भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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  • उपनिषदोंमें भेद और अभेद-उपासना * ६९

[बायाँ स्तम्भ]

तब यक्षने उनके सामने भी एक तिनका रखा किंतु वे उसे उडा नहीं सके और लौटकर उन्होंने भी देवताओंसे यही कहा कि 'मैं इसको नहीं जान सका कि यह यक्ष कौन है ?' तत्पश्चात् स्वय इन्द्रदेव गये, तब यक्ष अन्तर्धान हो गये । तदनन्तर इन्द्रने उसी आकाशमें हैमवती उमादेवीको देखकर उनसे यक्षका परिचय पूछा । उमादेवीने बतलाया कि 'वह ब्रह्म था और उस ब्रह्मकी ही इस विजयमें तुम अपनी विजय मानने लगे थे ।' इस उपदेशसे ही इन्द्रने समझ लिया कि 'यह ब्रह्म है।' फिर अग्नि और वायु भी उस ब्रह्मको जान गये । इन्होंने ब्रह्मको सर्वप्रथम जाना, इसलिये इन्द्र, अग्नि और वायुदेवता अन्य देवताओंसे श्रेष्ठ माने गये । इस कथासे यह भी सिद्ध हो जाता है कि प्राणियोंमें जो कुछ भी बल, बुद्धि, तेज एव विभूति है, सब परमेश्वरसे ही है । गीतामे भी श्रीभगवान्ने कहा है— यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा । तत्तदेवावगच्छ त्व मम तेजोंऽशसम्भवम् ॥ ( १० । ४१ ) ‘जो-जो भी विभूतियुक्त अर्थात् ऐश्वर्ययुक्त, कान्तियुक्त और शक्तियुक्त वस्तु है, उस-उसको तू मेरे तेजके अशकी ही अभिव्यक्ति जान ।’ इस प्रकार उपनिषदोंमें कहीं साकाररूपसे और कहीं निराकाररूपसे, कहीं सगुणरूपसे और कहीं निर्गुणरूपसे भेद- उपासनाका वर्णन आता है । वहाँ यह भी बतलाया है कि उपासक अपने उपास्यदेवकी जिस भावसे उपासना करता है, उसके उद्देश्यके अनुसार ही उसकी कार्य-सिद्धि हो जाती है । कठोपनिषद्में सगुण-निर्गुणरूप ओंकारकी उपासनाका भेद रूपसे वर्णन करते हुए यमराज नचिकेताके प्रति कहते हैं— एतद्धयेवाक्षरं ब्रह्म एतद्धयेवाक्षरं परम् । एतद्धयेवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ एतदालम्बन श्रेष्ठमेतदालम्बन परम् । एतदालम्बन ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥ ( १ । २ । १६-१७ ) ‘यह अक्षर ही तो ब्रह्म है और अक्षर ही परब्रह्म है, इसी अक्षरको जानकर जो जिसको चाहता है, उसको वही मिल जाता है । यही उत्तम आलम्बन है, यही सबका अन्तिम आश्रय है । इस आलम्बनको भलीभाँति जानकर साधक ब्रह्म- लोकमें महिमान्वित होता है । इसलिये कल्याणकामी मनुष्योंको इस दुःखरूप संसार-


[दायाँ स्तम्भ]

सागरसे सदाके लिये पार होकर परमेश्वरको प्राप्त करनेके लिये ही उनकी उपासना करनी चाहिये, सासारिक पदार्थोंके लिये नहीं। वे परमेश्वर इस शरीरके अदर सबके हृदयमें निराकार- रूपसे सदा सर्वदा विराजमान हैं, परतु उनको न जाननेके कारण ही लोग दुःखित हो रहे हैं। जो उन परमेश्वरकी उपासना करता है, वह उन्हें जान लेता है और इसलिये सम्पूर्ण दुःखों और शोकससमूहोंसे निवृत्त होकर परमेश्वरको प्राप्त कर लेता है । मुण्डकोपनिषद्में भी बतलाया है— द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते । तयोरन्य. पिप्पलं स्वाद्वत्त्य- नश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥ समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नो- ऽनीशया शोचति मुह्यमान. । जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीश- मस्य महिमानमिति वीतशोक ॥ यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् । तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति ॥ ( ३ । १ । १-३ ) ‘एक साथ रहनेवाले तथा परस्पर सखाभाव रखनेवाले दो पक्षी ( जीवात्मा और परमात्मा ) एक ही वृक्ष ( शरीर ) का आश्रय लेकर रहते हैं, उन दोनोंमेंसे एक तो उस वृक्षके कर्मरूप फलोंका स्वाद ले-लेकर उपभोग करता है, किंतु दूसरा न खाता हुआ केवल देखता रहता है । इस शरीररूपी समान वृक्षपर रहनेवाला जीवात्मा शरीरकी गहरी आसक्तिमें डूबा हुआ है और असमर्थतारूप दीनताका अनुभव करता हुआ मोहित होकर शोक करता रहता है, किंतु जब कभी भगवान्‌की अहैतुकी दयासे भक्तोद्वारा नित्यसेवित तथा अपनेसे भिन्न परमेश्वरको और उनकी महिमाको यह प्रत्यक्ष कर लेता है, तब सर्वथा शोकरहित हो जाता है तथा जब यह द्रष्टा ( जीवात्मा ) सबके शासक, ब्रह्माके भी आदिकारण, सम्पूर्ण जगत्‌के रचयिता, दिव्यप्रकाशस्वरूप परमपुरुषको प्रत्यक्ष कर लेता है, उस समय पुण्य पाप—दोनोंसे रहित होकर निर्मल हुआ वह ज्ञानी भक्त सर्वोत्तम समताको प्राप्त कर लेता है ।’ वह सगुण-निर्गुणरूप परमेश्वर सब इन्द्रियोंमे रहित होकर भी इन्द्रियोंके विषयोंको जाननेवाला है । वह सबकी उत्पत्ति