भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 131, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 131
  • औपनिषद आत्मतत्त्व * ११७

३ प्राज्ञ-सुषुप्तावस्थामे जिसे कुछ भी भान नहीं होता है । ( माण्डूक्योपनिषद् ) ४ तुरीय-सर्वथा ईश्वर सर्वज्ञ अन्तर्यामी चतुर्थ है । ( माण्डूक्योपनिषद् )

जब कि आत्माके ये भेद उपलब्ध हैं, तो एकात्मवाद ( अद्वैत ) कैसे समझा जाय ? यदि कहा जाय कि— 'तत्सत्यम् ... स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो'

इस छान्दोग्योपनिषद्मे तत्=ब्रह्मके साथ 'त्वम्' पदार्थ जीवका अभेद बताया है, तो द्वैत कैसे माना जाय ? ठीक है, किंतु यह अर्थ ठीक नहीं है। तत् शब्द सत्यका परामर्श करता है और 'तत्त्वमसि'का प्रसङ्गसे यही अर्थ होगा कि—'हे श्वेतकेतो ! तू सत्य है, तेरे बिना यह शरीर आदि सब शून्य हैं। अब अद्वैत कैसे माना जाय ?'

यदि कहा जाय कि—'एकमेवाद्वितीयम्' यहाँ अद्वितीय तत्त्वका उल्लेख है, तो फिर जीव भिन्न कहाँसे रहेंगे ? यह भी ठीक नहीं। यहाँ 'एक' शब्दसे एक जातीय भी ले सकते हैं, जैसे समस्त घट एकजातीय मृत्तिकासे जायमान हैं न कि एक ही मृत्तिकासे समस्त घट बनें । यह अनुचित भी है, क्योंकि एक ही मृत्तिकासे नाना घट कैसे बन सकते हैं ?

उत्तरपक्ष—पूर्वोक्त विषय उपनिषत्-सिद्धान्तके प्रतिकूल है तथा आपातरमणीय भी है। जो हमें प्रति शरीरमें आत्मभेदको अनुभव होता है वह शरीरके भेदसे ही है, जैसा कि एक ही आकाशके घट, मठ आदि उपाधि-भेदसे भेद व्यवहारमें आता है, वस्तुतः भेद नहीं होता है ।

जो यह कहा गया कि विपरीत गुणोंका समावेश कैसे ? उसका उत्तर पहले ही दिया जा चुका है कि आत्मा निर्गुण है। सभी गुण अन्तःकरणके ही आत्मामें प्रतिफलित होते हैं। आत्माके लिये कहा गया है कि 'असङ्गो हि सः' ( वह असङ्ग=गुणादि धर्मरहित है । ) बृहदारण्यकोपनिषद्में कहा है कि—

'कामो विचिकित्सा धीर्ह्रीरित्येतत्सर्वं मन एव ।'

इससे यह सिद्ध है कि—आत्मामें ये सब धर्म नहीं हैं, सुख-दुःखादि सब गुण अन्तःकरणमें ही हैं।

'द्वा सुपर्णा' आदि वाक्योंमें जो जीवेश्वर-भेदकी कल्पना बतलायी है, वह भी औपचारिक है, वास्तविक नहीं है ।

कर्ता, ईश्वर, असंसारी, प्राज्ञ, विश्व, तैजस, तुरीय आदि एक ही आत्माकी औपाधिक दशाएं हैं, न कि इन नामवाले कोई भिन्न आत्मा हैं ।

तत्सत्यम् ... ... स आत्मा तत्त्वमसि ।' —का जो आधुनिक आर्यजन अर्थ करते हैं, वह ठीक नहीं है, क्योंकि उससे प्रकरणसङ्गति नहीं बैठती ।

तत् सत्यम्=वह ब्रह्म सत्य है ( असत्यव्यावृत्त है ) । स आत्मा=वही ब्रह्म आत्मा है । तत्त्वम्=तुम भी वही ब्रह्म हो, तत् शब्दसे विशेषणवाचक सत्यका परामर्श करना अनुचित है । इससे जीवब्रह्मैक्य सिद्ध है ।

'एकमेवाद्वितीयम्' यहाँ 'एक' शब्दका अर्थ 'कैवल्य' है, जो कि 'सजातीय, विजातीय और स्वगतभेदशून्य' अर्थमें आता है । यदि पूर्वोक्त ही अर्थ माना जाय तो 'नेह नानास्ति किञ्चन' इत्यादि वचन भी असङ्गत होंगे । निम्नलिखित वाक्योंसे भी अद्वैत कथित है—

'यथाग्ने क्षुद्रा स्फुलिङ्गा व्युच्चरन्ति, एवमेवा- स्मादात्मन सर्वे आत्मानो व्युच्चरन्ति ।' ( बृहदारण्यकोपनिषद् )

प्रथमावस्थामें एक ही आत्मतत्त्व है और उसीके समस्त अग्निकणके समान भेद है ।

'सदेव सोम्येदमग्र आसीत् ।' ( छान्दोग्योपनिषद् ) 'ऐतदात्म्यमिदं सर्वम् ।' ( ,, ) 'अहं ब्रह्मास्मि ।' ( ,, ) 'अयमात्मा ब्रह्म ।' ( ,, )

इन वाक्योंसे जीव और ब्रह्मकी वास्तविक एकता स्फुट ही है ।

✕ ✕ ✕

'नेति' 'यतो वाचो निवर्तन्ते' आदि वाक्योंसे भी पूर्वोक्त अद्वितीय आत्मतत्त्व ही प्रतिपाद्य है । जैसे—एक अपराधी मुग्ध-पुरुषसे उसका स्वामी कह दे कि 'तुझे धिक्कार है, तू मनुष्य नहीं है।' यह सुनकर मुग्ध पुरुष सन्दिग्ध होकर अन्य किसी विज्ञके पास जाकर अपने स्वरूपके सम्बन्धमें पूछने लगे कि 'कृपया मुझे बतलाइये मैं कौन हूँ ।' वह विज्ञ पुरुष उसकी मुग्धतापर मन ही मन हँसकर उससे कहेगा कि—'मै क्रमशः तुझे समझा दूँगा।' इतना कहकर वह विज्ञ पुरुष मुग्ध पुरुषको समझायेगा कि 'तू घट, पट, पृथिवी, शरीर आदि नहीं है, न पाषाण है, न जल है और