कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 135, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंवेदों और उपनिषदोंमें मांस-भक्षण और अश्लीलता नहीं है ( लेखक—पाण्डेय पं० श्रीरामनायणदत्तजी शास्त्री 'राम' )
वेद अपौरुषेय हे—परमात्माके निःश्वासरूप हैं। वे ज्ञानके अक्षय एव अगाध भण्डार हैं। वेदवेद्य परमात्मा और वेद दोनो ही 'ब्रह्म' नामसे प्रतिपादित होते हैं। वेद ज्ञानमय हैं और ज्ञान ही ब्रह्मका स्वरूप है। अतः वेद ब्रह्मसे भिन्न नहीं हैं। ब्रह्मके लिये विज्ञान, आनन्द, सत्य एव अनन्त आदि विशेषण प्रयुक्त होते हैं, ये सभी वेदमे भी गतार्थ हो जाते हैं। यद्यपि ब्रह्म निर्विशेष है—अनिर्वचनीय है, तथापि जब हम वाणीद्वारा उसके स्वरूपके सम्बन्धमें कुछ कहने- को प्रस्तुत होते हैं, तब हम उसे सविशेष कर ही देते हैं। यह ब्रह्मकी न्यूनता नहीं, हमारी अपनी असमर्थता है। जैसे ब्रह्म अनवद्य और अनामय है, वैसे ही वेद भी हैं; अतः वेदमें कोई ऐसी बात नहीं हो सकती जो मनुष्यके लिये परम कल्याणमयी न हो। जब ब्रह्म ही शान्त और शिवरूप है तब उसीका ज्ञान वेद अशिवरूप कैसे हो सकता है ? वेदका शिरोभाग है उपनिषद्, जो केवल ज्ञानप्रधान होनेसे 'ज्ञानकाण्ड' कहलाती है। वेदोंका अन्त अथवा वेदोंका चरम सिद्धान्तरूप होनेसे उपनिषद्को वेदान्त शास्त्र भी कहते हे। जीवमात्रके अकारण सुहृद् परमात्माने अपने स्वरूपभूत वैदिक ज्ञानका आलोक इसीलिये प्रकाशित किया कि सब लोग इस तमोमय जगत्से निकलकर प्रकाशमय परमात्मपदकी ओर बढ़ें। असत्से सत्की ओर और मृत्युसे अमृतपदकी ओर प्रगति कर सकें। इतनेपर भी कुछ लोगोंने वेदोंपर लाञ्छन लगानेकी चेष्टाएँ की हैं, उनपर दोषारोपणका दुःसाहस किया है। उनकी समझमें वेदोंसे मास-भक्षणकी प्रवृत्तिको प्रोत्साहन मिलता है और वेदोंमें उन्हें अश्लीलता भी दिखायी देती है। यह तो निर्विवाद सिद्ध है कि प्रकाशमे तम नहीं रह सकता। फिर भी, जब हम प्रकाशमें खड़े होते हैं तो हमें वहाँ अपनी ही छाया दीख पड़ती है। निर्मल जल या स्वच्छ दर्पणमें निकटसे देखनेपर हमे अपने ही प्रतिबिम्बका दर्शन होता है। यदि हम उस काली छायाको भी प्रकाशका अङ्ग तथा प्रतिबिम्बको भी जल और दर्पणका अवयवविभाग मान लें तो इससे हमारे ही अज्ञानका परिचय मिलेगा, इससे उन प्रकाशादि वस्तुओंकी निर्मलतामें दोष नहीं आ सकता। यही दशा उपर्युक्त आरोपोंकी भी है। वेदोंमें न मासकी विधि है, न अश्लीलताका नग्न चित्रण ही। यह सब हमे अपने परिवर्तित दृष्टिकोणके कारण दृष्टिगोचर होता है। जैसे सब प्रकारकी आसक्तियोंके त्यागपूर्वक भगवान्के अनन्यशरण होनेसे ही श्रद्धालु भक्तको उनके यथार्थ तत्त्वका बोध या साक्षात् उनके स्वरूपकी प्राप्ति होती है, उसी प्रकार मत-मतान्तरोंके आग्रहसे रहित हो भक्तिभावसे वेद भगवान्- की शरणमे जानेमे ही वेदके यथार्थ तत्त्वकी उपलब्धि हो सकती है। 'यमेवैष वृणुते तेन लभ्य'—'वेद अथवा भगवान् स्वय ही दया करके जिसे अपना ले, उसीको वे प्राप्त होते हैं।' अतः केवल मेधावी पण्डित होनेसे या बहुतसे शास्त्रोंका अध्ययन कर लेनमात्रसे अहङ्कारवश कोई वेदके यथार्थ तत्त्वको पूर्णतया नहीं जान सकता—'न मेधया न बहुना श्रुतेन ।' मनुष्योंमें अनेक प्रकृतिके लोग होते हैं, गीतामे उनको दो भागोंमें विभक्त किया गया है—एक दैवी प्रकृति और दूसरी आसुरी प्रकृति— द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च। भयका अभाव, अन्तःकरणकी स्वच्छता, तत्त्वज्ञानके लिये ध्यानयोगम निरन्तर स्थिति, दान, इन्द्रियसंयम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप, सरलता, अहिंसा, सत्य, क्रोधका अभाव, त्याग, शान्ति, चुगली न खाना, समस्त प्राणियोंपर दया, अलोलुपता, मृदुता, लज्जा, अचञ्चलता, तेज, क्षमा, धृति, शौच, कहीं भी वैरभाव न होना तथा अभिमानका अभाव— ये सब दैवी प्रकृतिके लोगोंमें विकसित होनेवाले सद्गुण हैं। आसुरी प्रकृतिके लोग इनसे सर्वथा विपरीत होते हैं। कौन-सा काम करना चाहिये और कौन-सा नहीं—हम किसमे लगें और किस कार्यसे अलग रहें—इन सब बातोंको वे बिल्कुल नही समझते। शौच, सदाचार और सत्य तो उनमे रहता ही नहीं। वे जगत्को बिना ईश्वरके ही उत्पन्न हुआ मानते हैं। इसके मूलमें कोई सत्य है, इसका कोई नित्य चेतन आधार है—इन सब बातोंको वे नहीं स्वीकार करते। उनकी समझमे केवल काम ही इस जगत्का हेतु है और यह स्त्री- पुरुषके संयोगसे ही सतत उत्पन्न होता है। इस मिथ्या ज्ञान- का आश्रय लेनेसे उनका सस्वरूप आत्मा तिरोहित-सा हो जाता है, वे अल्पबुद्धि होनेके कारण सबका अहित करनेवाले
उ० अं० १६—