भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 90

७६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * श्रृणुयात्तत्केन कमभिवदेत्तत्केन क मन्वीत तत्केन कं विजानीयात् । येनेदम् सर्वं विजानाति तं केन विजानीया- द्विज्ञातारमरे केन विजानीयादिति ।' ( २ । ४ । १४ ) 'जहाँ ( अविद्यावस्थामें ) द्वैत-सा होता है, वहीं अन्य अन्यको सूँघता है, अन्य अन्यको देखता है, अन्य अन्यको सुनता है, अन्य अन्यका अभिवादन करता है, अन्य अन्यका मनन करता है तथा अन्य अन्यको जानता है, किंतु जहाँ इसके लिये सब आत्मा ही हो गया है, वहाँ किसके द्वारा किसे सूँघे, किसके द्वारा किसे देखे, किसके द्वारा किसे सुने, किस- के द्वारा किसका अभिवादन करे, किसके द्वारा किसका मनन करे और किसके द्वारा किसे जाने ? जिसके द्वारा इस सबको जानता है, उसको किसके द्वारा जाने ? हे मैत्रेयी ! विज्ञाता को किसके द्वारा जाने ?' इस प्रकार बृहदारण्यक उपनिषद्के दूसरे तथा चौथे अध्यायमें यह प्रसङ्ग विस्तारसे आया है, यहाँ तो उसका कुछ अंश ही दिया गया है । ( ४ ) जो नाशवान्, क्षणभङ्गुर, मायामय दृश्यवर्गसे रहित निराकार, निर्विकार, नित्य, विज्ञानानन्दघन निर्विशेष परब्रह्म परमात्मा है, वह मेरा ही आत्मा है अर्थात् मेरा ही स्वरूप है, इस प्रकार उस निराकार निर्विशेष विज्ञानानन्दघन परमात्माको एकीभावसे जानकर मनुष्य उसे प्राप्त हो जाता है । श्रुति कहती है— योऽकामो निष्काम आप्तकाम आत्मकामो न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति । ( बृहदारण्यक० ४ । ४ । ६ ) 'जो अकाम, निष्काम, आप्तकाम और आत्मकाम होता है, उसके प्राणोंका उत्क्रमण नहीं होता, वह ब्रह्म ही होकर ब्रह्मको प्राप्त होता है ।' इस विषयका रहस्य समझानेके लिये— बृहदारण्यक उपनिषद्में एक इतिहास मिलता है । एक बार राजा जनकने एक बड़ी दक्षिणावाला यज्ञ किया । उसमें कुरु और पाञ्चाल देशोंके बहुत-से ब्राह्मण एकत्रित हुए । उस समय राजा जनकने यह जाननेकी इच्छासे कि इन ब्राह्मणोंमें कौन सबसे बढ़कर प्रवचन करनेवाला है, अपनी गोशालामें ऐसी दस हजार गौएँ दान देनेके लिये रोक लीं, जिनमेंसे प्रत्येकके सींगोंमें दस-दस पाद सुवर्ण बँधा था और उन ब्राह्मणोंसे कहा—'पूजनीय ब्राह्मणो ! आपमें जो ब्रह्मिष्ठ हों, वे इन गौओंको ले जायें।' ब्राह्मणोंने राजाकी बात सुन ली; किंतु उनमें किसीका साहस नहीं हुआ । तब याज्ञवल्क्य- ने अपने ब्रह्मचारीसे उन गौओंको ले जानेके लिये कहा । वह उन्हें ले चला । इससे वे सब ब्राह्मण कुपित हो गये और जनकके होता अश्बलने याज्ञवल्क्यसे पूछा—'याज्ञवल्क्य ! हम सबमें क्या तुम ही ब्रह्मिष्ठ हो ?' याज्ञवल्क्यने कहा—'ब्रह्मिष्ठ- को तो हम नमस्कार करते हैं, हम तो गौओंकी ही इच्छावाले हैं।' यह सुनकर क्रमशः अश्बल, आर्तभाग और भुज्युने उनसे अनेकों प्रश्न किये और महर्षि याज्ञवल्क्यने उनक भलीभाँति समाधान किया । फिर चाक्रायण उपस्तने याज्ञवल्क्यसे पूछा—'हे याज्ञवल्क्य ! जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म और सर्वान्तर आत्मा है, उसकी मेरे प्रति व्याख्या करो।' याज्ञवल्क्यने कहा— एष त आत्मा सर्वान्तरः कतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तरो य प्राणेन प्राणिति स त आत्मा सर्वान्तरो योऽपानेनापानिति स त आत्मा सर्वान्तरो यो व्यानेन व्यानिति स त आत्मा सर्वान्तरो य उदानेनोदानिति स त आत्मा सर्वान्तर एष त आत्मा सर्वान्तरः । ( ३ । ४ । १ ) 'यह तेरा आत्मा ही सर्वान्तर है ।' उपस्तने पूछा— 'वह सर्वान्तर कौन-सा है ?' याज्ञवल्क्यने कहा—'जो प्राणसे प्राणक्रिया करता है, वह तेरा आत्मा सर्वान्तर है, जो अपान- से अपानक्रिया करता है, वह तेरा आत्मा सर्वान्तर है, जो व्यानसे व्यानक्रिया करता है, वह तेरा आत्मा सर्वान्तर है, जो उदानसे उदानक्रिया करता है, वह तेरा आत्मा सर्वान्तर है, वह तेरा आत्मा सर्वान्तर है।' उपस्तने फिर पूछा कि वह सर्वान्तर कौन-सा है। तब याज्ञवल्क्य पुनः बोले— ' 'सर्वान्तर । न दृष्टेर्द्रष्टारं पश्येर्न श्रुतेः श्रोतार शृणुया न मतेर्मन्तार मन्वीथा न विज्ञातेर्विज्ञातारं विजा- नीयाः । एष त आत्मा सर्वान्तरोऽतोऽन्यदार्तं ततो होपस्त- श्चाक्रायण उपरराम ।' ( ३ । ४ । २ ) 'यह तेरा आत्मा सर्वान्तर है । तू उस दृष्टिके द्रष्टाको नहीं देख सकता; श्रुतिके श्रोताको नहीं सुन सकता, मतिके मन्ताका मनन नहीं कर सकता, विज्ञातिके विज्ञाताको नहीं जान सकता । तेरा यह आत्मा सर्वान्तर है, इससे भिन्न आर्त ( नाशवान् ) है।' यह सुनकर चाक्रायण उपस्त चुप हो गया । अथ हैन कहोलः कौषीतकेयः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तं मे