भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 85
  • उपनिषदोंमें भेद और अभेद-उपासना * ७१ [बायाँ स्तम्भ] जिसमें साधनमे भी भेद हो और फलमें भी भेद हो, ऐसी भेदोपासनाका वर्णन ऊपर किया गया, अब साधनमे तो भेद हो, किंतु फलमे अभेद ऐसी उपासनापर विचार किया जाता है । शास्त्रोंमें भेदोपासनाके अनुसार चार प्रकारकी मुक्ति बतलायी गयी है—१. सालोक्य, २. सामीप्य. ३. सारूप्य और ४. सायुज्य । इनमेंसे पहली तीन तो साधनमे भी भेद और फलमे भी भेदवाली हैं, किंतु सायुज्य-मुक्तिमे साधनमे तो भेद है, पर फलमे भेद नहीं रहता । भगवान्‌के परम धाममे जाकर वहाँ निवास करनेको 'सालोक्य' मुक्ति कहते हैं; जो वात्सल्य आदि भावसे भगवान्‌की उपासना करते हैं,वे 'सालोक्य' मुक्तिको पाते हैं । भगवान्‌के परम धाममें जाकर उनके समीप निवास करनेको 'सामीप्य' मुक्ति कहते हैं; जो दासभावसे या माधुर्यभावसे भगवान्‌की उपासना करते है, वे 'सामीप्य' मुक्तिको प्राप्त होते हैं । भगवान्‌के परम धाममे जाकर भगवान्‌के जैसे स्वरूपवाले होकर निवास करनेको 'सारूप्य' मुक्ति कहते हैं, जो सखाभावसे भगवान्‌की उपासना करते हैं, वे 'सारूप्य' मुक्ति पाते हैं । इन सब भक्तोंमे सृष्टिकी उत्पत्ति, स्थिति और पालनरूप भगवत्सामर्थ्यके सिवा भगवान्‌के सब गुण आ जाते हैं । भगवान्‌के स्वरूपमे अभेदरूपसे विलीन हो जानेको 'सायुज्य' मुक्ति कहते हैं। जो शान्तभावसे (ज्ञानमिश्रित भक्तिसे ) भगवान्‌की उपासना करते हैं, वे 'सायुज्य' मुक्तिको प्राप्त होते हैं तथा जो वैरसे, द्वेषसे अथवा भयसे भगवान्‌को भजते हैं, वे भी 'सायुज्य' मुक्तिको पाते हैं । जिस प्रकार नदियोंका जल अपने नाम-रूपको छोड़कर समुद्रमें मिलकर समुद्र ही हो जाता है, इसी प्रकार ऐसे साधक भगवान्‌मे लीन होकर भगवत्स्वरूप ही हो जाते हैं । इसके लिये उपनिषदोंमें तथा अन्य शास्त्रोंमें जगह-जगह अनेक प्रमाण मिलते हैं । कठोपनिषद्‌में यमराज नचिकेतासे कहते हैं— यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति । एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥ ( २ । १ । १५ ) ‘जिस प्रकार निर्मल जलमे मेघोंद्वारा सब ओरसे बरसाया हुआ निर्मल जल वैसा ही हो जाता है, उसी प्रकार हे गौतमवंशीय नचिकेता ! एकमात्र परब्रह्म पुरुषोत्तम ही सब कुछ है—इस प्रकार जाननेवाले मुनिका आत्मा परमेश्वरको प्राप्त हो जाता है अर्थात् परमेश्वरमें मिलकर तद्रूप हो जाता है ।’ [दायाँ स्तम्भ] मुण्डकोपनिषद्मे भी कहा है- स वेदैतत्परमं ब्रह्म धाम यत्र विश्वं निहितं भाति शुभ्रम्। उपासते पुरुषं ये ह्यकामास्ते शुक्रमैतदतिवर्तन्ति धीराः ॥ ( ३ । २ । १) ‘वह निष्काम-भाववाला पुरुष इस परम विशुद्ध ( प्रकाशमान ) ब्रह्मधामको जान लेता है, जिसमे सम्पूर्ण जगत् स्थित हुआ प्रतीत होता हैं, जो भी कोई निष्काम साधक परम पुरुषकी उपासना करते हैं, वे बुद्धिमान् रजोवीर्यमय इस जगत्‌को अतिक्रमण कर जाते हैं।’ यथा नद्यः स्यन्दमाना समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय । तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति नास्याब्रह्म- वित्कुले भवति । तरति शोकं तरति पाप्मानं गुहाग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति । ( ३ । २ । –९ ) ‘जिस प्रकार बहती हुई नदियाँ नाम-रूपको छोड़कर समुद्रमे विलीन हो जाती हैं, वैसे ही ज्ञानी महात्मा नाम- रूपसे रहित होकर उत्तम-से-उत्तम दिव्य परम पुरुष परमात्माको प्राप्त हो जाता है । निश्चय ही जो कोई भी उस परब्रह्म परमात्माको जान लेता है, वह महात्मा ब्रह्म ही हो जाता है, उसके कुलमे ब्रह्मको न जाननेवाला नहीं होता, वह शोकसे पार हो जाता है, पाप-समुदायसे तर जाता है, हृदयकी गाँठोंसे सर्वथा छूटकर अमृत हो जाता है अर्थात् जन्म मृत्युसे रहित होकर ब्रह्मस्वरूप हो जाता है ।’ जो मनुष्य माया (प्रकृति), जीव और परमेश्वरको भिन्न-भिन्न समझकर उपासना करता है और यह समझता है कि ईश्वरकी यह प्रकृति ईश्वरसे अभिन्न है, क्योंकि शक्ति शक्तिमान्‌से अभिन्न होती है एव जीव भिन्न होते हुए भी ईश्वरका अग होनेके कारण अभिन्न ही हैं, इसलिये प्रकृति और जीव—दोनोंसे परमात्मा भिन्न होते हुए भी अभिन्न ही हैं। वह पुरुष भेदरूपसे साधन करता हुआ भी अन्तमें अभेदरूपसे ही परमात्माको प्राप्त हो जाता है। यह बात भी शास्त्रोंमें तथा उपनिषदोंमें अनेक स्थानोंमें मिलती है। जैसे— ज्ञाज्ञौ द्वावजावीशानीशा- वजा ह्येका भोक्तृभोग्यार्थयुक्ता । अनन्तश्चात्मा विश्वरूपो ह्यकर्ता त्रय यदा विन्दते ब्रह्ममेतत् ॥