भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 136, कुल 832 में से

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पृष्ठ 136

१२२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *

[बायाँ स्तम्भ]

क्रूरकर्मी बन जाते हैं और जगत्के विनाशमे ही कारण बनते हैं। वे अपने मनमे ऐसी-ऐसी कामनाएँ पालते हे, जो कभी पूर्ण न हो सके । वे दम्भ, मान और मदसे उन्मत्त होते हैं और मोहवश मिथ्या सिद्धान्तोंको ग्रहण करके भ्रष्टांचारसे संयुक्त हो स्वेच्छाचारपूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं। मरण- पर्यन्त अनन्त चिन्ताओंमे डूबे रहते हैं। सदा कामोपभोगमे संलग्न होकर—इतना ही सुख हे—ऐसा मानते रहते हैं। सैकड़ों आशाके वन्धनोंमें बँधकर, काम क्रोधपरायण हो, काम भोगके लिये ही वे अन्यायपूर्वक धनसचय करना चाहते हैं। आज यह पा लिया, कलको अमुक मनोरथ सिद्ध करूँगा, इतना धन तो मेरे पास है ही, फिर यह भी मेरा ही हो जायगा। अमुक शत्रुको तो मार डाला और दूसरे जो बचे हैं, उनका भी सफाया करके छोडूंगा। मेरी शक्ति किसीसे कम नहीं है—मै ईश्वर हूँ, मै भोगी हूँ, मैं सिद्ध, बलवान् और सुखी हूँ। धनी और जनताका नेता हूँ; ससारमे दूसरा कौन है जो मेरी बराबरी कर सके । मैं इच्छानुसार यज्ञ, दान और आनन्दोपभोग करूँगा। ये ही सब उनके मुखसे निकले हुए उद्‌गार हैं। वे अपने ही बड़प्पनकी डींग मारनेवाले, घमंडी तथा धन और मानके मदसे उन्मत्त होते हैं, और पाखण्डपूर्ण नाममात्रके यज्ञों- द्वारा अविधिपूर्वक यजन करते हैं। अहङ्कार, बल, दर्प, काम और क्रोधका आश्रय ले अपने और दूसरेके शरीरमें स्थित अन्तर्यामी परमेश्वरसे द्वेष करते और उनकी नित्य निन्दा करते हैं। तथा इसीलिये वे अन्ततोगत्वा बार-बार आसुरी योनि और नरकमे पड़ते हैं। (गीता अध्याय १६)

कहनेकी आवश्यकता नहीं कि प्राय. ऐसे आसुरी प्रकृतिके लोग ही मास और अश्लील सेवनकी रुचि रखते हैं और अधिकांशमे ऐसे ही लोगोने अर्थका अनर्थ करके सर्वत्र मद्य, मास और मैथुनकी प्रवृत्तियोको प्रसारित करने- की चेष्टाएँ की हं ।* कहा जाता है, वेदोंमे यज्ञके लिये


* यह सत्य है कि इधरके कुछ परम आदरणीय आचार्यों और महानुभावोंने भी किन्हीं-किन्हीं शब्दोंका मासपरक अर्थ किया है । इसका प्रधान कारण यह है कि उनमेसे अधिकांश परमार्थवादा महापुरुष थे । गूढ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विषयोंपर विशेष दृष्टि रखकर उनका विशद अर्थ करनेपर उनका जितना ध्यान था, उतना लौकिक विषयोंपर नहीं था। इसीसे उन्होंने ऐसे विषयोंका वही अर्थ लिख दिया जो देशकी परिस्थितिविशेषके कारण उस समय अधिकांशम प्रचलित था ।


[दायाँ स्तम्भ]

पशुहिंसाकी विधि है। अतः वेदोंका मान रखनेके लिये कुछ लोग 'वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति।' वेदविहित हिंसाका नाम हिंसा ही नहीं है, ऐसा कहा करते हैं। परंतु हिंसा हिंसा ही है, फिर वह चाहे कैसी ही हो। वेदोंकी तो यह स्पष्ट आज्ञा है—'मा हिंस्यात् सर्वां भूतानि।' (किसी भी प्राणीकी हिंसा न करे।) फिर वैदिकी हिंसा क्या वस्तु है। जगत्‌के प्राणियोंको कष्ट देनेवाले दस्युओं, आततायियो तथा पापियोंके लिये जो प्राणदण्डका आदेश मिलता है, वह हिंसा नही, दण्ड है। दण्ड अपराधीको ही दिया जाता है, निरपराधको नहीं। 'दस्युता', 'आततायीपन' अपराध है; अत. इनके लिये दण्डका औचित्य है, किंतु उन भेड़- बकरे आदि पशुओंका क्या अपराध है, जिनको दण्ड दिया जाय। वह भी यज्ञके नामपर। यज्ञ परमेश्वरकी आराधना है। परमेश्वर विश्वके पालक और शिवरूप हैं। अतः विश्वके संरक्षण और कल्याणमे योग देना ही परमेश्वरकी यथार्थ पूजा अथवा यज्ञ है। किसी निरपराध पशुके रक्त-माससे परमेश्वरको तृप्त करनेकी कल्पना कितनी बीभत्स है। यह तो—

मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ।

—के अनुसार स्पष्टतः ईश्वरद्रोह है। यह ईश्वरद्रोह ही जिनकी प्रकृति है, उन असुरोंने ही समय-समयपर वेदोंके अर्थोंको बदलनेकी चेष्टा की है। बृहदारण्यकोपनिषदमें प्रथम अध्यायके तृतीय ब्राह्मणमें कथा आती है कि प्रजापतिके ज्येष्ठ पुत्रों— देवताओंने 'वाक्' आदि प्राणोंसे कहा, 'तुम हमारे लिये उद्गान करो।' उन्होंने वैसा ही किया। तब असुरोंने समझा कि इस प्रकार तो ये देवता हमे पराजित ही कर देंगे, अतः उन्होंने उन वाक् आदिको पापसे विद्ध कर दिया—'पाप्मना- विध्यन्।' इससे उनमे असत्य-भाषण आदिका दोष आ गया। जो असुर हमारी इन्द्रियोंपर भी अपने सस्कार डाल सकते है, उन्होंने ग्रन्थोंमें कुछ मिलानेकी चेष्टा की हो तो क्या आश्चर्य। इसीलिये कहा जाता है कि मास खानेकी प्रवृत्ति मनुष्यमें स्वाभाविक नहीं; यह तो निशाचरोंके प्रयत्नमे हुई है—

मासाना खादन तद्बन्निशाचरसमीरितम् ।

महाभारत अनुशासनपर्वमे कहा गया है कि प्राचीन कालमें मनुष्योंके यज्ञ-यागादि केवल अन्नसे ही हुआ करते थे। मद्य-मास आदिकी प्रथा तो पीछेसे धूर्त असुरोंने चला