भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 126

औपनिषद आत्मतत्त्व

(लेखक—याज्ञिक पं० श्रीवेणीरामजी शर्मा गौड़, वेदाचार्य, वेदरत्न)


[स्तम्भ १]

(१) वाङ्मय, मानवकी विशेषताओंका (आदर्श) पुञ्ज है। आहार-विहारपर्यन्त ही अपनी चर्चाको सीमित न करते हुए, भावीकी ओर अग्रसर रहना, उसके लिये सतत प्रयत्न करना, मानव-जीवनकी एक विशेषता है। यह उसकी जन्म- जात कला है। वाङ्मयमें इसी कलाका सङ्कलन रहता है। जिसका आकलन कर अन्य मानव अपने लिये गतिपथ पाते हैं। वह कला साहित्यिक हो, आलंकारिक हो, भौतिक हो अथवा आध्यात्मिक हो, मानवके जीवन-विकासमे पर्यायेण आवश्यक है। प्रत्येक कलाका अपना वाङ्मय अपने विषयमें अवश्य सराहनीय है, तथापि अध्यात्मविवेक-कलापूर्ण वाङ्मय- का स्थान सर्वोच्च है। क्योंकि प्रत्येक वस्तु जो कि विश्वकी रङ्गभूमिपर प्रस्तुत हुई हो अथवा होनेवाली हो, दीप-ज्योतिके समान इस अध्यात्मसे ही, आत्मसत्त्व किंवा आत्मप्रकाश प्राप्त करती है। यह बात स्पष्ट ही है कि जगत्का कोई भी व्यवहार 'मै' इस आत्मतत्त्वके बिना नहीं चल सकता। जगत्के किसी भी देश एव कालका उच्चकोटिका दार्शनिक हो, चाहे 'आत्मानं सतत रक्षेत्' कहनेवाला कोई महास्वार्थी व्यवहारी पुरुष हो, दोनों आत्मसापेक्ष है। इसीलिये अध्यात्म-वाङ्मय किसी भी देश-कालका हो, प्रशसनीय है, सबके लिये आदरणीय है, सग्राह्य है, जेय है। उपनिषद्- वाङ्मय यह एक ऐसा अद्भुत वाङ्मय है जो अध्यात्मका प्रकाश देनेवाला है। इस दिशामें विश्वकी यह अद्वितीय वस्तु है। इस बातको सभी विद्वान् मानते हैं। बस, हम यहाँ उपनिषद्के उसी अध्यात्म-तत्त्वका दिग्दर्शन उपस्थित करना चाहते हैं।

(२) उपनिषदोंका क्या विषय है या होना चाहिये, इसमें कोई विवाद नहीं, क्योंकि इस बातको सभी जानते है तथा मानते हैं कि उपनिषद्का मुख्य विषय 'ब्रह्म' है। और मुख्य प्रयोजन 'ब्रह्मज्ञान' है, जिससे कि ब्रह्म-प्राप्तिरूप मोक्ष मिलता है। उपनिषद् शब्द—उप-उपसर्गपूर्वक तथा नि उपसर्गपूर्वक 'षद्ल विशरणगत्यवसादनेषु' धातुसे निष्पन्न है, यही अर्थ बतलाता है। नि शेषतया आत्मतत्त्वके समीप पहुँचा देनेवाली विद्या, इस अर्थमें उपनिषद् शब्द यथार्थ है।

विवाद यदि है तो केवल इस विषयमें ही कि—वह


[स्तम्भ २]

ब्रह्म क्या है, ब्रह्म शब्दका अर्थ क्या लिया जाय अथवा उसका लक्षण क्या किया जाय ? इसका कारण यह है कि— 'ब्रह्म' शब्द जिस प्रकार उलझी हुई वर्णमालासे बना है, उसी प्रकार वह अर्थके सम्बन्धमें भी गुथा हुआ है।

'ब्रह्म' शब्द निम्नलिखित अर्थोंमे व्यवहृत है— परमात्मा, जीव, जगत्कारण, जड-प्रकृति, परमाणु, शब्द और विद्या।

'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' 'जन्माद्यस्य यतः' 'तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः'— यहाँ 'ब्रह्म' शब्द परमेश्वरवाचक है। मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम्। (गीता १४। ३) यहाँपर जड प्रकृति तथा परमाणु अर्थमें 'ब्रह्म' शब्द मतभेदसे माना जाता है। 'ब्रह्म एवेदमग्र आसीत्' यहाँपर जगत्कारण ( उपादान ) ब्रह्म शब्दार्थ है।

'सर्वेषामेव दानानां ब्रह्मदान विशिष्यते।' यहाँ विद्या, शब्द (वेद) आदि अर्थ है। उपनिषदोंमें 'जगत्कारण' इस अर्थमें ब्रह्म शब्द लेना उचित है (वह वाक्य शेष आदि प्रमाणसे सङ्गत है)।

इसपर भी शङ्का अवश्य है कि 'जगत्-कारण जड प्रकृत्यादि लिये जायँ अथवा चेतन आत्मा ?' इसका समाधान भी अति सरल है। उसी ब्रह्मके बारेमें वहीं मिलता है— 'तदैक्षत बहु स्या प्रजायेय' अर्थात् उस ब्रह्मने इच्छा की कि 'मै सृष्टि करूँ' इस प्रकारकी इच्छा किंवा मनन जड- प्रकृतिमें सम्भव नहीं है, अतः 'ब्रह्म' शब्दसे चेतन आत्मा लेना ही उचित है। 'अयमात्मा ब्रह्म' इन समानाधिकरण शब्दोंका भी यही स्वारस्य है।

यही चेतन आत्मा स्वयप्रकाश है। इसे ही ब्रह्म, औपनिषद पुरुष किंवा उपनिषत्प्रतिपाद्य आत्मतत्त्व कहते हैं। इस उपनिषत्प्रतिपाद्य आत्मतत्त्वके स्वरूपके विषयमें उपनिषदों- के आधारपर ही वादियोंके अनेक मत हैं। उनपर सप्रमाण समालोचना करते हुए हम कुछ लिखना उचित समझते हैं, जिससे उपनिषत्प्रतिपाद्य आत्मतत्त्वका वास्तविक स्वरूप स्फुट हो सके।