रहमेव च ॥
नचिकेता, जाबाल आदिकी अनेक कथाओंसे उपनिषदोंकी प्रभावक्ता और भी अधिक बढ़ी हुई है । ये सुन्दर, सरल और हृदयस्पर्शी कथाएँ जिस मार्मिक प्राचीन कालकी घटनाओंका वर्णन करती हैं, उसे मानो हजारो और लाखो वर्षोंके व्यवधानको दूर करती हुई आँखोंके सामने ले आती ह और उसकी पवित्रताकी सुगन्ध हृदयमे भर देती हैं ।
उच्च आध्यात्मिक ज्ञानके विषयवाले होनेपर भी उपनिषदोंके अनेक वाक्य निम्नस्तरके दैनिक जीवनके लिये भी अत्युपयोगी हैं । 'तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृध कस्यस्विद्धनम्' 'मा विद्विषावहै' आदि वचनोंके अनुसरणकी वर्तमान जगत्के हित, सुख तथा रक्षाके लिये कितनी आवश्यकता है, यह सूर्य प्रकाशवत् इतना सुस्पष्ट है कि इसको बतानेकी आवश्यकता नहीं है ।
उपनिषद्-ग्रन्थोंका रचनाकाल
(लेखक---ज्यो० भू०प० श्रीइन्द्रनारायणणी द्विवेदी )
संस्कृत साहित्यमे उपनिषद् ग्रन्थोका स्थान बहुत ऊँचा है । यहाँतक कि वेदोंके शिरोभागके नामसे उपनिषदोंका परिचय दिया जाता है और अध्यात्मज्ञानके लिये उपनिषद्-ग्रन्थ ही एकमात्र साधन हैं । वेदान्तसूत्र और श्रीमद्भगवद्गीता आदि समस्त गीताएँ उपनिषदोंके ही ज्ञानरत्नोंसे परिपूर्ण हैं । अवश्य ही हमारे उपनिषद् ग्रन्थोंमे सबम अधिक मान उन उपनिषदोंका है जो संहिता अथवा ब्राह्मणरूप वेदाके अन्तर्गत हैं, किंतु उन उपनिषदोंका भी मान है, जिनके मूल वेद और ब्राह्मणके उपलब्ध भागोंमे हमको वर्तमान समयम नहीं मिलते और वदानुयायी पौराणिक साहित्यमे जिनके प्रमाण मिलते हैं । ये सब उपनिषद् ग्रन्थ, संस्कृत-साहित्यमे हम भारतीयोंके ज्ञानकाण्डके भण्डार माने जाते हैं ।
हमारे उपनिषद् ग्रन्थोंका इस प्रकार मान देखकर किसी चाटुकारने अकबरके समयमे 'अल्लोपनिषद्' नामकी एक छोटी सी पुस्तिका लिखी थी, जिसमे अरबी और संस्कृतकी मिश्रित भाषामे दम गद्य ह और रसूल, महम्मद, अकबर आदि शब्द आये हैं, किंतु इतने स्पष्ट प्रमाणोंके होते हुए भी इस समयके एक इतिहासके विद्वानके मुखसे उसकी गणना वैदिक साहित्यम कराके मुसलमानोंके पुष्टीकरणकी नीतिमे चाटुकारी दोहगयी गयी हैं--यह कितन आश्चर्यकी बात है । इतना ही नहीं, हमारे उपनिषद् ग्रन्थाकी ओरसे श्रद्धा हटाने के अभिप्रायम प्रो० मेक्समुलर जैसे विद्वानने एक 'मक्सोपनिषद्' नामकी पुस्तिका रची थी और लोगोंके आपत्ति करनेपर प्रोफेसर माहबने लिखा था कि हमन मजाकके तौरपर इसकी रचना की है । प्रोफेसर माहवका वह पत्र 'सरस्वती' मासिक पत्रिका (प्रयाग) मे छपा था । सम्भवत उसी प्रकार दूसरे चाटुकार, मज़ाकी अथवा अपने धार्मिक मतके समर्थनमे उपनिषद्नामसे कुछ पुस्तके लिखनेकी चेष्टा करनेवाले और भी हुए हो अथवा भविष्यम हो, जिनकी रचनाम लोगोंको उपनिषद् ग्रन्थोंके विषयम सन्देह हो । अतएव केवल उपनिषद् नामपर नहीं--उसके आधार ओर ज्ञानोपदेशपर विचार करके हमको निश्चय करना चाहिये कि ये ग्रन्थ वस्तुत उपनिषद्-ग्रन्थ हैं अथवा चाटुकारों और धूर्ताकी कपोल-कल्पना है ।
जिन उपनिषद् ग्रन्थोंका हमारे संस्कृत साहित्यम सर्वोच्य स्थान है और जिनका अस्तित्व हमारे वैदिक साहित्यमे उपलब्ध है, आज हम उन्हीं उपनिषद् ग्रन्थोंके रचना कालपर विचार करना चाहते हैं । मैत्रायणीशाखामे अपाणिनीय शब्दोंको देखकर कुछ लोगोंका मत है कि वह शाखा पाणिनिके पूर्वकी है । अतएव मैत्र्युपनिषद् भी पाणिनिके पूर्वकालकी है, किंतु भाषातत्त्वके विद्वानांके इस मतसे हम सहमत नहीं कि किसी ग्रन्थमे अपाणिनीय शब्दके प्रयोगसे उसको हम पाणिनिसे पूर्वका ग्रन्थ मान लें, अथवा उसके आधारपर पाणिनिके समयको हम पीछे हटानेकी चेष्टा करें, क्योकि संस्कृत-साहित्यमें न जाने कितने आधुनिक ग्रन्थ भी ऐसे हैं, जिनमें अपाणिनीय शब्दोंके प्रयोग अधिकतामे मिलते हैं ।
१२० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
अवश्य ही मैत्र्युपनिषद् (६।१४) मे ज्योतिष सम्बन्धी 'मघाद्य श्रविष्ठार्द्धम्'के रूपमें दक्षिणायनका वर्णन आया है, जिससे यह सिद्ध होता है कि उस समय आधे धनिष्ठासे उत्तरायण (मकरका आरम्भ) होता था । स्व० बा० लोकमान्यतिलकने गीतारहस्य (पृ० ५५२) मे लिखा है कि 'मैत्र्युपनिषद् ईसाके पहले १८८० से १६८० वर्षके बीच कभी न-कभी बना होगा । क्योंकि लोकमान्यके मतसे वेदाङ्ग ज्योतिष- कालका उदगयन, मैत्र्युपनिषद् कालीन उदगयनकी अपेक्षा लगभग आधे नक्षत्रसे पीछे हट आया था । ज्योतिर्गणितसे यह सिद्ध होता है कि वेदाङ्ग ज्योतिषमे कही गयी उदगयन स्थिति ईसाई सनके लगभग १२०० या १४०० वर्ष पहलेकी है' (गीतारहस्य पृ० ५५२) । साराश यह कि लोकमान्यके मतसे मैत्र्युपनिषद् ग्रन्थका रचनाकाल, ईसासे पूर्व कम से-कम १२०० वर्ष सिद्ध होता है । मैत्र्युपनिषद् ग्रन्थमे अनेक स्थलोमे छान्दोग्य, बृहदारण्यक, तैत्तिरीय, कठ और ईशावास्य-उपनिषदोंके वाक्य तथा श्लोक प्रमाणार्थ उद्धृत किये गये हैं । अतएव यह स्वयंसिद्ध है कि छान्दोग्य, बृहदारण्यक, तैत्तिरीय, कठ और ईशावास्य उपनिषद्ग्रन्थ ईसाके पूर्व १२०० १४०० वर्ष (मैत्र्युपनिषद् ग्रन्थ रचनाकाल) के भी बहुत पहलेके हैं । अवश्य ही ज्योतिप्रगणितके अनुसार लोकमान्यतिलकने जो समय निश्चित किये हैं, वे समय वस्तुत निश्चित ही है—यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि आधुनिक गणितज्ञोंके मतमे ज्योतिषकी वही स्थिति जो मेन्युपनिषद् ग्रन्थमे कही गयी है—आधे धनिष्ठासे उत्तरायणका आरम्भ, ईसासे पूर्व जिस प्रकार १८८० १६८० वर्ष पूर्व हुई होगी, ठीक उसी प्रकारकी स्थिति ईसासे २७८८० २७१६८० वर्ष पूर्व भी थी और उसके पूर्व भी २६००० २६००० वर्ष पूर्व होती रही है। अतएव हम इस बातको माननेके लिये बाध्य नहीं कि हमारे वैदिक साहित्यके शिरोभाग उपनिषद् ग्रन्थ ईसासे पूर्व १८८०-१६८० वर्षमे ही रचे गये है । अवश्य ही जिन पाश्चात्य विद्वानोंके धर्म-ग्रन्थानुसार मानव सृष्टिका आरम्भ ही ईसासे पूर्व लगभग ४००० वर्षसे माना जाता है, वे उपनिषद्-ग्रन्थोंके उत्तरायण- वर्णनसे अन्तिम काल ईसासे पूर्व १८८०-१६८० उपनिषद्- ग्रन्थोंका रचनाकाल मानें तो इसमें आश्चर्यकी बात नहीं है, किंतु वैदिकधर्मके माननेवाले भारतवासी हम जिनके सृष्टिका आरम्भकाल इस समय विक्रम संवत् २००५ के १९५५८८५०४९ वर्ष पूर्व माना गया है, और जिनके सिद्धान्त ज्योतिषके गणित सहस्र चतुर्युगीय कल्पके आधारपर किये गये हैं, अपने उपनिषद्-ग्रन्थोंका रचनाकाल नही, आविर्भावकाल उस समयको मानेंगे जो मघा-नक्षत्रसे दक्षिणायन और आधे वनिष्ठा नक्षत्रसे उत्तरायणका समय वर्तमान सृष्टिमें (जिसके छः मन्वन्तर बीत चुके हैं और सातवें मन्वन्तरके अठाईसवें कलियुगके ५०४९ वर्ष भी बीत चुके हैं) सबसे प्रथम आया होगा । साराश यह कि हमारे उपनिषद् ग्रन्थोका रचनाकाल, आधुनिक गणितज्ञोंके गणितसे ही अतिप्राचीन सिद्ध होता है और यदि पुरातत्त्वज्ञानके प्रचारसे पाश्चात्य विद्वानोको अपने मानव-सृष्टिकालके आरम्भकालकी त्रुटि विदित हो गयी और वैदिक सृष्टिकी ओरसे अविश्वास हट गया तो वे भी यह बात मान लेंगे कि हमारे वैदिक साहित्यके शिरोभाग-उपनिषद् ग्रन्थो का रचनाकाल शताब्दियोंमे नहीं गिना जा सकता । हम आशा करेंगे कि पक्षपात और धर्मविरोधी भावनाको त्यागकर ऐतिहासिक जन हमारे इस विचारकी ओर अवश्य ध्यान देंगे कि उपनिषदग्रन्थोंके समय निरूपणमें सबसे प्रथम धनिष्ठार्द्धके उत्तरायणको न मानकर सबसे अन्तके धनिष्ठार्द्धके उत्तरायण- को माननेके लिये क्या कोई प्रमाण है ? और यदि नहीं तो, हमारा मत अवश्य सर्वमान्य होना चाहिये ।
औपनिषद सिद्धान्त
ब्रह्म, सगुण, निर्गुण तथा निराकार, साकार । परमात्मा, परमेश, विभु, विश्व, विश्व आधार ॥ प्रणव, यज्ञ, यज्ञेश, सब प्रकृति, पुरुष, पर, वेद । भेदरहित, नित भेदमय, संयुत भेदाभेद ॥ सर्वरूप, शुचि, सर्वमय, शाश्वत, सर्वातीत । शुद्ध सत्त्व, पुनित्रिगुणमय, यद्यपि त्रिगुणातीत ॥ नारायण, नरसिंह, श्रीकृष्ण, राम, गोपाल । सूर्य, शक्ति, गणनाय, शिव, रुद्र, स्वयम्भू, काल ॥ नाम-रूप-लीला विविध तत्त्व एक वेदान्त । वाणी-मन-मतिसे परे औपनिषद सिद्धान्त ॥
वेदों और उपनिषदोंमें मांस-भक्षण और अश्लीलता नहीं है ( लेखक—पाण्डेय पं० श्रीरामनायणदत्तजी शास्त्री 'राम' )
वेद अपौरुषेय हे—परमात्माके निःश्वासरूप हैं। वे ज्ञानके अक्षय एव अगाध भण्डार हैं। वेदवेद्य परमात्मा और वेद दोनो ही 'ब्रह्म' नामसे प्रतिपादित होते हैं। वेद ज्ञानमय हैं और ज्ञान ही ब्रह्मका स्वरूप है। अतः वेद ब्रह्मसे भिन्न नहीं हैं। ब्रह्मके लिये विज्ञान, आनन्द, सत्य एव अनन्त आदि विशेषण प्रयुक्त होते हैं, ये सभी वेदमे भी गतार्थ हो जाते हैं। यद्यपि ब्रह्म निर्विशेष है—अनिर्वचनीय है, तथापि जब हम वाणीद्वारा उसके स्वरूपके सम्बन्धमें कुछ कहने- को प्रस्तुत होते हैं, तब हम उसे सविशेष कर ही देते हैं। यह ब्रह्मकी न्यूनता नहीं, हमारी अपनी असमर्थता है। जैसे ब्रह्म अनवद्य और अनामय है, वैसे ही वेद भी हैं; अतः वेदमें कोई ऐसी बात नहीं हो सकती जो मनुष्यके लिये परम कल्याणमयी न हो। जब ब्रह्म ही शान्त और शिवरूप है तब उसीका ज्ञान वेद अशिवरूप कैसे हो सकता है ? वेदका शिरोभाग है उपनिषद्, जो केवल ज्ञानप्रधान होनेसे 'ज्ञानकाण्ड' कहलाती है। वेदोंका अन्त अथवा वेदोंका चरम सिद्धान्तरूप होनेसे उपनिषद्को वेदान्त शास्त्र भी कहते हे। जीवमात्रके अकारण सुहृद् परमात्माने अपने स्वरूपभूत वैदिक ज्ञानका आलोक इसीलिये प्रकाशित किया कि सब लोग इस तमोमय जगत्से निकलकर प्रकाशमय परमात्मपदकी ओर बढ़ें। असत्से सत्की ओर और मृत्युसे अमृतपदकी ओर प्रगति कर सकें। इतनेपर भी कुछ लोगोंने वेदोंपर लाञ्छन लगानेकी चेष्टाएँ की हैं, उनपर दोषारोपणका दुःसाहस किया है। उनकी समझमें वेदोंसे मास-भक्षणकी प्रवृत्तिको प्रोत्साहन मिलता है और वेदोंमें उन्हें अश्लीलता भी दिखायी देती है। यह तो निर्विवाद सिद्ध है कि प्रकाशमे तम नहीं रह सकता। फिर भी, जब हम प्रकाशमें खड़े होते हैं तो हमें वहाँ अपनी ही छाया दीख पड़ती है। निर्मल जल या स्वच्छ दर्पणमें निकटसे देखनेपर हमे अपने ही प्रतिबिम्बका दर्शन होता है। यदि हम उस काली छायाको भी प्रकाशका अङ्ग तथा प्रतिबिम्बको भी जल और दर्पणका अवयवविभाग मान लें तो इससे हमारे ही अज्ञानका परिचय मिलेगा, इससे उन प्रकाशादि वस्तुओंकी निर्मलतामें दोष नहीं आ सकता। यही दशा उपर्युक्त आरोपोंकी भी है। वेदोंमें न मासकी विधि है, न अश्लीलताका नग्न चित्रण ही। यह सब हमे अपने परिवर्तित दृष्टिकोणके कारण दृष्टिगोचर होता है। जैसे सब प्रकारकी आसक्तियोंके त्यागपूर्वक भगवान्के अनन्यशरण होनेसे ही श्रद्धालु भक्तको उनके यथार्थ तत्त्वका बोध या साक्षात् उनके स्वरूपकी प्राप्ति होती है, उसी प्रकार मत-मतान्तरोंके आग्रहसे रहित हो भक्तिभावसे वेद भगवान्- की शरणमे जानेमे ही वेदके यथार्थ तत्त्वकी उपलब्धि हो सकती है। 'यमेवैष वृणुते तेन लभ्य'—'वेद अथवा भगवान् स्वय ही दया करके जिसे अपना ले, उसीको वे प्राप्त होते हैं।' अतः केवल मेधावी पण्डित होनेसे या बहुतसे शास्त्रोंका अध्ययन कर लेनमात्रसे अहङ्कारवश कोई वेदके यथार्थ तत्त्वको पूर्णतया नहीं जान सकता—'न मेधया न बहुना श्रुतेन ।' मनुष्योंमें अनेक प्रकृतिके लोग होते हैं, गीतामे उनको दो भागोंमें विभक्त किया गया है—एक दैवी प्रकृति और दूसरी आसुरी प्रकृति— द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च। भयका अभाव, अन्तःकरणकी स्वच्छता, तत्त्वज्ञानके लिये ध्यानयोगम निरन्तर स्थिति, दान, इन्द्रियसंयम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप, सरलता, अहिंसा, सत्य, क्रोधका अभाव, त्याग, शान्ति, चुगली न खाना, समस्त प्राणियोंपर दया, अलोलुपता, मृदुता, लज्जा, अचञ्चलता, तेज, क्षमा, धृति, शौच, कहीं भी वैरभाव न होना तथा अभिमानका अभाव— ये सब दैवी प्रकृतिके लोगोंमें विकसित होनेवाले सद्गुण हैं। आसुरी प्रकृतिके लोग इनसे सर्वथा विपरीत होते हैं। कौन-सा काम करना चाहिये और कौन-सा नहीं—हम किसमे लगें और किस कार्यसे अलग रहें—इन सब बातोंको वे बिल्कुल नही समझते। शौच, सदाचार और सत्य तो उनमे रहता ही नहीं। वे जगत्को बिना ईश्वरके ही उत्पन्न हुआ मानते हैं। इसके मूलमें कोई सत्य है, इसका कोई नित्य चेतन आधार है—इन सब बातोंको वे नहीं स्वीकार करते। उनकी समझमे केवल काम ही इस जगत्का हेतु है और यह स्त्री- पुरुषके संयोगसे ही सतत उत्पन्न होता है। इस मिथ्या ज्ञान- का आश्रय लेनेसे उनका सस्वरूप आत्मा तिरोहित-सा हो जाता है, वे अल्पबुद्धि होनेके कारण सबका अहित करनेवाले
उ० अं० १६—
१२२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
[बायाँ स्तम्भ]
क्रूरकर्मी बन जाते हैं और जगत्के विनाशमे ही कारण बनते हैं। वे अपने मनमे ऐसी-ऐसी कामनाएँ पालते हे, जो कभी पूर्ण न हो सके । वे दम्भ, मान और मदसे उन्मत्त होते हैं और मोहवश मिथ्या सिद्धान्तोंको ग्रहण करके भ्रष्टांचारसे संयुक्त हो स्वेच्छाचारपूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं। मरण- पर्यन्त अनन्त चिन्ताओंमे डूबे रहते हैं। सदा कामोपभोगमे संलग्न होकर—इतना ही सुख हे—ऐसा मानते रहते हैं। सैकड़ों आशाके वन्धनोंमें बँधकर, काम क्रोधपरायण हो, काम भोगके लिये ही वे अन्यायपूर्वक धनसचय करना चाहते हैं। आज यह पा लिया, कलको अमुक मनोरथ सिद्ध करूँगा, इतना धन तो मेरे पास है ही, फिर यह भी मेरा ही हो जायगा। अमुक शत्रुको तो मार डाला और दूसरे जो बचे हैं, उनका भी सफाया करके छोडूंगा। मेरी शक्ति किसीसे कम नहीं है—मै ईश्वर हूँ, मै भोगी हूँ, मैं सिद्ध, बलवान् और सुखी हूँ। धनी और जनताका नेता हूँ; ससारमे दूसरा कौन है जो मेरी बराबरी कर सके । मैं इच्छानुसार यज्ञ, दान और आनन्दोपभोग करूँगा। ये ही सब उनके मुखसे निकले हुए उद्गार हैं। वे अपने ही बड़प्पनकी डींग मारनेवाले, घमंडी तथा धन और मानके मदसे उन्मत्त होते हैं, और पाखण्डपूर्ण नाममात्रके यज्ञों- द्वारा अविधिपूर्वक यजन करते हैं। अहङ्कार, बल, दर्प, काम और क्रोधका आश्रय ले अपने और दूसरेके शरीरमें स्थित अन्तर्यामी परमेश्वरसे द्वेष करते और उनकी नित्य निन्दा करते हैं। तथा इसीलिये वे अन्ततोगत्वा बार-बार आसुरी योनि और नरकमे पड़ते हैं। (गीता अध्याय १६)
कहनेकी आवश्यकता नहीं कि प्राय. ऐसे आसुरी प्रकृतिके लोग ही मास और अश्लील सेवनकी रुचि रखते हैं और अधिकांशमे ऐसे ही लोगोने अर्थका अनर्थ करके सर्वत्र मद्य, मास और मैथुनकी प्रवृत्तियोको प्रसारित करने- की चेष्टाएँ की हं ।* कहा जाता है, वेदोंमे यज्ञके लिये
* यह सत्य है कि इधरके कुछ परम आदरणीय आचार्यों और महानुभावोंने भी किन्हीं-किन्हीं शब्दोंका मासपरक अर्थ किया है । इसका प्रधान कारण यह है कि उनमेसे अधिकांश परमार्थवादा महापुरुष थे । गूढ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विषयोंपर विशेष दृष्टि रखकर उनका विशद अर्थ करनेपर उनका जितना ध्यान था, उतना लौकिक विषयोंपर नहीं था। इसीसे उन्होंने ऐसे विषयोंका वही अर्थ लिख दिया जो देशकी परिस्थितिविशेषके कारण उस समय अधिकांशम प्रचलित था ।
[दायाँ स्तम्भ]
पशुहिंसाकी विधि है। अतः वेदोंका मान रखनेके लिये कुछ लोग 'वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति।' वेदविहित हिंसाका नाम हिंसा ही नहीं है, ऐसा कहा करते हैं। परंतु हिंसा हिंसा ही है, फिर वह चाहे कैसी ही हो। वेदोंकी तो यह स्पष्ट आज्ञा है—'मा हिंस्यात् सर्वां भूतानि।' (किसी भी प्राणीकी हिंसा न करे।) फिर वैदिकी हिंसा क्या वस्तु है। जगत्के प्राणियोंको कष्ट देनेवाले दस्युओं, आततायियो तथा पापियोंके लिये जो प्राणदण्डका आदेश मिलता है, वह हिंसा नही, दण्ड है। दण्ड अपराधीको ही दिया जाता है, निरपराधको नहीं। 'दस्युता', 'आततायीपन' अपराध है; अत. इनके लिये दण्डका औचित्य है, किंतु उन भेड़- बकरे आदि पशुओंका क्या अपराध है, जिनको दण्ड दिया जाय। वह भी यज्ञके नामपर। यज्ञ परमेश्वरकी आराधना है। परमेश्वर विश्वके पालक और शिवरूप हैं। अतः विश्वके संरक्षण और कल्याणमे योग देना ही परमेश्वरकी यथार्थ पूजा अथवा यज्ञ है। किसी निरपराध पशुके रक्त-माससे परमेश्वरको तृप्त करनेकी कल्पना कितनी बीभत्स है। यह तो—
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ।
—के अनुसार स्पष्टतः ईश्वरद्रोह है। यह ईश्वरद्रोह ही जिनकी प्रकृति है, उन असुरोंने ही समय-समयपर वेदोंके अर्थोंको बदलनेकी चेष्टा की है। बृहदारण्यकोपनिषदमें प्रथम अध्यायके तृतीय ब्राह्मणमें कथा आती है कि प्रजापतिके ज्येष्ठ पुत्रों— देवताओंने 'वाक्' आदि प्राणोंसे कहा, 'तुम हमारे लिये उद्गान करो।' उन्होंने वैसा ही किया। तब असुरोंने समझा कि इस प्रकार तो ये देवता हमे पराजित ही कर देंगे, अतः उन्होंने उन वाक् आदिको पापसे विद्ध कर दिया—'पाप्मना- विध्यन्।' इससे उनमे असत्य-भाषण आदिका दोष आ गया। जो असुर हमारी इन्द्रियोंपर भी अपने सस्कार डाल सकते है, उन्होंने ग्रन्थोंमें कुछ मिलानेकी चेष्टा की हो तो क्या आश्चर्य। इसीलिये कहा जाता है कि मास खानेकी प्रवृत्ति मनुष्यमें स्वाभाविक नहीं; यह तो निशाचरोंके प्रयत्नमे हुई है—
मासाना खादन तद्बन्निशाचरसमीरितम् ।
महाभारत अनुशासनपर्वमे कहा गया है कि प्राचीन कालमें मनुष्योंके यज्ञ-यागादि केवल अन्नसे ही हुआ करते थे। मद्य-मास आदिकी प्रथा तो पीछेसे धूर्त असुरोंने चला
यहाँ पृष्ठ का लिप्यंतरण प्रस्तुत है:
- वेदों और उपनिषदोंमें मांस-भक्षण और अश्लीलता नहीं है * १२३ दी। वेदमे इन वस्तुओंका विधान नहीं है।* असुर शब्दका अर्थ है—प्राणका पोषण करनेवाला। जो अपने सुखके लिये दूसरे प्राणियोंकी हिंसा करते हैं, वे सभी असुर हैं। आसुरी प्रकृतिके मनुष्य पढ-लिखकर विद्वान् हो जानेपर भी देहा- सक्ति और देहाभिमान नहीं छोड़ पाते। वे शास्त्र इसीलिये पढते हैं कि शास्त्रका मनमाना अर्थ करके अपने मतकी पुष्टि कर सकें। अतः शास्त्रसे वे यथार्थ ज्ञानको नहीं ग्रहण कर पाते। केवल शब्दोंकी व्युत्पत्ति करके खींचतानसे चाहे जो अर्थ निकाल लेना अपनेको और दूसरोंको भी धोखा देना है। वेद ईश्वरीय ज्ञान हैं। महर्षियों तथा मेधावी महात्माओंने वेदार्थको समझनेके लिये भी कुछ पद्धतियाँ निश्चित की हैं, उन्हींके अनुसार चलकर हमें श्रद्धापूर्वक वेदार्थको समझनेका यत्न करना चाहिये। भगवान्से प्रार्थना करनी चाहिये कि वे अन्तःकरणमें स्थित होकर कृपापूर्वक वेदोंके सत्य अर्थको प्रकट कर दें। भगवान्का आश्रय लेकर यदि वेदार्थका विचार किया जाय तो भगवत्कृपासे निश्चय ही सत्य अर्थका साक्षात्कार हो सकता है। ऋग्वेदमे लिखा है—‘यज्ञेन वाचं पदवीयमानम्’ अर्थात् समस्त वेदवाणी यज्ञके द्वारा ही स्थान पाती है। अतः वेदका जो भी अर्थ किया जाय, वह यज्ञमें कहीं-न-कहीं अवश्य उपयुक्त होता हो—यह ध्यान रखना आवश्यक है। वेदार्थके औचित्यकी दूसरी कसौटी यह है— बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे । (वैशेषिकदर्शन) अर्थात् वेदवाणीकी प्रकृति बुद्धिपूर्वक है। अतः वेदमन्त्र- का अपना किया हुआ अर्थ बुद्धिके विपरीत न हो—बुद्धिमें बैठने योग्य हो, इस बातपर भी ध्यान रखनेकी आवश्यकता है। साथ ही यह भी देखना उचित है कि हमने जो अर्थ किया है, वह तर्कसे सिद्ध तो होता है न ? हमारा अर्थ तर्कसे असङ्गत तो नहीं ठहरता ? निरुक्तकार कहते हैं—ऋषियोंके उत्क्रमण करनेपर मनुष्योंने देवताओंसे पूछा—'अब हमारा ऋषि कौन होगा ? कौन हमें वेदका अर्थ निश्चित करके बतावेगा ? तब देवताओंने उन्हें तर्क नामक ऋषि प्रदान किया।'* अतः तर्कसे गवेषणापूर्वक निश्चित किया हुआ अर्थ ऋषियोंके अनुकूल ही होगा। स्मृतिकार भी कहते हैं— यस्तर्केणानुसन्धत्ते स धर्मं वेद नापरः । 'जो तर्कसे वेदार्थका अनुसन्धान करता है, वही धर्मको जानता है, दूसरा नहीं।' अतः समुचित तर्कसे समीक्षा करना वेदार्थके परीक्षणका तीसरा मार्ग है। चौथी रीति वह है कि इस बातपर दृष्टि रक्खी जाय कि हमारा किया हुआ अर्थ शब्दके मूलधातुके विपरीत तो नहीं है; क्योंकि निरुक्तकारने धातुज अर्थको ही ग्रहण किया है। पतञ्जलिने भीअपने महाभाष्यमे इसकी चर्चा की है--'नाम च धातुजमाह निरुक्ते।' इन चारो हेतुओको सामने रखकर यदि वेदार्थपर विचार किया जाय तो भ्रमकी सम्भावना नहीं रहेगी। प्रकृति स्वभावतः निम्नगामिनी होती है, अतः प्रकृतिके वश- मे रहनेवाले मनुष्यकी प्रवृत्ति स्वभावतः विषयभोगकी ओर होती है। शास्त्र ईश्वरीय ज्ञान हैं, वे मनुष्यकी उच्छृङ्खल प्रवृत्तिको रोकने और उसे धर्मएव सदाचारसे प्रतिष्ठित करनेके लिये ही अवतीर्ण हुए हैं। वेद तो साक्षात् भगवान्की वाणी हैं, अतः उनमें कोई ऐसी बात हो ही नहीं सकती, जो मनुष्यको अनर्गल विषयभोग एव हिंसाकी ओर जानेके लिये प्रोत्साहन देती हो। वह तो असत्से सत्की ओर जानेकी ही प्रेरणा देती है। अतः तर्क और बुद्धिसे यही ठीक जान पड़ता है कि वेद हिंसात्मक या अनाचारात्मक कार्योंके लिये आदेश नहीं दे सकते। यदि कहीं कोई ऐसी बात मिलती है तो वह अर्थ करनेवालोंकी ही भूल है। प्रायः यज्ञमे पशु-वधकी बात बतायी जाती है। परंतु यज्ञके ही जो प्राचीन नाम मिलते हैं, उनसे यह सिद्ध हो जाता है कि यज्ञ सर्वथा अहिंसात्मक होते आये हैं। 'न्वर' शब्दका अर्थ है हिंसा। जहाँ ध्वर अर्थात् हिंसा न हो, उसीका नाम 'अध्वर' है। यह 'अध्वर' शब्द यज्ञका ही पर्याय है। अतः हिंसात्मक कृत्य कभी यज्ञ नहीं माना जा सकता। 'यज' धातुमे 'यज्ञ' बनता है। इसका अर्थ है—देवपूजा, सङ्गतिकरण और दान। इनमेंसे किसीके द्वारा भी हिंसाका समर्थन नहीं प्राप्त होता। गो- यज्ञमे गायोंकी पूजा ही होती है, जहाँ असुर सदासे गाय आदि पशुओंको मारकर अपनी रक्त-पिपासा शान्त करते आये हैं, वहीं देवयज्ञमे गौओंको 'अघ्न्या' (न मारने योग्य) बताकर पूज्य ठहराया गया है। आज भी देवताओंके वंशज गोपूजक हैं। --- पाद-टिप्पणियाँ ---
- श्रूयते हि पुरा कल्पे नॄणा व्रीहिमयो पशु । येनायजन्त यज्वान पुण्यलोकपरायणा ॥ (महा० अनु० ११५।५६) सुरा मत्स्यान् मधु मांसमासव कृसरौदनम् । धूर्त प्रवर्तित ह्येतन्नैतद् वेदेषु कल्पितम् ॥ (महा० शान्ति० २६५।९)
- मनुष्या वा ऋषिषूत्क्रामत्सु देवानब्रुवन् को न ऋषर्भविष्यतीति । तेभ्य एत तर्क्रमृर्षि प्रायच्छन् (निरुक्त २।२०)
१२४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * —-------------------------------------------------------------------------------------------------------
वैदिक यज्ञोंमें तो मासका इतना विरोध है कि मास जलानेवाली आगको सर्वथा त्याज्य निश्चित कर दिया गया है। प्रायः चिताग्नि ही मास जलानेवाली होती है। जहाँ अपनी मृत्युसे मरे हुए मनुष्योंके अन्त्येष्टि-संस्कारमे उपयोग की हुई आगका भी बहिष्कार है, वहाँ पावन वेदीपर प्रतिष्ठापित विशुद्ध अग्निमें अपने मारे हुए पशुके होमका विधान कैसे हो सकता है? आज भी जब वेदीपर अग्निकी स्थापना होती है, तो उसमेंसे थोड़ी-सी आग निकालकर बाहर कर दी जाती है। इसलिये कि कहीं उसमें क्रव्याद (मास-भक्षी या मास जलानेवाली आग) के परमाणु न मिल गये हों। अतएव 'क्रव्यादामं त्यक्त्वा' (क्रव्यादका अंश निकालकर ही) होमकी विधि है। ऋग्वेदका वचन है— क्रव्यादमग्निं प्रहिणोमि दूरं यमराज्ञो गच्छतु रिप्रवाहः । इहैवायमितरो जातवेदा देवेभ्यो हव्यं वहतु प्रजानन् ॥ (ऋ० ७ । ६ । २१ । ९)
'मैं मास खाने या जलानेवाली आगको दूर हटाता हूँ, यह पापका भार ढोनेवाली है, अतः यमराजके घरमें जाय। इससे भिन्न जो ये दूसरे पवित्र और सर्वज्ञ अग्निदेव हैं, इनको ही यहाँ स्थापित करता हूँ। ये इस हविष्यको देवताओंके समीप पहुँचायें, क्योंकि ये सब देवताओंको जाननेवाले हैं।'
यजुर्वेदके अनेक मन्त्रोंमें भगवान्से प्रार्थना की गयी है कि वे हमारे पुत्रों, पशुओं—गाय और घोड़ोको हिंसाजनित मृत्युसे बचावें— 'मा नस्तनये मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः।'
कुछ मन्त्रोंके वाक्यांश इस प्रकार हैं— पशून् पाहि, गां मा हिंसी., अजा मा हिंसी, अविं मा हिंसी.। इमं मा हिंसीर्द्विपादं पशुम्, मा हिंसीरेकशफं पशुम्, मा हिंस्यात् सर्वा भूतानि ।
'पशुओंकी रक्षा करो।' 'गायको न मारो।' बकरी- को न मारो।' 'भेड़को न मारो।' 'इन दो पैरवाले प्राणियो- को न मारो।' 'एक खुरवाले घोड़े गधे आदि पशुओंको न मारो।' 'किसी भी प्राणीकी हिंसा न करो।'
ऋग्वेदमें तो यहाँतक कहा गया है कि जो राक्षस मनुष्य, घोड़े और गायका मास खाता हो तथा गायके दूध- को चुरा लेता हो, उसका मस्तक काट डालो— य पौरुषेयेण क्रविषा समङ्क्ते यो अश्व्येन पशुना यातुधानः । यो अघ्न्याया भरति क्षीरमग्ने तेषां शीर्षाणि हरसापि वृश्च ॥ (८ । ४ । ८ । १६)
अब प्रश्न होता है कि वेदमे यदि मासका वाचक या पशुहिंसाका बोधक कोई शब्द ही प्रयुक्त न हुआ होता तो कोई भी कैसे उस तरहका अर्थ निकाल सकता था ? इसके उत्तरमें हम महाभारतसे एक प्रसङ्ग उद्धृत कर देना चाहते है। एक बार ऋषियों तथा दूसरे लोगोंमें 'अज' शब्दके अर्थ- पर विवाद हुआ। एक पक्ष कहता था 'अजेन यष्टव्यम्' का अर्थ है "अन्नसे यज्ञ करना चाहिये। अजका अर्थ है— उत्पत्तिरहित, अन्नका बीज ही अनादि-परम्परासे चला आ रहा है, अतः वही 'अज' का मुख्य अर्थ है, इसकी उत्पत्तिका समय किसीको ज्ञात नहीं है, अतः वही अज है।" दूसरा पक्ष अजका अर्थ बकरा करता था। पहला पक्ष ऋषियोंका था। दोनों राजा वसुके पास निर्णय करानेके लिये गये। वसु अनेक यज्ञ कर चुका था। उसके किसी भी यज्ञमे मासका उपयोग नहीं हुआ था। वह सदा अन्नमय यज्ञ ही करता था, परन्तु म्लेच्छोंके संसर्गसे पीछे चलकर वह ऋषियोंका द्वेषी बन गया था। ऋषि उसकी बदली हुई मनोवृत्तिसे परिचित न थे। वे विश्वास करके गये। राजा सहसा निर्णय न दे सका। उसने पूछा 'किसका क्या पक्ष है?' जब उसे मालूम हुआ कि ऋषिलोग 'अज'का अर्थ अन्न करते हैं, तो उसने उनके विरोधी पक्षका ही समर्थन करते हुए कहा 'छागेनाजेन यष्टव्यम्।' असुर तो यह चाहते ही थे। वे उसके प्रचारक बन गये; परन्तु ऋषियोंने उस मतको ग्रहण नहीं किया; क्योंकि वह पूर्वोक्त चारो हेतुओंसे असङ्गत ठहरता है।
संस्कृत-वाङ्मयमें अनेकार्थक शब्द बहुत हैं। 'शब्दाः कामधेनव' यह प्रसिद्ध है। उनसे अनन्त अर्थोंका दोहन होता है। परंतु कौन-सा अर्थ कहाँ लेना ठीक है, इसका निश्चय विवेकशील विद्वान् ही कर सकते हैं। कोई यात्रापर जा रहा हो और सवारीके लिये 'सैन्धव' लानेका आदेश दे तो, उस समय नमक लानेवाला मनुष्य मूर्ख समझा जाता है, वहाँ सिन्धुदेशीय अश्व ही लाना उचित होगा। इसी प्रकार भोजनमे सैन्धव डालनेका आदेश देनेपर नमक ही डाला जायगा, अश्व नहीं। इसी प्रकार वेदके यज्ञ-प्रकरणमे आये हुए शब्दका वहाँके सात्त्विक वातावरणके अनुरूप ही अर्थ ठीक हो सकता है। जहाँ दवा बनानेके लिये 'प्रस्थं कुमारिकामासम्' की आज्ञा है, वहाँ सेरभर घीकुआरका गूदा ही डाला जायगा। कुमारी-कन्याका एक सेर मास डालनेकी बात तो कोई पिशाच ही सोच सकता है।
यज्ञमें पशु बाँधनेकी बात आती है। प्रश्न होता है, वह