कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 133, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें~ उपनिषद्-ग्रन्थोंका रचनाकाल * ११९
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिता । अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥ ( कठोपनिषद् २ । ३ । १४ )
आत्माके लिये शरीर है, न कि शरीरके लिये आत्मा । शरीर तो आत्माकी गति (ऊर्ध्वगति या अधोगति) के लिये एक साधन है । इसका उपयोग करनेवाला इससे भिन्न है ।
आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु । बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मन प्रग्रहमेव च ॥
नचिकेता, जाबाल आदिकी अनेक कथाओंसे उपनिषदोंकी प्रभावक्ता और भी अधिक बढ़ी हुई है । ये सुन्दर, सरल और हृदयस्पर्शी कथाएँ जिस मार्मिक प्राचीन कालकी घटनाओंका वर्णन करती हैं, उसे मानो हजारो और लाखो वर्षोंके व्यवधानको दूर करती हुई आँखोंके सामने ले आती ह और उसकी पवित्रताकी सुगन्ध हृदयमे भर देती हैं ।
उच्च आध्यात्मिक ज्ञानके विषयवाले होनेपर भी उपनिषदोंके अनेक वाक्य निम्नस्तरके दैनिक जीवनके लिये भी अत्युपयोगी हैं । 'तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृध कस्यस्विद्धनम्' 'मा विद्विषावहै' आदि वचनोंके अनुसरणकी वर्तमान जगत्के हित, सुख तथा रक्षाके लिये कितनी आवश्यकता है, यह सूर्य प्रकाशवत् इतना सुस्पष्ट है कि इसको बतानेकी आवश्यकता नहीं है ।
उपनिषद्-ग्रन्थोंका रचनाकाल
(लेखक---ज्यो० भू०प० श्रीइन्द्रनारायणणी द्विवेदी )
संस्कृत साहित्यमे उपनिषद् ग्रन्थोका स्थान बहुत ऊँचा है । यहाँतक कि वेदोंके शिरोभागके नामसे उपनिषदोंका परिचय दिया जाता है और अध्यात्मज्ञानके लिये उपनिषद्-ग्रन्थ ही एकमात्र साधन हैं । वेदान्तसूत्र और श्रीमद्भगवद्गीता आदि समस्त गीताएँ उपनिषदोंके ही ज्ञानरत्नोंसे परिपूर्ण हैं । अवश्य ही हमारे उपनिषद् ग्रन्थोंमे सबम अधिक मान उन उपनिषदोंका है जो संहिता अथवा ब्राह्मणरूप वेदाके अन्तर्गत हैं, किंतु उन उपनिषदोंका भी मान है, जिनके मूल वेद और ब्राह्मणके उपलब्ध भागोंमे हमको वर्तमान समयम नहीं मिलते और वदानुयायी पौराणिक साहित्यमे जिनके प्रमाण मिलते हैं । ये सब उपनिषद् ग्रन्थ, संस्कृत-साहित्यमे हम भारतीयोंके ज्ञानकाण्डके भण्डार माने जाते हैं ।
हमारे उपनिषद् ग्रन्थोंका इस प्रकार मान देखकर किसी चाटुकारने अकबरके समयमे 'अल्लोपनिषद्' नामकी एक छोटी सी पुस्तिका लिखी थी, जिसमे अरबी और संस्कृतकी मिश्रित भाषामे दम गद्य ह और रसूल, महम्मद, अकबर आदि शब्द आये हैं, किंतु इतने स्पष्ट प्रमाणोंके होते हुए भी इस समयके एक इतिहासके विद्वानके मुखसे उसकी गणना वैदिक साहित्यम कराके मुसलमानोंके पुष्टीकरणकी नीतिमे चाटुकारी दोहगयी गयी हैं--यह कितन आश्चर्यकी बात है । इतना ही नहीं, हमारे उपनिषद् ग्रन्थाकी ओरसे श्रद्धा हटाने के अभिप्रायम प्रो० मेक्समुलर जैसे विद्वानने एक 'मक्सोपनिषद्' नामकी पुस्तिका रची थी और लोगोंके आपत्ति करनेपर प्रोफेसर माहबने लिखा था कि हमन मजाकके तौरपर इसकी रचना की है । प्रोफेसर माहवका वह पत्र 'सरस्वती' मासिक पत्रिका (प्रयाग) मे छपा था । सम्भवत उसी प्रकार दूसरे चाटुकार, मज़ाकी अथवा अपने धार्मिक मतके समर्थनमे उपनिषद्नामसे कुछ पुस्तके लिखनेकी चेष्टा करनेवाले और भी हुए हो अथवा भविष्यम हो, जिनकी रचनाम लोगोंको उपनिषद् ग्रन्थोंके विषयम सन्देह हो । अतएव केवल उपनिषद् नामपर नहीं--उसके आधार ओर ज्ञानोपदेशपर विचार करके हमको निश्चय करना चाहिये कि ये ग्रन्थ वस्तुत उपनिषद्-ग्रन्थ हैं अथवा चाटुकारों और धूर्ताकी कपोल-कल्पना है ।
जिन उपनिषद् ग्रन्थोंका हमारे संस्कृत साहित्यम सर्वोच्य स्थान है और जिनका अस्तित्व हमारे वैदिक साहित्यमे उपलब्ध है, आज हम उन्हीं उपनिषद् ग्रन्थोंके रचना कालपर विचार करना चाहते हैं । मैत्रायणीशाखामे अपाणिनीय शब्दोंको देखकर कुछ लोगोंका मत है कि वह शाखा पाणिनिके पूर्वकी है । अतएव मैत्र्युपनिषद् भी पाणिनिके पूर्वकालकी है, किंतु भाषातत्त्वके विद्वानांके इस मतसे हम सहमत नहीं कि किसी ग्रन्थमे अपाणिनीय शब्दके प्रयोगसे उसको हम पाणिनिसे पूर्वका ग्रन्थ मान लें, अथवा उसके आधारपर पाणिनिके समयको हम पीछे हटानेकी चेष्टा करें, क्योकि संस्कृत-साहित्यमें न जाने कितने आधुनिक ग्रन्थ भी ऐसे हैं, जिनमें अपाणिनीय शब्दोंके प्रयोग अधिकतामे मिलते हैं ।