कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 128, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें११४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
'बालाग्रशतभागस्य' (श्वेताश्वतर० ५ । ९) इस मन्त्रमे आत्माका अणु परिमाण स्पष्ट ही बतलाया है, एव अणु परिमाण आत्माका तत्तल्लोकगमन भी सम्भव है । अतः आत्मा-का परिमाण अणु है—
उत्तरपक्ष—'अणोरणीयान्' इस मन्त्रवर्णमे जो 'अणुमे भी अणु ऐसा आत्माका स्वरूप कहा है, यह उसकी स्तुतिमात्र है, परिमाण निर्णय नहीं ।
अणिमा महिमा चैव गरिमा लघिमा तथा । प्राप्ति प्राकाम्यमीशित्व वशित्व चाष्टसिद्धय ॥
ये अष्टसिद्धियाँ आत्मामे बतलायी गयी है । इसीलिये आगे 'महतो महीयान्' (बड़े से-बड़ा) यह वाक्य-शेष भी सगत होगा, अन्यथा परस्पर व्याघात उपस्थित होगा । जो अणु है वह महान् कैसे ? यदि माना जाय तो परिमाणभेदसे आत्मामे भी भेद माना जायगा, जिससे कि आत्माको अनित्य मानना अनिवार्य हो जायगा । अस्तु, अङ्गुष्ठादिमात्रस्वरूपका जो कथन है वह लिङ्ग शरीरादिके तात्पर्यसे है । आत्मामे औपचारिक है । इस प्रकार विपक्षका बाधन करके स्वपक्ष-(विभुत्व) माधवार्य श्रुतियोंको प्रमाणरूपेण देते है—
'एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा' (कठोपनिषद् १ । ३ । १२)
यहाँ बतलाया गया है कि प्रच्छन्नतया सर्वभूतोमे आत्मा स्थित है । यह बात विना आत्माके विभु माने नहीं घटित हो सकती है । इसलिये आत्मा विभु है ।
ईशा वास्यमिद५ सर्वं यत्किञ्च जगत्या जगत् । (ईशोपनिषद १)
साग जगत् परमेश्वरेण (ईशा) व्याप्त है—आच्छादित है (वास्यम्) ।
'एतस्मादात्मन आकाश सम्भूत ।'
आत्मासे विभु आकाश प्रकट हुआ । अणु आत्मासे विभु आकाशका होना सम्भव नहीं है ।
'अयमात्मा ब्रह्म' 'एकमेवाद्वितीयम्'
ब्रह्म शब्दका ही अर्थ व्यापक है । ब्रह्मपदाभिधेय आत्मा अणु कैसा ? अद्वितीयता तथा एकताके विना विभुताका सम्भव नहीं है ।
'तमाहुरग्र्य पुरुष महान्तम्' (श्वेताश्वतरोपनिषद्)
उस पुरुषको अनादि और महान् कहा है ।
'अस्थूलमनण्वह्रस्वम्' (बृहदारण्यक०)
यहाँ अणुताका शब्दशः प्रतिषेध भी मिलता है । अत औपनिषद आत्मा अणु नहीं, प्रत्युत विभु है, सर्वान्तर्यामी है ।
३. आत्मा परिणामी तथा सावयव नही
पूर्वपक्ष—कायाकार परिणामी आत्मा है । यह सावयव होनेपर भी कथञ्चित् नित्य ही है । उनका कहना है कि जिस पदार्थके गुण जहाँ उपलब्ध हो, उस परिधिमे ही वह पदार्थ मानना उचित है । आत्माके ज्ञानादि गुणोकी उपलब्धि यदि शरीरावच्छेदेन ही है तो शरीरव्यापी ही आत्मा मानना चाहिये । न अणु और न विभु । अवयवोमे सकोच-विकास होता है, अत. चींटीकी आत्मा हस्ति शरीरमे व्याप्त हो सकती है और हस्तीकी आत्मा चींटीमे भी । ये उपनिषद्को प्रमाण न माननेवाले कुतार्किकोंमेंसे हे । (जैन)
उत्तरपक्ष—यह सिद्धान्त युक्त्या और श्रुत्या दोनोके विरुद्ध है । सकोच विकास ये परिमाणभेद एक वस्तुमे सम्भव नहीं । यदि माना जाय तो आत्माको उत्पाद विनाशशाली मानना पडेगा । जिसमे कृतहानि और अकृताभ्यागमरूप दोष आ सकेंगे ।
अवस्थान्तरापत्तिको परिणाम कहते ह । नित्य आत्माका अवस्थान्तर प्राप्त करना भी सगत नहीं है । उपनिषदोमे कूटस्थता बतायी है ।
'ध्रुव तत्' (कठोपनिषद) 'न जायते म्रियते वा०' (कठोपनिषद् १ । २ । १८) 'अविकार्योऽयमुच्यते' (गीता २ । २५)
इस प्रकार औपनिषद आत्मतत्त्व आत्मा परिणामी किंवा सावयव भी नहीं है, यही ठीक है ।
४. आत्मा ज्ञानस्वरूप, ज्ञानाश्रय नहीं
पूर्वपक्ष—न्यायादि दर्शनोंमें आत्माका यही मुख्य लक्षण माना गया है कि आत्मा वही है जो ज्ञानाधार है । आत्मा स्वतन्त्र द्रव्य है, उसमे समवायसे ज्ञान, सुख, दुःख, इच्छा आदि चतुर्दश गुण उत्पन्न होते है और कार्यकारणभावके पौर्वापर्य नियमके (Theory of Causation) अनुसार युक्ति भी सङ्गत है । प्रमाण, प्रमिति, प्रमेय, प्रमाता—इनमे भेद आवश्यक है । इसी प्रकार यदि ज्ञान ही आत्मा है तो घटविषयक ज्ञान आत्मा है या पटूविषयक ? यह प्रश्न निरुत्तर रहेगा ।
'य सर्वज्ञ सर्ववित्' इस श्रुतिमे 'सर्वज्ञ शब्दका यही अर्थ है कि 'सर्वपदार्थविषयक ज्ञानवान्' । यहाँ आधारका