भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 125
  • ब्रह्मका स्मरण करो और आसक्तिका त्याग करो * १११ निर्विशेष ब्रह्मके स्वरूपका प्रामाणिक विवेचन है। अष्टम खण्ड तुर्य ब्रह्मकी महनीयता तथा व्यापकताके वर्णनमे समाप्त हुआ है। नवम खण्डमें जीव तथा मायाके साथ ब्रह्मके सम्बन्धका प्रतिपादन है। इस प्रकार यह ग्रन्थ अद्वैततत्त्वके सिद्धान्तोंकी जानकारीके लिये नितान्त प्रौढ तथा उपादेय है। ११. रामतापिनो-उपनिषद्—इसके भी दो खण्ड है जिनमें रामकी तान्त्रिक उपासनाका विस्तृत विवेचन उपलब्ध होता है। राम तथा सीताके मन्त्र तथा मन्त्रके क्रमशः उद्धार तथा लेखनप्रकारका वर्णन है। रामका षडक्षर मन्त्र यन्त्रमें किस प्रकार निविष्ट किया जा सकता है तथा उसका पूजन किस विधिसे किया जाता है, इसी विषयका यहाँ प्रामाणिक प्रतिपादन है। योगीलोग जिस परमात्मामें रमण करते हैं वही 'राम' शब्दके द्वारा अभिहित किया जाता है— रमन्ते योगिनोऽनन्ते नित्यानन्दे चिदात्मनि । इति रामपदेनासौ परं ब्रह्माभिधीयते ॥ राम-मन्त्रका बीज है—रा और इसीके भीतर देवत्रय तथा उनकी शक्तियोंका समुच्चय विद्यमान रहता है। रेफसे ब्रह्माका, तदनन्तर आकारसे विष्णुका तथा मकारसे शिवका तात्पर्य माना जाता है और इस प्रकार इन तीनों देवताओंकी शक्तियाँ—सरस्वती, लक्ष्मी तथा गौरी इस बीजमे विद्यमान रहती हैं— तथैव रामबीजस्थं जगदेतच्चराचरम् । रेफारूढा मूर्तय स्यु. शक्तयस्तिस्र एव च ॥ तदनन्तर राममन्त्रके उद्धारका विस्तृत विवरण उपलब्ध होता है। उत्तरतापिनीमें राम-मन्त्रके तारकत्व तथा जपके फलका निर्देश है। प्रणवका अर्थ 'राम'में बड़ी युक्तिसे सिद्ध किया गया है। रामके साक्षात्कार करा देनेवाले मन्त्रोंका भी यहाँ निर्देश मिलता है। राम-मन्त्रके माहात्म्यकां प्रतिपादन कर यह उपनिषद् समाप्त होता है। 'उपनिषद् ब्रह्मयोगी'की व्याख्याके अतिरिक्त 'आनन्दवन' नामक ग्रन्थकारने भी बड़ी सुबोध टीका इस ग्रन्थपर लिखी है। यह टीका मूल ग्रन्थके साथ सरस्वती-भवन ग्रन्थमाला (न० २४) में काशीसे १९२७ ई० मे प्रकाशित हुई है। १२. रामरहस्य-उपनिषद्—इस उपनिषद्का विषय है रामकी पूजाका प्रतिपादन तथा तदुपयोगी मन्त्रों तथा विधानोंका विवेचन । राम-मन्त्र एक अक्षरसे आरम्भ होकर इकर्तीस अक्षरोंतकका होता है। इसका पर्याप्त वर्णन यहाँ मिलता है। इसके अतिरिक्त सीता, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न तथा हनुमान्के मन्त्रोंका भी वर्णन है। राम-मन्त्रके पुरश्चरण- का भी विधान यहाँ किया गया है। १३ वासुदेवोपनिषद्—इसमें वासुदेवकी महिमा बतलाकर गोपीचन्दनके धारण करनेका विशिष्ट वर्णन है। वैष्णवजनोंके मस्तकपर विराजमान त्रिपुण्ड्र, ब्रह्मादि देवतात्रय, तीन व्याहृति, तीन छन्द, तीन अग्नि, तीन काल, तीन अवस्था, प्रणवके तीनों अक्षरोंका प्रतीक बतलाया गया है। वासुदेव जगत्के आत्मस्वरूप हैं। उनका ध्यान प्रत्येक भक्तको करना चाहिये । १४. हयग्रीवोपनिषद्—हयग्रीव भगवान्के नाना मन्त्रोंके उद्धारका प्रकार इस छोटे उपनिषद्में विशेषरूपसे किया गया है। वैष्णव-उपनिषदोंका यही संक्षिप्त वर्णन है। इसके अनुशीलनसे स्पष्ट प्रतीत होता है कि वैष्णवमतके नाना सम्प्रदायोमे जो उपासना-विधि इस समय प्रचलित है, उसका मूलरूप हमें यहाँ उपलब्ध होता है। इन्हीं उपनिषदोंके आधारपर ही पिछले मतोंका विकास सम्पन्न हुआ है। अतः वैष्णवमतके रहस्योंको भलीभाँति जाननेके लिये इन ग्रन्थ- रत्नोंका अनुशीलन नितान्त आवश्यक है। ब्रह्मका स्मरण करो और आसक्तिका त्याग करो अहो नु चित्रं यत्सत्य ब्रह्म तद् विस्मृतं नृणाम् । तिष्ठतस्त्व कार्येषु मास्तु रागानुरञ्जना ॥ अहो ! यह बड़े आश्चर्यकी बात है कि जो परब्रह्म परमात्मा नितान्त सत्य हैं, उन्हींको मनुष्योंने भुला दिया है। भले ही कर्मोंमें लगे रहनेपर भी तुम्हारे मनमें रागानुरञ्जना—उन कर्मोंमें आसक्ति नहीं होनी चाहिये।