भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 87
  • उपनिषदोंमें भेद और अभेद-उपासना * ७३ 'यह समस्त जगत् निश्चय ही ब्रह्म है, इसकी उत्पत्ति, स्थिति और लय—उस ब्रह्मसे ही है—इस प्रकार समझकर शान्तचित्त हुआ उपासना करे।' (२) 'तत्' पदके लक्ष्य ब्रह्मके स्वरूपका, जो कुछ जड़-चेतन, स्थावर-जङ्गम चराचर संसार है, वह सब ब्रह्म ही है, इस प्रकार निरूपण किया गया । अब उसी 'तत्' पदके लक्ष्यार्थ ब्रह्मके निर्विशेष स्वरूपका वर्णन किया जाता है । वह निर्गुण-निराकार अक्रिय निर्विकार परमात्मा इस क्षणभङ्गुर नाशवान् जड़ दृश्यवर्ग मायासे सर्वथा अतीत है । जो कुछ यह दृश्यवर्ग प्रतीत होता है, वह सब अज्ञानमूलक है । वास्तवमें एक विज्ञानानन्दघन अनन्त निर्विशेष ब्रह्मके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है । इस प्रकारके अनुभवसे वह इस जन्म-मृत्युरूप संसारसे मुक्त होकर अनन्त विज्ञान आनन्दघन ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है । यह बात शास्त्रों- में तथा उपनिषदोंमें अनेक जगह बतलायी गयी है । कठोपनिषद्में परब्रह्मके स्वरूपका वर्णन करते हुए यमराज कहते हैं— अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत्। अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते ॥ (१।३।१५) 'जो शब्दरहित, स्पर्शरहित, रूपरहित, रसरहित और गन्धरहित है तथा जो अविनाशी, नित्य, अनादि, अनन्त (असीम) महत्तत्त्वसे परे एव सर्वथा सत्य तत्त्व है, उस परमात्माको जानकर मनुष्य मृत्युके मुखसे सदाके लिये छूट जाता है।' मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किंचन । मृत्योः स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥ (२।१।११) 'यह परमात्मतत्त्व शुद्ध मनसे ही प्राप्त किये जानेयोग्य है, इस जगत्में एक परमात्माके अतिरिक्त नाना—भिन्न-भिन्न भाव कुछ भी नहीं है, इसलिये जो इस जगतमें नानाकी भाँति देखता है, वह मनुष्य मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है अर्थात् बार-बार जन्मता-मरता रहता है।' मुण्डकोपनिषद्‌में भी कहा है— न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा । ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्व- स्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः ॥ (३।१।८) 'वह निर्गुण निराकार परब्रह्म परमात्मा न तो नेत्रोंसे, न वाणीसे और न दूसरी इन्द्रियोंसे ही ग्रहण करनेमें आता है तथा तपसे अथवा कर्मोंसे भी वह ग्रहण नहीं किया जा सकता, उस अवयवरहित परमात्माको तो विशुद्ध अन्त:- करणवाला साधक उस विशुद्ध अन्तःकरणसे निरन्तर उसका ध्यान करता हुआ ही ज्ञानकी निर्मलतासे देख पाता है।' तैत्तिरीयोपनिषद्‌में भी कहा है— ब्रह्मविदाप्नोति परम् । तदेषाभ्युक्ता । सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म । (२।१।१) 'ब्रह्मज्ञानी परब्रह्मको प्राप्त कर लेता है, उसी भावको व्यक्त करनेवाली यह श्रुति कही गयी है—ब्रह्म सत्य, ज्ञानस्वरूप और अनन्त है।' (३) 'तत्' पदकी उपासनाके प्रकारका वर्णन करके अब 'त्वम्' पदकी उपासनाका प्रकार बतलाया जाता है । जो कुछ जड़-चेतन स्थावर-जङ्गम प्रतीत होता है, वह सब ब्रह्म है और जो ब्रह्म है, वह मैं हूँ । इसलिये मनुष्यको सम्पूर्ण भूतोंमें अपने आत्माको अर्थात् अपने-आपको और आत्मामें सम्पूर्ण भूतोंको ओतप्रोत देखना चाहिये । अभिप्राय यह है कि 'जो भी कुछ है, सब मेरा ही स्वरूप है' इस प्रकारका अभ्यास करनेवाला साधक शोक और मोहसे पार होकर विज्ञान-आनन्दघन ब्रह्मस्वरूपको प्राप्त हो जाता है । यह बात शास्त्रोंमें तथा उपनिषदोंमें जगह-जगह मिलती है । गीतामें कहा है— सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥ (६।२९) 'सर्वव्यापी अनन्त चेतनमें एकीभावसे स्थितिरूप योगसे युक्त आत्मावाला तथा सर्वमें समभावसे देखनेवाला योगी आत्माको सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित और सम्पूर्ण भूतोंको आत्मामें कल्पित देखता है।' ईशावास्योपनिषद्‌में भी कहा है— यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति । सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥ यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः । तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥ (६-७) उ० अ० १०—