भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 88

७४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ‘परन्तु जो मनुष्य सम्पूर्ण प्राणियोंको आत्मामें ही देखता है और आत्माको सारे भूतोंमें देखता है अर्थात् सम्पूर्ण भूतों- को अपना आत्मा ही समझता है, वह फिर किसीसे घृणा नहीं करता—सबको अपना आत्मा समझनेवाला किससे कैसे घृणा करे ? इस प्रकारसे जब आत्मतत्त्वको जाननेवाले महात्माके लिये सब आत्मा ही हो जाता है, तब फिर एकत्वका अर्थात् सबमें एक आत्माका अनुभव करनेवाले उस मनुष्यको कहाँ मोह है और कहाँ शोक है अर्थात् सबमें एक विज्ञान आनन्दमय परब्रह्म परमात्माका अनुभव करनेवाले पुरुषके शोक-मोह आदि विकारोंका अत्यन्त अभाव हो जाता है।’ इस विषयका रहस्य समझानेके लिये छान्दोग्य-उपनिषद्में एक इतिहास आता है। अरुणका पौत्र और उद्दालकका पुत्र श्वेतकेतु बारह वर्षकी अवस्थामे गुरुके पास विद्यालाभके लिये गया और वहाँसे वह विद्या पढकर चौबीस वर्षकी अवस्था होनेपर घर लौटा। वह अपनेको बुद्धिमान् और व्याख्यानदाता मानता हुआ अनम्रभावसे ही घरपर आया तथा उसने बुद्धिके अभिमानवश पिताको प्रणाम नहीं किया। इसपर उसके पिताने उससे पूछा— श्वेतकेतो यन्नु सोम्येदं महामना अनूचानमानी स्तब्धो- ऽस्युत तमादेशमप्राक्ष्यः। येनाश्रुतꣳ श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातमिति। (६।१।२-३) ‘हे श्वेतकेतु ! हे सोम्य ! तू जो अपनेको ऐसा महामना और पण्डित मानकर अविनीत हो रहा है, सो क्या तूने वह आदेश आचार्यसे पूछा है, जिस आदेशसे अश्रुत श्रुत हो जाता है, बिना विचारा हुआ विचारमें आ जाता है अर्थात् बिना निश्चय किया हुआ निश्चित हो जाता है और बिना जाना हुआ ही विशेषरूपसे जाना हुआ हो जाता है।’ इसपर श्वेतकेतुने कहा कि ‘भगवन् ! वह आदेश कैसा है।’ तब उद्दालक बोले— यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातꣳस्या- द्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्। (६।१।४) ‘सोम्य ! जिस प्रकार एक मृत्तिकाके पिण्डके द्वारा समस्त मृत्तिकामय पदार्थोंका ज्ञान हो जाता है कि विकार केवल वाणीके आश्रयभूत नाममात्र हैं, सत्य तो केवल मृत्तिका ही है।’ यथा सोम्यैकेन लोहमणिना सर्वं लोहमयं विज्ञातम् स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं लोहमित्येव सत्यम्। (६।१।५) ‘सोम्य ! जिस प्रकार एक लोहमणि (सुवर्ण) का ज्ञान होनेपर सम्पूर्ण सुवर्णमय पदार्थ जान लिये जाते हैं; क्योंकि विकार वाणीपर अवलम्बित नाममात्र है, सत्य केवल सुवर्ण ही है।’ यथा सोम्यैकेन नखनिकृन्तनेन सर्वं कार्ष्णायसं विज्ञातꣳ स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं कृष्णायसमित्येव सत्यमेवꣳ सोम्य स आदेशो भवतीति। (६।१।६) ‘सोम्य ! जिस प्रकार एक नखनिकृन्तन (नहन्ना) अर्थात् लोहेके ज्ञानसे सम्पूर्ण लोहेके पदार्थ जान लिये जाते हैं, क्योंकि विकार वाणीपर अवलम्बित केवल नाममात्र है, सत्य केवल लोहा ही है, हे सोम्य ! ऐसा ही वह आदेश है।’ यह सुनकर श्वेतकेतु बोला— न वै नूनं भगवन्तस्त एतदवेदिषुर्यद्धयेतदवेदिष्यन् कथं मे नावक्ष्यन्निति भगवाꣳस्त्वेव मे तद्ब्रवीत्विति तथा सोम्येति होवाच। (६।१।७) ‘निश्चय ही वे मेरे पूज्य गुरुदेव इसे नहीं जानते थे । यदि वे जानते तो मुझसे क्यों न कहते । अब आप ही मुझे अच्छी तरह बतलाइये।’ तब पिताने कहा—‘अच्छा सोम्य ! बतलाता हूँ।’ सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् । (६।२।१) ‘हे सोम्य ! आरम्भमे यह एकमात्र अद्वितीय सत् ही था।’ इसपर श्वेतकेतुने कहा—‘हे पिताजी ! मुझको यह विषय और स्पष्ट करके समझाइये ।’ उद्दालक आरुणि बोले—‘हे सोम्य ! जैसे दही मथनेसे उसका सूक्ष्मसार तत्त्व नवनीत ऊपर तैर आता है; इसी प्रकार जो अन्न खाया जाता है, उसका सूक्ष्म सार अंश मन बनता है । जलका सूक्ष्म अंश प्राण और तेजका सूक्ष्म अंश वाक् बनता है। असलमें ये मन, प्राण और वाणी तथा इनके कारण अन्नादि कार्यकारणपरम्परासे मूलमें एक ही सत् वस्तु ठहरते हैं । सबका मूल कारण सत् है; वही परम आश्रय और अधिष्ठान है । सत्के कार्य नाना प्रकारकी आकृतियाँ सब वाणीके विकार हैं, नाममात्र हैं। यह सत् अणुकी भाँति सूक्ष्म है, समस्त जगत्का आत्मारूप है। हे श्वेतकेतु ! वह ‘सत्’ वस्तु तू ही है—‘तत्त्वमसि ।’