भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 123
  • वैष्णव-उपनिषद् * १०९ समाप्त नहीं होती । हम यह भी देख सकते हैं कि उस परिवर्तनशील वस्तु और उस स्थिर-बिन्दुमें कोई तात्त्विक भेद नहीं है। केवल इतना ही है कि एक अपने शुद्ध रूपमें है और दूसरा विकृत रूपमें । यदि उसकी विकृतिको परिशुद्ध कर दिया जाय तो केवल एक ही शुद्ध रूप रह जाता है। अभी कलतक इस चिर-प्रतिपादित सिद्धान्तको केवल दार्शनिकोंकी कल्पना समझा जाता था। परन्तु आजका भौतिक- विज्ञान यह सिद्ध कर रहा है कि भौतिक पदार्थ (मैटर) को शक्ति (फोर्स) के रूपमें परिणत किया जा सकता है। 'अणु बंम' इस परिवर्तनका प्रत्यक्ष प्रमाण है । साथ ही यह भी ध्यान देनेकी बात है कि वह स्थिर-बिन्दु या यों कहिये कि वह शक्ति जो प्रत्येक पदार्थमें अपरिवर्तनीय और अविनाशी है, दो नहीं हो सकती । दो पदार्थोंकी शक्तियोंमें मात्राका (डिग्रीका) अन्तर हो सकता है, पर स्वभावका (नेचरका) भेद नहीं हो सकता । अस्तु, 'यह सब ब्रह्म है' के पीछे एक दृढ़ सिद्धान्त है और इसी दृष्टिसे वाक् भी ब्रह्म है। वाक् सूक्ष्म ब्रह्मसे भिन्न कोई दूसरी वस्तु हो ही नहीं सकता । स्थूल जगत् ब्रह्मका विवर्त है । स्थूल-जगत् वाक्का विकार है, क्योंकि रूप और नाम एकहीके दो पहलू हैं। उनमें कोई भेद नहीं। अतः वाक् और ब्रह्ममें भी कोई भेद नहीं। इस प्रकार हम देखते हैं कि उपनिषदोंमें जहाँ जीव और जगत्-सम्बन्धी अनेक गूढ़ तथ्योंका विवेचन है, वहाँ वाक्‌पर भी प्रकाश डाला ही गया है। अवश्य ही विचार-शैली भिन्न होनेके कारण और वाक्का मुख्य विषय न होनेके कारण किसी एक स्थानपर वाक्‌पर क्रम-बद्ध गवेषणा नहीं मिलती । फिर भी जहाँ-तहाँ जो विचार बिखरे पड़े हैं, उन्हींके सहारे हम देख रहे हैं कि उपनिषदोंमें वाक्के प्रायः प्रत्येक अङ्गपर दृष्टि डाली गयी है। लोक-जीवनमें वाक्का जितना महत्त्व उपनिषद्के ऋषियोंने दिखाया है, उससे अधिक कोई क्या कह सकता है। उनके लिये वाक् केवल जिह्वा-व्यापार न होकर अन्तरात्माकी पुकार है। वह दैवी है। आजका भौतिक-विज्ञान ध्वनि (साउंड) के अनेकानेक व्यापक रहस्योंका उद्घाटन- कर हमारे जीवनमे प्रतिदिन नया रूप-रङ्ग डाल रहा है। भाषाविज्ञान वाक्के नित्य-नवीन विश्लेषणमें निरत है। पर उपनिषदोंमे जो वाक्का स्वरूप है, उसकी महत्ता ज्यों-की-त्यों है। वाक्की उपासना होती आ रही है और होती रहेगी । 'विन्देय देवता वाचममृतामात्मन. कलाम्' । (भवभूति) हम आत्माकी कलारूप शाश्वत दैवी वाक्‌को पावें । वैष्णव-उपनिषद् (लेखक—प० श्रीबलदेवजी उपाध्याय, एम्० ए०, साहित्याचार्य) भारतीय धर्म तथा दर्शनके विकासका अनुशीलन हमें इसी सिद्धान्तपर पहुँचाता है कि उनके बीज उपनिषदोंमे संकेतरूपसे निहित हैं। वैष्णव-धर्मके मूलरूपके अध्ययनकी सामग्री इन उपादेय उपनिषदोंमें ही बिखरी हुई है, परंतु कतिपय उपनिषद् तो सर्वथा विष्णु तथा उनके विभिन्न अवतारोंके रहस्योंके प्रतिपादनमें ही व्यस्त दीख पड़ते हैं। इन्हीं-उपनिषदोंका संक्षिप्त परिचय कराना इस छोटे लेखका उद्देश्य है। वैष्णव-उपनिषद् संख्यामें चौदह हैं और इन सबका एक सम्पुटमें प्रकाशन थियासोफ़िकल सोसाइटीने अड्यार (मद्रास) से किया है। अक्षर-क्रमसे इनका सामान्य निर्देश इस प्रकार है— १. अव्यक्तोपनिषद्—इस उपनिषद्में सात खण्ड हैं। विषय है अव्यक्त पुरुषको व्यक्तरूपकी प्राप्ति । इसमें 'आनुष्टुभी-विद्या' के स्वरूप तथा फलका पर्याप्त निर्णय किया गया है। इसीके बलपर परमेष्ठीको नृसिंहका दर्शन होता है और वे जगत्‌की सृष्टिमें समर्थ तथा सफल होते हैं। २. कलिसन्तरणोपनिषद्—इस उपनिषद्में नारदजी- के प्रार्थना करनेपर हिरण्यगर्भने कलिके प्रपञ्चोंको पार करनेवाला उपाय बतलाया है। यह उपाय है भगवान्‌का षोडश नामवाला मन्त्र— हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे । हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥ इस मन्त्रका एक रहस्य है। जीव षोडश कलाओंसे आवृत रहता है। इसीलिये उसकी प्रत्येक कलाको दूर करनेके लिये सोलह नामवाला मन्त्र अतीव समर्थ बतलाया गया है। इति षोडशकं नाम्ना कलिकल्मषनाशनम् । नात परतर्रोपाय सर्ववेदेषु दृश्यते ॥ इति षोडशकलादृतस्य जीवस्यावरणविनाशनम् । ततः प्रकाशते पर ब्रह्म मेघापाये रविरश्मिमण्डलीवेति ॥ ३. कृष्णोपनिषद्—यह उपनिषद् बहुत ही छोटा है। इसमें श्रीकृष्णकी भगवत्ताका परम प्रामाणिक वर्णन किया गया है। भगवान् श्रीकृष्णने भक्तोंके ऊपर अनुग्रह करनेके