कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 86, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें७२ - महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एकः । तस्याभिध्यानाद्योजनात्तत्त्वभावा- द्भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः ॥ ( श्वेताश्वतर० १। ९-१०) 'सर्वज्ञ और अल्पज्ञ, सर्वसमर्थ और असमर्थ—ये दोनों परमात्मा और जीवात्मा अजन्मा है तथा भोगनेवाले जीवात्मा- के लिये उपयुक्त भोग्य-सामग्रीसे युक्त और अनादि प्रकृति एक तीसरी शक्ति है ( इन तीनोंमें जो ईश्वर-तत्त्व है, वह शेष दोसे विलक्षण है) क्योंकि वह परमात्मा अनन्त, सम्पूर्ण रूपोंवाला और कर्त्तापनके अभिमानसे रहित है। जब मनुष्य इस प्रकार ईश्वर, जीव और प्रकृति—इन तीनोंको ब्रह्मरूपमें प्राप्त कर लेता है (तब वह सब प्रकारके बन्धनो- से मुक्त हो जाता है)। तथा प्रकृति तो विनाशशील है, इसको भोगनेवाला जीवात्मा अमृतरूप अविनाशी है, इन विनाशशील जड-तत्त्व और चेतन आत्मा—दोनोंको एक ईश्वर अपने शासनमें रखता है, इस प्रकार जानकर उनका निरन्तर ध्यान करनेसे, मनको उसमें लगाये रहनेसे तथा तन्मय हो जानेसे अन्तमें उसीको प्राप्त हो जाता है, फिर समस्त मायाकी निवृत्ति हो जाती है। यहांतक भेदोपासनाके दोनों प्रकारोंको उपनिषद्के अनुसार संक्षेपमे बतलाकर अब अभेदोपासनापर विचार करते हैं— अभेदोपासना अभेद-उपासनाके भी प्रधान चार भेद हैं। उनमेंसे पहले दो भेद 'तत्' पदको और बादके दो भेद 'त्वम्' पद- को लक्ष्य करके संक्षेपमे नीचे बतलाये जाते हैं— १. इस चराचर जगत्में जो कुछ प्रतीत होता है, सब ब्रह्म ही है, कोई भी वस्तु एक सच्चिदानन्दघन परमात्मासे भिन्न नहीं है। इस प्रकार उपासना करे। २. वह निर्गुण निराकार निष्क्रिय निर्विकार परमात्मा इस क्षणभङ्गुर नाशवान् जड दृश्यवर्ग मायासे सर्वथा अतीत है—इस प्रकार उपासना करे। ३. जड-चेतन, स्थावर-जङ्गम सम्पूर्ण चराचर जगत् एक ब्रह्म है और वह ब्रह्म मैं हूँ। इसलिये सब मेरा ही स्वरूप है—इस प्रकार उपासना करे। ४. जो नाशवान् क्षणभङ्गुर मायामय दृश्यवर्गसे अतीत, निराकार, निर्विकार, नित्य विज्ञानानन्दघन निर्विशेष परब्रह्म परमात्मा है, वह मेरा ही आत्मा है अर्थात् मेरा ही स्वरूप है—इस प्रकार उपासना करे। अब इनको अच्छी प्रकार समझनेके लिये उपनिषदोंके प्रमाण देकर कुछ विस्तारसे विचार किया जाता है। (१) सर्गके आदिमें एक सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही थे। उन्होंने विचार किया कि 'मैं प्रकट होऊँ और अनेक नाम- रूप धारण करके बहुत हो जाऊँ' 'सोऽकामयत । बहु स्यां प्रजायेयेति' (तैत्तिरीयोपनिषद् २। ६) इस प्रकार वह ब्रह्म एक ही बहुत रूपोंमें हो गये। इसलिये यह जो कुछ भी जड चेतन, स्थावर-जङ्गम जगत् है, वह परमात्मा का ही स्वरूप है। श्रुति कहती है— ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद्ब्रह्म पश्चाद्ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण। अधश्चोर्ध्वं च प्रसृतं ब्रह्मै- वेदं विश्वमिदं वरिष्ठम् ॥ (मुण्डक० २। २। ११) 'यह अमृतरूप परब्रह्म ही सामने है, ब्रह्म ही पीछे है, ब्रह्म ही दायीं ओर तथा बायीं ओर, नीचेकी ओर तथा ऊपरकी ओर भी फैला हुआ है. यह जो सम्पूर्ण जगत् है, यह सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म ही है। संप्राप्यैनमृषयो ज्ञानतृप्ताः कृतात्मानो वीतरागाः प्रशान्ताः। ते सर्वगं सर्वतः प्राप्य धीरा युक्तात्मानः सर्वमेवाविशन्ति ॥ (मुण्डक० ३। २। ५) 'सर्वथा आसक्तिरहित और विशुद्ध अन्तःकरणवाले ऋषिदोग इस परमात्माको पूर्णतया प्राप्त होकर ज्ञानसे तृप्त एवं परम शान्त हो जाते हैं, अपने-आपको परमात्मामें संयुक्त कर देनेवाले वे ज्ञानीजन सर्वव्यापी परमात्माको सब ओरसे प्राप्त करके सर्वरूप परमात्मामे ही प्रविष्ट हो जाते हैं।' सर्वं ह्येतद् ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पात्। (माण्डूक्य० २) 'क्योंकि यह सब-का-सब जगत् परब्रह्म परमात्मा है तथा जो यह चार चरणोंवाला आत्मा है, वह आत्मा भी परब्रह्म परमात्मा है।' सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत। (छान्दोग्योपनिषद् ३। १४। १)