कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 112, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें९८ -- महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति -- ज्ञानानन्दस्वरूप, समस्त त्याज्य दोषोंसे सर्वथा शून्य एव अनन्त कल्याणमय गुणोंसे युक्त है । जो अद्वैत या अभेदका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियाँ हैं, जैसे— ‘एकमेवाद्वितीयम्’ ‘नेह नानास्ति किञ्चन’ ‘शान्त शिवमद्वैतम्’ —आदि । उनका तात्पर्य है कि चिदचिद्विशिष्ट ब्रह्मको छोड़कर और कुछ भी नहीं है । चित् अर्थात् जीव, अचित् अर्थात् प्रकृति आदि अचेतन पदार्थ ब्रह्मके शरीर हैं और ब्रह्म इनका आत्मा है । चेतन तथा अचेतन नित्य हैं, उनसे ब्रह्म सर्वदा विशिष्ट रहता है, क्योंकि चिदचित्पदार्थोंके नित्य होनेके कारण उनकी सत्ता अवश्य कहीं-न-कहीं रहेगी और जहाँ उनकी सत्ता रहेगी, वहाँ ब्रह्म भी अवश्य रहेगा, क्योंकि वह अनन्त है, सर्वदा सर्वत्र विराजमान है । इसके साथ ब्रह्म उनमें आत्मरूपसे प्रविष्ट रहता है और चेतन-अचेतनका उसी प्रकार नियन्त्रण करता है, जिस प्रकार जीव अपने शरीरका करता है । जीव कर्मबद्ध होनेके कारण स्वेच्छापूर्वक अपने शरीरका प्रयोग किसी कालमें न भी कर सके, किंतु ब्रह्म स्वतन्त्र और अनन्त ज्ञान तथा शक्तिसे युक्त होनेके कारण यथेच्छ प्रयोग कर सकता है । जिस प्रकार शरीरविशिष्ट आत्माको देवदत्त आदि नामोंसे पुकारते हैं और ‘पुण्यवान् देवदत्त स्वर्गको जायगा’ आदि-आदि प्रकारसे आत्माका निर्देश करते हैं, और शरीर आत्माका विशेषण होनेके कारण आत्माके साथ ही एकताके व्यवहारमें आता है । उसी प्रकार चेतनाचेतनशरीरक ब्रह्म एक ही हुआ । विशेष्यसे विशेषण पृथक् नहीं गिना जा सकता । यहाँ यह शङ्का नहीं करनी चाहिये कि गुण ही विशेषण होता है, चेतनाचेतन तो द्रव्य हैं, वे विशेषण कैसे हुए, क्योंकि विशेषण उसीको कहते हैं जो विशेष्यसे पृथक् रहनेमें असमर्थ हो । न वही शङ्का करनी चाहिये कि शरीर भोगायतन होता है, क्योंकि वस्तुतः शरीर उस द्रव्यका नाम है जो अपने शरीरीसे अपृथक् रहते हुए उसके द्वारा धारित, नियन्त्रित किये जाते हुए शरीरीका सर्वतोभावेन शेष हो । चेतनाचेतनको ब्रह्मका शरीर श्रुतियाँ ही कहती हैं, जैसे— ‘यस्यात्मा शरीरम्’ ‘यस्य पृथिवी शरीरम्’ ‘यस्याक्षर शरीरम्’ —आदि । इस प्रकार सकल विश्व ब्रह्मका शरीर होनेके कारण ब्रह्म ही कहा जाता है, इसीलिये भगवती श्रुति कहती है कि ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ अर्थात् सर्वको पृथक् मत समझो, किंतु यह ब्रह्म है। यही भाव ‘सोऽहमस्मि’, ‘अहं ब्रह्मास्मि’, ‘तत्त्वमसि’ आदि श्रुतियोंका है कि जिस प्रकार शरीरको शरीरी- के द्वारा निर्दिष्ट होना पड़ता है, उसी प्रकार चेतन या अचेतन ब्रह्मका शरीर होनेके कारण अपनी पृथक् सत्ता स्थापित नहीं रख सकता, किंतु उसे यही कहना पड़ेगा कि मैं ब्रह्म हूँ । इस प्रकार अभेदवादिनी श्रुतियोंका अर्थ है कि चिदचिद्विशिष्ट ब्रह्मसे व्यतिरिक्त कुछ नहीं है । एकमात्र वही है । भेदवादिनी श्रुतियाँ, जैसे— ‘भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा’ ‘नित्योऽनित्यानां चेतनश्चेतनानाम्’ —आदि हे । वे चेतन, अचेतन और ब्रह्म—इन तीनो तत्त्वोंका पृथक् पृथक् निरूपणमात्र कर देती हैं, जिससे ब्रह्म और उसका शरीर सुविधासे समझा जा सके । इन तीनोंके सम्बन्धको ‘यस्यात्मा शरीरम्’ आदि घटक श्रुतियाँ बतलाती हैं और अभेदवादिनी श्रुतियाँ चेतनाचेतनसे विशिष्ट ब्रह्मको बतलाती है। अतः तीनो प्रकारकी श्रुतियो (—द्वैतपरक, घटक, अद्वैतपरक ) का सामञ्जस्य हो जाता है । और पूर्वोक्त चारों प्रकारकी श्रुतियाँ भी इस प्रकार रामानुज दर्शनमे समझस हो जाती हे । ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ श्रुति ब्रह्मस्वरूपको उपस्थापित करती है । सगुण निर्गुणं, भेद-अभेद बतलाने- वाली श्रुतियोका सामञ्जस्य भी वहीं हो जाता है, तब यह निष्कर्ष निकलता है कि सत्य, अनन्तज्ञानानन्दैकस्वरूप, अखिलहेयप्रत्यनीक, मङ्गलकल्याणगुणसागर, चिदचिच्छरीरक एक परब्रह्म ही वस्तु तत्त्व है । इससे अतिरिक्त सब मिथ्या है। पूर्वोक्त गुणविशिष्ट सूक्ष्मचिदचिच्छरीरक ब्रह्म कारण है और पूर्वोक्त गुणविशिष्ट स्थूलचिदचिच्छरीरक ब्रह्म कार्य है । कारण और कार्यमे अभेद ही इस प्रकार हुआ । अतएव दोनों विशिष्टों—सूक्ष्मचिदचिद्विशिष्ट ब्रह्म और स्थूलचिद- चिद्विशिष्ट ब्रह्ममे अद्वैत होनेके कारण ब्रह्मको विशिष्टाद्वैत और तत्प्रतिपादक सिद्धान्तको विशिष्टाद्वैत-सिद्धान्त कहते हैं । जो चेतन अपनी इस स्थितिको समझ लेता है, उसे ‘ज्ञानी’ कहते हैं । जो समझकर अपने अन्तर्यामीकी ओर आकृष्ट होता है, उसे ‘भक्त’ कहते हैं। वही अपना उपाय समझनेवाला ‘शरणागत या प्रपन्न’ कहलाता है । शरणागति ही प्रभुको समझनेके लिये, उसे प्राप्त करनेके लिये एकमात्र उपाय है । शरणागतिका यह तात्पर्य है कि शरणागतिको भी उपाय न समझकर केवल प्रभुके चरणारविन्दोंको प्रभुपदकमल- सेवाकी प्राप्तिका उपाय समझना । प्रभुचरणकैङ्कर्य ही प्राप्य