कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 111, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपनिषद् और रामानुज-वेदान्तदर्शन- ( लेखक-वेदान्ताचार्य पं० श्रीरामकृष्णजी शास्त्री, बी० ए० )
उपनिषदोंको ही वेदान्त कहा जाता है; क्योंकि प्रथम तो ये वेदके सहिता आदि भागोंके अन्तिम अध्याय हैं, जैसे माध्यन्दिनीय संहिताका अन्तिम अध्याय ईशावास्योपनिषद् है; दूसरे वे वेदका अन्त अर्थात् सार हैं, वेदका वास्तविक प्रतिपाद्य विषय ब्रह्मज्ञान इनमें प्रत्यक्ष रूपसे निहित है। वेदके अवशिष्ट भागमें तो कर्मकाण्ड, यज्ञ, देवप्रशंसा आदिके रूपमें अप्रत्यक्ष रूपसे ही ब्रह्मज्ञान कराया गया है।
उपनिषदोंके अर्थको भलीभाँति समझानेके लिये और उपनिषदोंके वर्णनीय विषयको एक तर्कपूर्ण तथा वैज्ञानिक रीतिसे क्रमबद्ध करनेके लिये महर्षि वेदव्यासजीने ब्रह्मसूत्रोंका प्रणयन किया। इन ब्रह्मसूत्रोंको वेदान्तदर्शन कहते हैं और वेदके उत्तर भागकी मीमांसा होनेके कारण इनको उत्तर- मीमांसा भी कहते हैं। साथ ही ब्रह्मकी मीमांसा होनेके कारण इन्हें ब्रह्ममीमांसा भी कहा जाता है।
ब्रह्मसूत्रोंके अर्थको स्पष्ट करनेके लिये और ब्रह्मसूत्रों तथा उनके विषय उपनिषद् या श्रुतियोंका परस्पर सामञ्जस्य दिखलाने- के लिये विभिन्न आचार्यपादोंने ब्रह्मसूत्रोंपर भाष्योंकी रचना की है, जिनके द्वारा उपनिषदोंके प्रतिपाद्य विषयको अवगत कराया गया है और ब्रह्मसूत्र उन अर्थोंके साक्षी हो जाते हैं, उपनिषदों- का वास्तविक अर्थ ब्रह्मसूत्रोंमें निहित है, किंतु संक्षिप्त रूपसे है। उस अर्थको विस्तृत कर देना मात्र भाष्योंका कार्य है। इस परम्परासे भाष्य उपनिषदोंके ही अर्थको दार्शनिक रीतिसे क्रमबद्धरूपमें अवगत कराते हैं। इन भाष्योंका निर्माण करनेसे पूर्व आचायोंने उपनिषत्प्रतिपादित तत्त्वको विभिन्न रूपसे देखा है, जैसे श्रीशङ्कराचार्यजीने अद्वैतरूपसे, श्रीरामानुजाचार्यजीने विशिष्टाद्वैतरूपसे और श्रीवल्लभाचार्यजीने शुद्धाद्वैतरूपसे आदि।
उसी तत्त्वको अपने दृष्टिकोणमें रखते हुए उसे विस्तृत रूपसे अपने-अपने भाष्योंमें प्रतिपादित किया है और उस तत्त्वका ब्रह्म- सूत्रोंसे सामञ्जस्य दिखलाया है। इस प्रकार श्रुति, सूत्र और भाष्य-ये तीनों एक पूर्ण दर्शन हो जाते हैं और भाष्योंके अनुसार ही उनके नाम निर्देश किये जाते हैं-जैसे शाङ्कर- वेदान्त, रामानुज वेदान्त, मध्व-वेदान्त और वल्लभ वेदान्त। इन्हींको क्रमशः अद्वैत-वेदान्त, विशिष्टाद्वैत-वेदान्त, द्वैत-वेदान्त और शुद्धाद्वैत-वेदान्त कहा जाता है। इन्हींमे 'दर्शन' शब्द जोड़कर इनको शाङ्कर वेदान्तदर्शन या शाङ्कर-दर्शन आदि कहा जाता है। इन्हीं दर्शनोंमेसे एक रामानुज-वेदान्त- दर्शन है।
यहाँपर हमें केवल यह दिखाना है कि उपनिषदोंमें और रामानुज-वेदान्तदर्शनमे सामञ्जस्य किस प्रकार है अर्थात् उपनिषदोंको रामानुज-वेदान्तदर्शनमें किस प्रकार लगाया गया है।
उपनिषदोंमें सामान्य रूपसे चार प्रकारकी श्रुतियाँ मिलती हैं-निर्गुणका प्रतिपादन करनेवाली, सगुणका प्रतिपादन करने- वाली, अभेदवादिनी तथा भेदवादिनी। निर्गुणप्रतिपादक तथा सगुणप्रतिपादक श्रुतियोंमें परस्पर विरोध प्रतीत होता है। इसी प्रकार अभेदवादिनी और भेदवादिनी श्रुतियोंमें भी परस्पर विरोध दीखता है। इनका परस्पर सामञ्जस्य ही रामानुज- वेदान्तदर्शन है।
जो निर्गुणप्रतिपादक श्रुतियाँ हैं। जैसे- 'निष्कलम्' 'निरञ्जनम्' 'निर्गुणम्' 'अप्रतर्क्यम्' 'अविज्ञेयम्' 'एष आत्मा अपहतपाप्मा विजरो विमृत्यु- र्विशोकोऽविजिघित्सोऽपिपासः।'
-आदि। इनका यह तात्पर्य है कि परब्रह्ममें काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष, राग, शोक, बुभुक्षा, पिपासा, जरा, मृत्यु आदि हेय या त्याज्य गुण या विशेषण नहीं हैं, (गुण शब्द विशेषणमात्रका द्योतक है चाहे विशेषण सत् हो या असत्) अतः वह निर्गुण या निर्विशेष है। जो सगुणप्रतिपादक श्रुतियाँ हैं, जैसे- 'परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च।' 'सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः' 'कविर्मनीषी' 'सोऽकामयत' 'सर्वगन्धः सर्वरसः'
-आदि। इनका यह तात्पर्य है कि परब्रह्ममें ज्ञानबलैश्वर्य, वीर्य, शक्ति, तेज, सौशील्य, मार्दव, आर्जव, दया, क्षमा, औदार्य, करुणा, प्रेम, वात्सल्य, सर्वलोकशरण्यत्व, सत्य- कामत्व, सत्यसङ्कल्पत्व आदि असंख्येय, अनन्त कल्याण गुण हैं। इस प्रकार परस्पर सामञ्जस्य करनेपर रामानुजदर्शनमें ब्रह्मका स्वरूप निर्धारित किया गया है कि ब्रह्म एकमात्र अनन्त
उ० अ० १३-