कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 82, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपनिषदोंमें भेद और अभेद-उपासना ( लेखक-श्रीजयदयालजी गोयन्दका ) ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ ( बृहदारण्यक० ५ । १ । १ ) ‘वह सच्चिदानन्दघन परमात्मा अपने-आपसे परिपूर्ण है, यह ससार भी उस परमात्मासे परिपूर्ण है, क्योंकि उस पूर्ण ब्रह्म परमात्मासे ही यह पूर्ण ( ससार ) प्रकट हुआ है, पूर्ण ( ससार ) के पूर्ण ( पूरक परमात्मा ) को स्वीकार करके उसमें स्थित होनेसे उस साधकके लिये एक पूर्ण ब्रह्म परमात्मा ही अवशेष रह जाता है।’
हिंदू-शास्त्रोंका मूल वेद है, वेद अनन्त ज्ञानके भण्डार हैं, वेदोंका ज्ञानकाण्ड उसका शीर्षस्थानीय या अन्त है, वही उपनिषद् या वेदान्तके नामसे ख्यात है। उपनिषदोंमें ब्रह्मके स्वरूपका यथार्थ निर्णय किया गया है और साथ ही उसकी प्राप्तिके लिये विभिन्न रुचि और स्थितिके साधकोंके लिये विभिन्न उपासनाओंका प्रतिपादन किया गया है। उनमें जो प्रतीकोपासनाका वर्णन है, उसे भी एकदेशीय और सर्व- देशीय—दोनों ही प्रकारसे करनेको कहा गया है। ऐसी उपासना स्त्री, पुत्र, धन, अन्न, पशु आदि इस लोकके भोगोंकी तथा नन्दनवन, अप्सराएँ और अमृतपान आदि स्वर्गीय भोगोंकी प्राप्तिके उद्देश्यसे करनेका भी प्रतिपादन किया गया है एव साथ ही परमात्माकी प्राप्तिके लिये भी अनेक प्रकारकी उपासनाएँ बतलायी गयी हैं। उनमेंसे इस लोक और परलोकके भोगोंकी प्राप्तिके उद्देश्यसे की जानेवाली उपासनाओंके सम्बन्धमें यहाँ कुछ लिखनेका अवसर नहीं है। उपनिषदोंमें परमात्माकी प्राप्तिविषयक उपासनाओंके जो विस्तृत विवेचन हैं, उन्हींका यहाँ बहुत संक्षेपमें कुछ दिग्दर्शन कराया जाता है।
उपनिषदोंमें परमात्माकी प्राप्तिके लिये दृष्टान्त, उदाहरण, रूपक, संकेत तथा विधि निषेधात्मक विविध वाक्योंके द्वारा विविध युक्तियोंसे विभिन्न साधन बतलाये गये हैं, उनमेंसे किसी भी एक साधनके अनुसार संलग्न होकर अनुष्ठान करनेपर मनुष्यको परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है। उपनिषदुक्त सभी साधन १ भेदोपासना, और २ अभेदोपासना—इन दो उपासनाओंके अन्तर्गत आ जाते है। भेदोपासनाके भी दो प्रकार है। एक तो वह, जिसमे साधनमें भेदभावना रहती है और फलमें भी भेदरूप ही रहता है, और दूसरी वह, जिसमे साधनकालमे तो भेद रहता है, परतु फलमे अभेद होता है। पहले क्रमग हम भेदोपासनापर ही विचार करते हैं।
भेदोपासना
भेदोपासनामें तीन पदार्थ अनादि माने जाते हैं— १ माया ( प्रकृति ), २ जीव और ३. मायापति परमेश्वर । इनका वर्णन उपनिषदोंमें कई जगह आता है। प्रकृति जड है और उसका कार्यरूप दृश्यवर्ग क्षणिक, नाशवान् और परिणामी है। जीवात्मा और परमेश्वर—दोनों ही नित्य चेतन और आनन्दस्वरूप हैं, किंतु जीवात्मा अल्पज्ञ है और परमेश्वर सर्वज्ञ हैं; जीव असमर्थ है और परमेश्वर सर्वसमर्थ हैं, जीव अंश है और परमेश्वर अंशी हैं, जीव भोक्ता है और परमेश्वर साक्षी हैं एव जीव उपासक है और परमेश्वर उपास्य हैं। वे परमेश्वर समय-समयपर प्रकट होकर जीवोंके कल्याणके लिये उपदेश भी देते हैं।
इस विषयमे केनोपनिषद्में एक इतिहास आता है। एक समय परमेश्वरके प्रतापसे स्वर्गके देवताओंने असुरोंपर विजय प्राप्त की। पर देवता अज्ञानसे अभिमानवश यह मानने लगे कि हमारे ही प्रभावसे यह विजय हुई है। देवताओंके इस अज्ञानपूर्ण अभिमानको दूर कर उनका हित करनेके लिये स्वय सच्चिदानन्दघन परमात्मा उन देवताओंके निकट सगुण-साकार यक्षरूपमें प्रकट हुए। यक्षका परिचय जाननेके लिये इन्द्रादि देवताओंने पहले अग्निको भेजा। यक्षने अग्निसे पूछा—‘तुम कौन हो और तुम्हारा क्या सामर्थ्य है ?’ उन्होंने उत्तर दिया कि ‘मै जातवेदा अग्नि हूँ और चाहूँ तो सारे ब्रह्माण्डको जला सकता हूँ।’ यक्षने एक तिनका रखा और उस जलानेको कहा, किंतु अग्नि उसको नही जला सके एवं लौटकर देवताओंसे बोले—‘मैं यह नहीं जान सका कि यह यक्ष कौन है।’ तदनन्तर देवताओंके भेजे हुए वायुदेव गये। उनसे भी यक्षने यही पूछा कि ‘तुम कौन हो और तुम्हारा क्या सामर्थ्य है ?’ उन्होंने कहा—‘मैं मातरिश्वा वायु हूँ और चाहूँ तो सारे ब्रह्माण्डको उड़ा सकता हूँ।’