भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 130

११६ ४ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि वह अनेकोंमे एकता देखना चाहता है। अनेक वस्तुओंका भी किसी रूपसे एकीकरण चाहता है। उदाहरणके रूपमे देखिये- राम, शिव, यज्ञदत्त, देवदत्त नामके व्यक्ति जब हमारे सम्मुख आते हैं तो हमारे अन्तस्तलमे प्रश्न उपस्थित होता है कि 'ये भिन्न ही हैं कि या किसी रूपसे एक भी हैं ?' उत्तर मिलेगा-'ये सब पुरुष ह।' इसी प्रकार सीता, सावित्री, गोमती, रम्भा आदिमें भी शङ्का होगी। फलतः स्त्रीरूपमे उन्हें एक मान सकते हैं। इन स्त्री पुरुषसमुदायम भी मनुष्यत्वेन एकता मिलती है। यह मनुष्यसमूह, दूसरी ओर पशुसमूह, अन्य पक्षिसमूह और कुक्कुरसमूह-इनमे यदि भेद-शङ्का हो तो उसका समाधान है-'ये सब सजीव हं', अर्थात् प्राणित्वेन ( आत्मत्वेन ) सबको एक कहेंगे। इस ओर आत्मा है, कुछ जड़ पदार्थ भी हैं, इनमें भेदाभेद विचारमे ही समस्त दार्शनिकोंका मस्तिष्क स्फोट है। कोई भी इनका एकीकरण नहीं कर पाते तथा जडोंके लिये एक प्रकृति-तत्त्व पृथक् भी मानते हैं, किंतु उपनिषद्की विचारधारामें-इसमे सन्तोष करना उचित नही माना गया तथा जड और आत्मा-इनमे भी एकताका अनुभव चाहा और सकल जडकोभी 'आत्मैवेदमग्र आसीत्' कहकर आत्मामें समाविष्ट किया गया। इस प्रकार आत्मा एक ही मूल कारण सिद्ध हुआ, यह श्रुति सिद्धान्त ही नही, बल्कि युक्तियुक्त भी है। जैसा कि पूर्वमे आत्माको कारण सिद्ध किया जा चुका है। लोक- व्यवहारमे भी यह 'न्यूनतम कारणवाद' (Law of parsimony of causes) तथा सृष्टिकी मितव्ययिता (Law of economy of nature) प्रसिद्ध ही है। हम किसी कार्यकी उत्पत्ति यदि स्वल्प कारणोंसे कर सके तो अधिक एकत्रित ( सामग्री) करना उचित नहीं मानते। प्रत्युत ऐसा करनेवालेको 'अविद्वान्' कहते हैं। इस प्रकार आत्मतत्त्व ही केवल जगत्का उपादान माना जाय, यह श्रुतिसम्मत ही नहीं, प्रत्युत युक्तिसम्मत भी है। ७. आत्मा और जीवमें अद्वैत उपनिषत्प्रतिपाद्य आत्मतत्त्वका उसके कार्यभूत जगत्से तथा जीवमे भेद है अथवा अभेद ? इस दिशामे उपनिषत्- सिद्धान्त तो यही है कि आत्मतत्त्व और जीवतत्त्व-इनमें भेद नहीं है और जगत् भी उसमे वस्तुत भिन्न नहीं है। इस विषयमें महान् मतभेद हैं- पूर्वपक्ष-कुछ दार्शनिक प्रत्येक शरीरमे भिन्न-भिन्न आत्मा हैं और ईश्वर नहीं है, ऐसा मानते हैं। उनका कहना है कि यदि आत्मा एक हो तो एक ही आत्मामे एक काल- में भिन्न-भिन्न विरोधी गुण कैसे आ सकते हैं। कुछ अन्य दार्शनिक ईश्वरको मानते हुए भी आत्माओंसे उसी प्रकार भिन्न मानते हैं, जिस प्रकार आत्माएँ सब परस्पर भिन्न हैं। मुण्डकोपनिषद्में कहा है कि- 'द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया' (३।१।१) यहाँपर ईश्वर और जीवके अभिप्रायसे ही 'द्वि' शब्दका प्रयोग किया गया है। 'निरञ्जन' परम साम्यमुपैति' आत्मा निरञ्जन होकर परमेश्वरकी समानता प्राप्त करता है। वह समानता दो भिन्न तत्त्वोंके ही व्यवहारमें आ सकती है। ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे। छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः ॥ (कठोपनिषद् १।३।१) संसारमे सुकृतके फलका पान करते हुए यद्यपि जीव और ईश्वर-ये दोनों ही फल पान नहीं करते, तथापि जीवसे सम्बन्ध होनेके कारण 'पिबन्तौ' कहा है। छाया तथा आतपके समान विलक्षण अर्थात् जीव संसारी और ईश्वर असंसारी है-ऐसा ब्रह्मज्ञजन कहते हैं। इस अर्थमें जीवेश्वर-भेद स्फुट बतलाया है। X X X इसी प्रकार अन्य उपनिषदोंमें भी अनेक प्रकारसे आत्मतत्त्वका निर्देश है। १ कर्ता भोक्ता संसारी पुरुष है। २ साक्षी जीव कर्मफलदाता ईश्वर है। ३ 'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह, नेति नेति' आदि वचनोंसे बोध्य असंसारी आत्मा। (ऐतरेयोपनिषद्- शाङ्करभाष्यके अनुसार) X X X १. विश्व-जागरितावस्थामें जिसको बाह्यका ज्ञान होता है। (माण्डूक्योपनिषद्) २ तैजस-स्वप्नावस्थामें जिसको आभ्यन्तरका ज्ञान होता है। (माण्डूक्योपनिषद्)