भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 134, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 134

१२० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *

अवश्य ही मैत्र्युपनिषद् (६।१४) मे ज्योतिष सम्बन्धी 'मघाद्य श्रविष्ठार्द्धम्'के रूपमें दक्षिणायनका वर्णन आया है, जिससे यह सिद्ध होता है कि उस समय आधे धनिष्ठासे उत्तरायण (मकरका आरम्भ) होता था । स्व० बा० लोकमान्यतिलकने गीतारहस्य (पृ० ५५२) मे लिखा है कि 'मैत्र्युपनिषद् ईसाके पहले १८८० से १६८० वर्षके बीच कभी न-कभी बना होगा । क्योंकि लोकमान्यके मतसे वेदाङ्ग ज्योतिष- कालका उदगयन, मैत्र्युपनिषद् कालीन उदगयनकी अपेक्षा लगभग आधे नक्षत्रसे पीछे हट आया था । ज्योतिर्गणितसे यह सिद्ध होता है कि वेदाङ्ग ज्योतिषमे कही गयी उदगयन स्थिति ईसाई सनके लगभग १२०० या १४०० वर्ष पहलेकी है' (गीतारहस्य पृ० ५५२) । साराश यह कि लोकमान्यके मतसे मैत्र्युपनिषद् ग्रन्थका रचनाकाल, ईसासे पूर्व कम से-कम १२०० वर्ष सिद्ध होता है । मैत्र्युपनिषद् ग्रन्थमे अनेक स्थलोमे छान्दोग्य, बृहदारण्यक, तैत्तिरीय, कठ और ईशावास्य-उपनिषदोंके वाक्य तथा श्लोक प्रमाणार्थ उद्धृत किये गये हैं । अतएव यह स्वयंसिद्ध है कि छान्दोग्य, बृहदारण्यक, तैत्तिरीय, कठ और ईशावास्य उपनिषद्ग्रन्थ ईसाके पूर्व १२०० १४०० वर्ष (मैत्र्युपनिषद् ग्रन्थ रचनाकाल) के भी बहुत पहलेके हैं । अवश्य ही ज्योतिप्रगणितके अनुसार लोकमान्यतिलकने जो समय निश्चित किये हैं, वे समय वस्तुत निश्चित ही है—यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि आधुनिक गणितज्ञोंके मतमे ज्योतिषकी वही स्थिति जो मेन्युपनिषद् ग्रन्थमे कही गयी है—आधे धनिष्ठासे उत्तरायणका आरम्भ, ईसासे पूर्व जिस प्रकार १८८० १६८० वर्ष पूर्व हुई होगी, ठीक उसी प्रकारकी स्थिति ईसासे २७८८० २७१६८० वर्ष पूर्व भी थी और उसके पूर्व भी २६००० २६००० वर्ष पूर्व होती रही है। अतएव हम इस बातको माननेके लिये बाध्य नहीं कि हमारे वैदिक साहित्यके शिरोभाग उपनिषद् ग्रन्थ ईसासे पूर्व १८८०-१६८० वर्षमे ही रचे गये है । अवश्य ही जिन पाश्चात्य विद्वानोंके धर्म-ग्रन्थानुसार मानव सृष्टिका आरम्भ ही ईसासे पूर्व लगभग ४००० वर्षसे माना जाता है, वे उपनिषद्-ग्रन्थोंके उत्तरायण- वर्णनसे अन्तिम काल ईसासे पूर्व १८८०-१६८० उपनिषद्- ग्रन्थोंका रचनाकाल मानें तो इसमें आश्चर्यकी बात नहीं है, किंतु वैदिकधर्मके माननेवाले भारतवासी हम जिनके सृष्टिका आरम्भकाल इस समय विक्रम संवत् २००५ के १९५५८८५०४९ वर्ष पूर्व माना गया है, और जिनके सिद्धान्त ज्योतिषके गणित सहस्र चतुर्युगीय कल्पके आधारपर किये गये हैं, अपने उपनिषद्-ग्रन्थोंका रचनाकाल नही, आविर्भावकाल उस समयको मानेंगे जो मघा-नक्षत्रसे दक्षिणायन और आधे वनिष्ठा नक्षत्रसे उत्तरायणका समय वर्तमान सृष्टिमें (जिसके छः मन्वन्तर बीत चुके हैं और सातवें मन्वन्तरके अठाईसवें कलियुगके ५०४९ वर्ष भी बीत चुके हैं) सबसे प्रथम आया होगा । साराश यह कि हमारे उपनिषद् ग्रन्थोका रचनाकाल, आधुनिक गणितज्ञोंके गणितसे ही अतिप्राचीन सिद्ध होता है और यदि पुरातत्त्वज्ञानके प्रचारसे पाश्चात्य विद्वानोको अपने मानव-सृष्टिकालके आरम्भकालकी त्रुटि विदित हो गयी और वैदिक सृष्टिकी ओरसे अविश्वास हट गया तो वे भी यह बात मान लेंगे कि हमारे वैदिक साहित्यके शिरोभाग-उपनिषद् ग्रन्थो का रचनाकाल शताब्दियोंमे नहीं गिना जा सकता । हम आशा करेंगे कि पक्षपात और धर्मविरोधी भावनाको त्यागकर ऐतिहासिक जन हमारे इस विचारकी ओर अवश्य ध्यान देंगे कि उपनिषदग्रन्थोंके समय निरूपणमें सबसे प्रथम धनिष्ठार्द्धके उत्तरायणको न मानकर सबसे अन्तके धनिष्ठार्द्धके उत्तरायण- को माननेके लिये क्या कोई प्रमाण है ? और यदि नहीं तो, हमारा मत अवश्य सर्वमान्य होना चाहिये ।

औपनिषद सिद्धान्त

ब्रह्म, सगुण, निर्गुण तथा निराकार, साकार । परमात्मा, परमेश, विभु, विश्व, विश्व आधार ॥ प्रणव, यज्ञ, यज्ञेश, सब प्रकृति, पुरुष, पर, वेद । भेदरहित, नित भेदमय, संयुत भेदाभेद ॥ सर्वरूप, शुचि, सर्वमय, शाश्वत, सर्वातीत । शुद्ध सत्त्व, पुनित्रिगुणमय, यद्यपि त्रिगुणातीत ॥ नारायण, नरसिंह, श्रीकृष्ण, राम, गोपाल । सूर्य, शक्ति, गणनाय, शिव, रुद्र, स्वयम्भू, काल ॥ नाम-रूप-लीला विविध तत्त्व एक वेदान्त । वाणी-मन-मतिसे परे औपनिषद सिद्धान्त ॥