कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 129, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंः औपनिषद आत्मतत्त्व ः ११५
वाव अनिवार्य है। इसी प्रकार 'असुखम्' इस श्रुतिका भी 'आत्मा सुखभिन्न है' यह अर्थ मानना चाहिये । उत्तरपक्ष—आत्मा ज्ञानस्वरूप ही है। ज्ञानभिन्न सभी पदार्थ जड़ होते हैं और आत्माको जड़ मानना महामूर्खताका लक्षण है। उपनिषदोंमें कहा है— 'अत्रायं पुरुष स्वयं ज्योति.' (बृहदारण्यकोपनिषद्) 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तैत्तिरीयोपनिषद्) 'अयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभू.' (बृहदारण्यकोपनिषद्) 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' (" ") इन वाक्योंमें आत्माको ज्ञानस्वरूप कहा है। 'विज्ञानम्' इस वाक्यमें विशेषेण ज्ञान जिसका है, इत्यादि रीतिसे व्याख्यान स्वरशास्त्रके विपरीत होनेके कारण नहीं माना जा सकता। इसलिये औपनिषद आत्मा ज्ञानस्वरूप है यह मानना उचित है। घटविषयक विज्ञान आत्मा है किंवा पटविषयक ? इस प्रश्नका यही उत्तर है कि—'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तैत्तिरीय०) यहाँपर सभी पद लक्षणवृत्तिसे स्वार्थतर- व्यावृत्त वस्तुस्वरूपके बोधक हैं । ज्ञान शब्द जानेतरव्यावृत्त ब्रह्मका बोधक है । अर्थात् ब्रह्म अज्ञानरूप नहीं है अथवा सर्वविषयक ज्ञानको आत्मा कहा जाय तो कोई आपत्ति नहीं है, क्योंकि प्रत्येक सर्वज्ञ इसलिये नहीं हो सकेगा कि वह उपाधिपरिच्छिन्न है । एव ज्ञानके साधन जो कि अन्तःकरणवृत्त्यादिक हैं, वे सन्निहित नहीं होते, जिस विषयके लिये सामग्री होती है उस विषयमें ज्ञान अवश्य ही होता है। ५. आत्मा उपादान-कारण और निमित्त-कारण पूर्वपक्ष—'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तद् ब्रह्म ।' —इत्यादि श्रुतियोंसे जगत्का कारण 'ब्रह्मात्मतत्त्व' है, यह अवगत हुआ। यहाँ यह शङ्का हो सकती है कि घटकी मृत्तिकाके समान उपादान-कारण है कि वा घटके प्रति कुलालके समान निमित्तकारण है ? उचित यही होगा कि उसे 'निमित्त-कारण' माना जाय । क्योंकि उस ब्रह्मके विषय- में उपनिषद्में कहा गया है कि—'स ऐक्षत ईक्षाञ्चक्रे' (प्रश्नोपनिषद्) (सृष्टिकी उसने इच्छा की) । इच्छा तथा मननपूर्वक कार्य करना यह निमित्त कारणका ही लक्षण है। आदान कारणके गुणधर्मोंकि कार्यमें अनुवृत्ति पायी जाती है। यदि चेतन आत्माको जगतका उपादान कहा जाय तो जगतम कुछ भी जड़ न होकर सब चेतनस्वरूप ही होना चाहिये ।
उत्तरपक्ष—यह ठीक है कि ईक्षण करनेवाला ब्रह्म जगत- का कारण है, किंतु उपादान भी मानना चाहिये । जो गुणधर्मके अनुवर्तनका प्रश्न है वह विवर्त माननेसे समाहित हो सकता है। जगत् अविद्याका परिणाम है और ब्रह्मात्मतत्त्वका विवर्त्त है। किसी निश्चयात्मक वस्तुका यदि अन्य रूपसे भान होने लगे तो उसे 'विवर्त्त' कहते हैं। जिस प्रकार रज्जुका सर्पाकार भान होता है। उपादानके जानसे कार्यका भी ज्ञान सरल होता है, यह विषय आत्माके सम्बन्धमे भी उपपन्न है। उपनिषद्में प्रश्न किया गया है कि— 'कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति ।' 'किसके जानसे यह सब जाना जा सकता है।' इस प्रश्नका उत्तर यही है कि— आत्मनि खल्वरे दृष्टे श्रुते मते विज्ञाते इद५ सर्वं विदितं भवतीति । आत्मतत्त्वके श्रवण-मननादिसे यह सर्व जगत् ज्ञात हो सकता है। यह भान बिना आत्मानुवृत्ति (आत्माव्यतिरिक्ता) के नहीं हो सकता, और अव्यतिरिक्तिा आत्माको उपादान माने बिना नहीं आ सकती। अतः आत्माको उपादान मानना भी आवश्यक है। ६. औपनिषद् आत्मा ही केवल जगत्कारण जो भी यह कार्यजाल दिखायी दे रहा है इस सबका कारण वह एक आत्मा ही है और कोई अन्य उसे अपेक्षित नहीं है। ऐतरेयोपनिषद्मे कहा गया है कि— ॐ आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत, नान्यत्किञ्चन मिषत् । स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति । (१।१।१) 'यह सारा जगत् पूर्वम आत्मा ही था, अन्य कोई और तत्त्व नहीं था, उस आत्माने अपनी इच्छासे लोकका सर्जन किया ।' इससे यह सिद्ध है कि सृष्टिके मूलम एक ब्रह्म तत्त्व ही रहा है। सर्व जगत् उसका विवर्त्त है, इसलिये उससे विरूप है। तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ (कठोपनिषद) यह एक कारणवाद युक्तिसङ्गत भी है, दर्शनशास्त्रका उद्देश्य मूलतत्त्वका परिचय कराना ही है, क्योंकि मानव-