भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 81
  • उपनिषदोंका सारसर्वस्व ब्रह्मसूत्र * ६७ वह निश्चय ही भली प्रकार अनुस्यूत है। इस सूत्रका आधार उपनिषद्‌का निम्नाङ्कित वचन है— तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः। आकाशा- द्वायुः। वायोरग्निः। अग्नेरापः। अद्भ्यः पृथिवी। पृथिव्या ओषधयः। ओषधीभ्योऽन्नम्। अन्नात्पुरुषः। स वा एष पुरुषो- ऽन्नरसमयः। तस्येदमेव शिरः। अयं दक्षिणः पक्षः। अयमु- त्तरः पक्षः। अयमात्मा। इदं पुच्छं प्रतिष्ठा। (तैत्ति० २।१।२) ब्रह्मसे आकाशादि सब क्रमसे निकले और सृष्टि हुई। और सृष्टि होनेके साथ ही ब्रह्म भी सृष्ट पदार्थोंमें प्रविष्ट होता गया। 'तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्' । और अन्तमें ब्रह्मसे ब्रह्ममें ही पहुँच गया। अर्थात् चक्रवत् व्यापार चला और जैसे चक्रका अन्त नहीं वैसे ही सृष्टिमें अनुस्यूत होनेसे आप ही चक्र पूरा कर प्रतिष्ठित रहा। अतएव वह अन्तरहित या अनन्त है। और आत्मा ही ब्रह्म है, यह भी उपनिषद्‌ने बता दिया। सूत्रमें 'सम्' पद आया है, वह भली प्रकार या अच्छी तरहका भाव दर्शाता है। अर्थात् सृष्टिके अङ्ग प्रत्यङ्गमें ब्रह्म समाया हुआ है। कणमें अल्प और पर्वतमें विशेष नहीं। सर्वत्र समान रूपसे। और वही ब्रह्म आत्मा है। भृगुवल्लीकी शिक्षा दो सूत्रोंमें आ गयी। इस प्रकार तैत्तिरीयोपनिषद्‌की तीनों वल्लियोंको प्रथम चार सूत्रोंमें बाँधकर वेदव्यासजीने रख दिया। ब्रह्मजिज्ञासा क्यों और किसको होती है, उसका कौन अधिकार है और ब्रह्मका तटस्थ और स्वरूपलक्षण बताकर उसका निरूपण कर दिया। जैसे उपनिषद्‌ने ब्रह्मप्राप्तिकी युक्ति बतायी है, उसीके आधारपर आगे भी सूत्र हैं। केवल चतुःसूत्री ही नहीं, समस्त ब्रह्मसूत्रकी रचना तैत्तिरीयोपनिषद्‌पर अवलम्बित है और इस उपनिषद्‌में ब्रह्म ज्ञानसम्बन्धी समस्त सिद्धान्तोंका समावेश होनेसे वेदव्यास भगवान्‌ने इसको इतना महत्त्व दिया है।

उपनिषदोंका सारसर्वस्व ब्रह्मसूत्र ( लेखक—पं० श्रीकृष्णदत्तजी भारद्वाज एम० ए०, आचार्य ) 'उपनिषद्' शब्दका मुख्य अर्थ है उपासना। इस विश्वके उदय, विभव और लयकी लीलामें¹ लीन परमात्माके निरतिशय ऐश्वर्यसे विमुग्ध प्राचीन ऋषि मुनियोंकी भक्तिभाव- भरित भावनाओंके शब्दचित्रोंके समुदायका नाम ही उपनिषद् है। प्रसङ्गतः अन्यान्य विषयोंका भी समावेश यद्यपि उपनिषद्-ग्रन्थोंमें है, तथापि मुख्य प्रतिपाद्य विषय उपासना ही है। ब्रह्मका साक्षात्कार करनेवाले ब्रह्मर्षियोंने उस परमतत्त्व- का प्रतिपादन करना चाहा, वाणीसे अतीतका वाणीद्वारा वर्णन करना चाहा तो अपने उस अलौकिक देवताकी वाङ्मयी आराधनामे वे लौकिक पदावलीका ही प्रयोग कर सके। परमेश्वरकी ऐकान्तिक और आत्यन्तिक दिव्यताको प्रकट करनेके लिये उन्हे अपने कोषमे प्राण², ज्योति³ और आकाश⁴ जैसे शब्दोंसे बढकर शब्द न मिल सके, अतएव उन्हीं पदोंके प्रयोगसे उन्हें सन्तोष करना पडा, किंतु साधारण जनताने प्राणादि शब्दोंका लौकिक अर्थ करना प्रारम्भ किया तो आवश्यकता इस बातकी हुई कि इस प्रकारके विरोधका परिहार किया जाय। ऐसे-ऐसे संशयास्पद स्थलोका परमात्म- परक अर्थ दिखानेके लिये एव ऐसी ही अन्यान्य पारमार्थिक शङ्काओंके निरासके साथ-साथ सत्सिद्धान्तके निरूपणके लिये कृष्णद्वैपायन वेदव्यासजीने एक सूत्रमयी रचना की। उसी- का नाम ब्रह्मसूत्र है। वेदान्तसूत्र और भिक्षुसूत्र भी इसके पर्याय हैं। गीताकी रचनासे पूर्व ही इन सूत्रोंका निर्माण हो चुका था⁵। इन सूत्रोंको उपनिषदोंका सार कहना युक्तियुक्त है। विभिन्न आचार्योंने अपने अपने मतके अनुसार ब्रह्मसूत्र- पर भाष्य किये हैं जो सभी अपने-अपने दृष्टिकोणोंसे उपादेय हैं। पुराणशिरोमणि श्रीमद्भागवत ब्रह्मसूत्र-प्रतिपादित अर्थका ही समर्थक है, जैसी कि सूक्ति है— अर्थोऽयं ब्रह्मसूत्राणाम् ।

१. लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्। ( ब्रह्मसूत्र २।१।३३ ) २ अत एव प्राण। ( ब्रह्मसूत्र १।१।२० ) ३ ज्योतिश्चरणाभिधानात् । ( ब्रह्मसूत्र १।१।२५ ) ४. आकाशस्तल्लिङ्गात् । ( ब्रह्मसूत्र १।१।२२ ) ५. ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः । ( गीता १३।४)