भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 89, कुल 832 में से

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पृष्ठ 89
  • उपनिषदोंमें भेद और अभेद-उपासना * ७५ [बायाँ स्तम्भ] श्वेतकेतुने कहा—‘भगवन् ! मुझे फिर समझाइये ।’ पिता आरुणिने कहा—‘अच्छा, एक वट-वृक्षका फल तोड़कर ला ! फिर तुझे समझाऊँगा ।’ श्वेतकेतु फल ले आया । पिताने कहा—‘इसे तोड़कर देख, इसमें क्या है ?’ श्वेतकेतुने फल तोड़कर कहा—‘भगवन् ! इसमें छोटे-छोटे बीज हैं।’ ऋषि उद्दालक बोले—‘अच्छा, एक बीजको तोड़कर देख, उसमे क्या है ?’ श्वेतकेतुने बीजको तोड़कर कहा—‘इसमें तो कुछ भी नहीं दीखता ।’ तब पिता आरुणि बोले—‘‘हे सोम्य ! तू इस वट-बीजके सूक्ष्म तत्त्वको नहीं देखता, इस अत्यन्त सूक्ष्म तत्त्वसे ही महान् वटका वृक्ष निकलता है। बस, जैसे यह अत्यन्त सूक्ष्म वट-बीज बड़े भारी वटके वृक्षका आधार है, इसी प्रकार सूक्ष्म मत् आत्मा इस समस्त स्थूल जगत्का आधार है। हे सोम्य ! मैं सत्य कहता हूँ, तू मेरे वचनमें श्रद्धा रख । यह जो सूक्ष्म तत्त्व आत्मा है, वह सत् है और यही आत्मा है । हे श्वेतकेतु ! वह ‘सत्’ तू ही है—‘तत्त्वमसि” ( ६ । १२ । ३ ) । इस प्रकार उद्दालकने अनेक दृष्टान्त और युक्तियोंसे इस तत्त्वको विस्तारसे समझाया है, किंतु यहाँ उसका कुछ दिग्दर्शनमात्र कराया गया है । पूरा वर्णन देखना हो तो छान्दोग्य-उपनिषद्मे देखना चाहिये । उपर्युक्त विषयके सम्बन्धमे बृहदारण्यक-उपनिषद्में भी इस प्रकार कहा है— ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्तदात्मानमेवावेत् । अहं ब्रह्मास्मीति । तस्मात्तत्सर्वमभवत्तद्यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत् तथर्षीणां तथा मनुष्याणां तद्वैतत्पश्यन्नृषिर्वामदेव प्रतिपेदेऽहं मनुरभव सूर्यश्चेति । तदिदमप्येतर्हि य एव वेदाहं ब्रह्मास्मीति स इद सर्वं भवति तस्य ह न देवाश्च नाभूत्या ईशते । आत्मा ह्येषा स भवति । ( १ । ४ । १० ) “पहले यह ब्रह्म ही था, उसने अपनेको ही जाना कि ‘मैं ब्रह्म हूँ’ । अतः वह सर्व हो गया । उसे देवोंमेंसे जिस-जिसने जाना वही तद्रूप हो गया । इसी प्रकार ऋषियों और मनुष्योंमेंसे भी जिसने उसे जाना, वह तद्रूप हो गया। उसे आत्मरूपसे देखते हुए ऋषि वामदेवने जाना—‘मैं मनु हुआ और सूर्य भी’ । उस इस ब्रह्मको इस समय भी जो इस प्रकार जानता है कि ‘मैं ब्रह्म हूँ’, वह यह सर्व हो जाता है । उसके पराभवमें देवता भी समर्थ नहीं होते, क्योंकि वह उनका आत्मा ही हो जाता है ।” उपर्युक्त विषयका रहस्य समझानेके लिये बृहदारण्यक [दायाँ स्तम्भ] उपनिषद्में भी एक इतिहास मिलता है । महर्षि याज्ञवल्क्यके दो स्त्रियाँ थीं—एक मैत्रेयी और दूसरी कात्यायनी । महर्षि याज्ञवल्क्यने संन्यास ग्रहण करते समय मैत्रेयीसे कहा—‘मैं इस गृहस्थाश्रमसे ऊपर सन्यास-आश्रममें जानेवाला हूँ, अतः सम्पत्तिका बँटवारा करके तुमको और कात्यायनीको दे दूँ तो ठीक है।’ मैत्रेयीने कहा—‘भगवन ! यदि यह धनसे सम्पन्न सारी पृथ्वी मेरी हो जाय तो क्या म उससे किसी प्रकार अमृतस्वरूप हो सकती हूँ ?’ याज्ञवल्क्यने कहा—‘नहीं, भोग- सामग्रियोंसे सम्पन्न मनुष्योंका जैसा जीवन होता है, वैसा ही तेरा जीवन हो जायगा । धनसे अमृतत्वकी तो आशा है नहीं।’ मैत्रेयीने कहा—‘जिससे मैं अमृतस्वरूप नहीं हो सकती, उसे लेकर क्या करूँगी ? श्रीमान् ! जो कुछ अमृतत्वका साधन हो, वही मुझे बतलाइयें।’ इसपर याज्ञवल्क्यने कहा—‘धन्य है ! अरी मैत्रेयी ! तू पहले भी मेरी प्रिया रही है और अब भी तू प्रिय बात कह रही है। अच्छा, मैं तुझे उसकी व्याख्या करके समझाऊँगा । तू मेरे वाक्योंके अभिप्रायका चिन्तन करना ।’ याज्ञवल्क्यने फिर कहा— ‘न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति । आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेद सर्वं विदितम् ।’ ( २ । ४ । ५ ) ‘अरी मैत्रेयी ! सबके प्रयोजनके लिये सब प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये सब प्रिय होते हैं । यह आत्मा ही दर्शनीय, श्रवणीय, मननीय और ध्यान किये जाने योग्य है। हे मैत्रेयी ! इस आत्माके ही दर्शन, श्रवण, मनन एव विज्ञानसे इस सबका ज्ञान हो जाता है ।’ तथा— ‘इदं ब्रह्मेद क्षत्रमिमे लोका इमे देवा इमानि भूतानीद सर्वं यदयमात्मा ।’ ( २ । ४ । ६ ) ‘हे मैत्रेयी ! यह ब्राह्मणजाति, यह क्षत्रियजाति, ये लोक, ये देवगण, ये भूतगण और यह सब जो कुछ भी है, सब आत्मा ही है ।’ एव— ‘यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं जिघ्रति तदितर इतर पश्यति तदितर इतर शृणोति तदितर इतरमभिवदति तदितर इतरं मनुते तदितर इतरं विजानाति यत्र वा अस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं जिघ्रेत् तत्केन कं पश्येत्तत्केन क
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