भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 132

११८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * न तेन हे अर्थात् तू अमनुष्य नहीं है।' इस प्रकार विज्ञ युष्मद्भाग अमनुष्य प्रतिषेधरूपसे 'तू मनुष्य है' यह समझाया जा सकता है किंतु वह मुग्ध पुरुष यदि समझदार होगा तभी समझ सकेगा न कि मुग्धावस्थासे । इसी प्रकार 'नेति' शास्त्र मसारकी दृश्य सकल वस्तुओ- का प्रतिषेध करते हुए ब्रह्मस्वरूपका परिचय कराते हैं। किंतु इन वाद्योंसे आत्मावबोध अन्तःशुद्धि होनेपर ही होगा, १ कि उम मुग्ध पुरुषकी तरह जिसे 'तू अमनुष्य नहीं' यह कहनेपर तो क्या, किंतु 'तू मनुष्य है' यह कहनेपर भी बोध नहीं हो पाता, अपवित्र रहनपर । इस प्रकार पूर्व शङ्का-समाधानोंसे औपनिषद आत्मतत्त्वका सक्षिप्त परिचय कराया जा सकता है। वस्तुत वह अससारी, अनिर्वचनीय अद्वितीय हे । लेखके क्लेवरवृद्धिके भयसे इस विषयको यहीं समाप्त किया जाता है। यदि इस लेखके द्वारा पाठकोंका किञ्चिन्मात्र भी लाभ होगा तो लेखक अपना परिश्रम सफल समझेगा । उपनिषदोंका महत्त्व और उद्देश्य ( लेखक—श्रीताराचन्द्रजी पाण्ड्या, बी० ए० ) वेदोंके कर्मकाण्ड-भागकी तो गीताने अप्रशंसा-सी ही की है ( श्रीमद्भगवद्गीता २ । ४२-४५, ९ । २०-२१), परन्तु उपनिषदोंसे ही तो गीताकी उत्पत्ति हुई है—वह उपनिषद्- रूपी गायोंका दूध है और जैसा कि गीताके प्रत्येक अध्यायको समाप्त करनेवाले शब्दोंसे सूचित है, गीता स्वय भी एक उपनिषद् है। उपनिषदोंके अनेक मन्त्र प्राय' ज्यो के त्यो गीतामें गुम्फित हे । अशाश्वत, जड, परम्परूप सासारिक पदार्थोंको छोड़कर शाश्वत, विज्ञानघन आनन्दमय, निजस्वरूप आत्माको पहचाननेका और उसमे तन्मय हो जानेका जो दिव्य और सनातन ज्ञान आदिम कालमे उद्भूत—अवतरित—हुआ था, वह उपनिषद्दोमे निहित है। उपनिषदोंका लक्ष्य है—'आत्मान विद्धि'—आत्माको-अपने आपको जानो-पहचानो। जो इस आत्माको नहीं जानते और उसके स्वरूपसे विमुख रहते हैं। वे आत्मघाती हैं, उनकी अधोगति होती हे— असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृता । ताँस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जना. ॥ ( ईशावास्योपनिषद् ३ ) आत्मज्ञानको ही विद्या माना है और शेषको अविद्या। अविद्यामे मोहजनक विनश्वर लौकिक सुख भले ही प्राप्त हो जायँ, परन्तु अनन्त और वास्तविक आनन्द (अमृतत्व) तो विद्यासे ही उपलब्ध हो सकता है। जो विद्यासे रहित है, वह न तो म्वय कल्याण पथपर चल सकता है और न दूसरोंका ही मार्ग-प्रदर्शन कर सकता है— अविद्यायामन्तरे वर्तमाना स्वयं धीरा पण्डितम्मन्यमाना। दन्द्रम्यमाणा परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धा ॥ ( कठोपनिषद् १ । २ । ५) किंतु विद्या वही सुफल दे सकती है जो सच्ची और हार्दिक हो; मिथ्या या कपटपूर्ण (Hypocritical) होने- पर तो वह विद्या (या विद्याभास) अविद्यासे भी अधिक अनर्थकारिणी हो जाती है— अन्धं तम प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ विद्याया ँरता. ॥ ( ईशावास्योपनिषद् ९ ) विद्या श्रेय है और अविद्या प्रेय है। प्रेयसे श्रेय अधिक उपादेय है। जो विद्या और अविद्याकी भिन्न-भिन्न सिद्धियोंको समझता है और अपने उच्चतर एव एकमात्र लक्ष्य आत्मो- पलब्धिसे च्युत नहीं होता, वह दोनोंका सदुपयोग करके लाभ उठा सकता है अर्थात् अविद्यासे मृत्यु अर्थात् लौकिक कष्टोको दूर करके और इस प्रकार अपेक्षाकृत सुखपूर्वक विद्याका साधन करके अमृतत्वको प्राप्त कर सकता है— अविद्यया मृत्यु तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते । ( ईशावास्यो० १४) परतु यथार्थ और एकमात्र उद्देश्य तो अमृतत्वकी प्राप्ति ही रखना चाहिये और अन्य सब कामनाओंको हेय ही समझना चाहिये । पराच कामाननुयन्ति बाला- स्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम् । अथ धीरा अमृतत्व विदित्वा ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते ॥ ( कठोपनिषद् २ । १ । २)