कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 124, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें११० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
लिये ही समग्र वैकुण्ठको ही अपने साथ इस भूतलपर अवतीर्ण किया था; इसका रोचक वर्णन यहाँ उपलब्ध होता है। श्रीकृष्णके जीवनके आध्यात्मिक रूप जाननेके लिये इस उपनिषद्की महती उपयोगिता है। श्रीकृष्ण तो स्वयं शाश्वत ब्रह्म ही हैं और उनकी सेविका गोपिकाएँ तथा सोलह हजार एक सौ आठ रानियाँ उपनिषद्की ऋचाएँ ही हैं— अष्टादशसहस्रे द्वे शताधिक्य स्त्रियस्तथा । ऋचोपनिषदस्ता वै ब्रह्मरूपा ऋचः स्त्रियः ॥ ४. गरुडोपनिषद्—इस स्वल्पकाय उपनिषद्में गारुडी विद्याके रहस्यका उद्घाटन है । गरुडके स्वरूपका आध्यात्मिक रीतिसे विवेचन इस ग्रन्थकी विशिष्टता है । ५. गोपालतापिनो-उपनिषद्—इस ग्रन्थके दो भाग हैं—(क) पूर्व, (ख) उत्तर । पूर्वतापिनोके छः अध्याय हैं जिनमें गोपाल कृष्णके अष्टादश अक्षरवाले मन्त्रके रूप, फल तथा जपविधानका पूर्णतया विस्तृत वर्णन है । उत्तर- तापिनोमें अनेक आध्यात्मिक रहस्योंका वर्णन है। मथुराके आध्यात्मिक रूपका निर्णय बड़ा ही मार्मिक है। इस उपनिषद्में गोविन्दकी बड़ी ही सुन्दर स्तुति उपलब्ध होती है— नमो विज्ञानरूपाय परमानन्दरूपिणे । कृष्णाय गोपीनाथाय गोविन्दाय नमो नम ॥ श्रीकृष्ण रुक्मिणीकान्त गोपीजनमनोहर । संसारसागरे मग्नं मामुद्धर जगद्गुरो ॥ ६. तारसारोपनिषद्—इसमें तारक मन्त्रके स्वरूपका निर्णय किया गया है। भगवान् नारायणके अष्टाक्षर मन्त्रका विस्तारके साथ उपदेश कथन है। ७. त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद्—यह उपनिषद् वैष्णव उपनिषदोंमें सबसे बड़ा है। महत्त्व तथा विस्तार दोनोंकी दृष्टिमें इस उपनिषद्को गौरव प्राप्त है। इसमें आठ अध्याय हैं । प्रथम अध्यायमें परमेष्ठीने भगवान् नारायणसे ब्रह्मस्वरूपकी जिज्ञासा की और इसी जिज्ञासाकी पूर्तिके लिये इस उपनिषद्का उपदेश है। ब्रह्मके चार पाद बतलाये गये हैं—(क) अविद्यापाद, (ख) विद्यापाद, (ग) आनन्दपाद और (घ) तुर्यपाद । प्रथम पादमें अविद्याका संसर्ग रहता है। अन्तिम पाद इससे नितान्त विशुद्ध रहते हैं। विद्यापाद तथा आनन्दपादमें अमित तेजः- प्रवाहके रूपमें नित्य वैकुण्ठ विराजता है और यहीं तुरीय
ब्रह्म अपने समग्र तेज तथा वैभवके साथ स्थित रहते हैं। अन्य अध्यायोंमें साकार तथा निराकार शब्दोंकी व्याख्या है। ब्रह्म स्वतः अपरिच्छिन्न है। अतः वह साकार होते हुए भी निराकार रहता है और इन दोनोंसे भी परे वर्त्तमान रहता है। महामायाका ही यह जगत् विलास है और अन्तमें यह जगत् महाविष्णुमें लीन हो जाता है। पञ्चम अध्यायमें मोक्षके उपायका कथन है। मुक्ति तत्त्वज्ञानके लाभसे ही होती है और उस ज्ञानका परिपाक भक्ति तथा वैराग्यके कारण सम्पन्न होता है। षष्ठ अध्यायमें ब्रह्माण्डके स्वरूपका परिचय कराया गया है तथा विष्णुके विभिन्न रूपोंकी उपासनासे भिन्न भिन्न लोकोंकी प्राप्तिका निर्देश किया गया है। सप्तम अध्यायमें नारायणके यन्त्रका वर्णन है। अन्तिम अध्यायमें आदि नारायण ही गुरुरूपसे निर्दिष्ट किये गये हैं जिनकी एकमात्र निष्ठा करनेसे ही प्रपञ्चका उपशम होता है। इस उपनिषद्के मूल सिद्धान्त पुरुषसूक्तमे उल्लिखित हैं । रामानुजदर्शन तथा अन्य वैष्णवदर्शनोंपर इस उपनिषद्का प्रचुर प्रभाव पड़ा है। रामानुजके अनुसार अचित् तत्त्वके तीन प्रकारोंमें प्रथम भेद है—शुद्धसत्त्व और यही शुद्धसत्त्व त्रिपाद्विभूति, परमपद, परमव्योम, अयोध्या आदि शब्दोंके द्वारा व्यवहृत होता है। (द्रष्टव्य मेरा भारतीय दर्शन पृ० ४७२–४७३) ८. दत्तात्रेयोपनिषद्—इसमें दत्तात्रेयकी उपासनाका वर्णन है तथा तत्सम्बद्ध नाना मन्त्रोंके वर्णन तथा विधान- का कथन है। दत्तात्रेयके मन्त्रके बीजकी भी विशिष्ट व्याख्या है। उपनिषद् छोटा ही है। ९. नारायणोपनिषद्—यह उपनिषद् परिमाणमें बहुत छोटा है। इसमें चार खण्ड हैं जिनमें नारायणके अष्टाक्षर मन्त्रका उद्धार तथा माहात्म्य प्रतिपादित किया गया है। १०. नृसिंहतापिनो-उपनिषद्—इस उपनिषद्के दो खण्ड हैं—पूर्व और उत्तर। इसमें नृसिंहके रूप तथा मन्त्रका विस्तृत वर्णन है। नृसिंहकी तान्त्रिकी पूजाका रहस्य इसमें विस्तारसे उद्घाटित किया है। इस प्रकार तान्त्रिक उपनिषदोंमें यह उपनिषद् महत्त्वपूर्ण तथा महनीय है। इसके ऊपर शङ्कराचार्यकी भी टीका मिलती है, जिसे अनेक आलोचक आद्य शङ्कराचार्यकी रचना माननेमें संकोच करते हैं। नृसिंह- के महाचक्रका वर्णन पूर्वतापिनोके पञ्चम उपनिषद्में विस्तारके साथ किया गया है। उत्तरतापिनोमें नव खण्ड हैं, जिनमें