भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 80

६६ ~ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * फल तो अनित्य होगा और यहाँ अक्षय पदार्थकी प्राप्तिकी बात है। ब्रह्मके विषयमे चिकीर्षाको स्थान नहीं केवल जिज्ञासा चाहिये । श्रद्धापूर्वक प्रश्न-परिपश्न और श्रवण-मनन निधि- ध्यासनकी ही आवश्यकता है। कर्म क्षेत्रमे—गृहस्थाश्रममे ही समाप्त हो चुका और ब्रह्म तो सुख-दुःख—अर्थात् कर्म- फलसे अतीत या परे है, जीवन्मुक्तावस्थामें सुख-दुःख समान हो जाते हैं और विदेहमे दोनो नही रहते । प्रथम सूत्रकी वाक्यपूर्तिमें 'भवति' शब्द जोड़ना चाहिये । भाव यह है कि जिज्ञासा उत्पन्न नहीं की जाती, स्वतः होती है यदि विधिवत् गृहस्थाश्रमका निर्वाह हो तो । जिज्ञासा होनेपर प्रश्न होता है कि ब्रह्म क्या है ? उपनिषद्- का उत्तर है— यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते । येन जातानि जीवन्ति । यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति । तद्विजिज्ञासस्व । तद्ब्रह्मेति । ( तैत्ति० ३ । १ । १ ) इसपर वेदव्यासजीने दूसरा सूत्र बनाया—'जन्माद्यस्य यत ।' इसकी वाक्यपूर्ति करनेपर सूत्रका रूप होगा— 'यत जन्मादि अस्य भवति तद्ब्रह्म सत्य भवति' । सृष्टि, स्थिति, प्रलय और मोक्ष जिससे होते हे वह ब्रह्म है, 'जन्मादि' का यह अर्थ हुआ । जगत्के साथ देहधारी या जीवका भी विचार इसमे ग्राह्य होना उचित है, क्योंकि यदि केवल 'यत्प्रयन्ति' ही कहा होता तो लय हो अर्थ होता । जगत् ब्रह्ममे लीन होकर पुन. प्रकट होता रहता है और जीवोका भी यही हाल है कि प्रलयके बाद फिर सृष्टिमे आते हैं। साथमे 'अभिसंविशन्ति' शब्द भी दिया गया है। उपनिषद् इस शब्दको देकर मोक्षकी सूचना देता है। मुक्त जीव पूर्णरूपसे ब्रह्ममे सदाके लिये लीन हो जाते है, ब्रह्मविद्ब्रह्मैव भवति' । केवल लीन होना परम वस्तु नही है और चाहिये 'ब्रह्मविदाप्नोति परम्' गीतामें भगवान् श्रीकृष्ण- ने इसी बातको कहा है— ततो मा तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥ ( १८ । ५५ ) और समुद्रमें नदियोंके समा जानेकी उपमा देकर 'प्रविशन्ति' पद दिया है । 'अस्य' शब्दका अर्थ सूत्रकारके अनुसार है प्रत्यक्ष जगत्, जो इन्द्रियोंद्वारा अनुभवमें आता है अर्थात् जो अप्रत्यक्ष ब्रह्मसे विलक्षण है । सूचित यह कर दिया कि ब्रह्मके अस्तित्वमें इन्द्रियाँ साक्षी नही हो सकतीं । ‘यत’ का भाव है कि ब्रह्म आप ही जगत्‌का निमित्त और उपादान कारण है । वही सब कुछ बन गया है और वह भी अपने ही लिये । आप ही करनेवाला, आप ही बनने- वाला, अपने ही लिये और अपनेसे ही—ये सूत्र भाव ‘यतः’ शब्दगे व्याकरणकी दृष्टिसे भी आ जाते हैं। सृष्टि, स्थिति और प्रलय प्रकृतिमे निरन्तर होते रहते हैं, अतएव सत्य हैं; परतु ये विकारी सत्य हैं और ब्रह्म अविकारी सत्य है । वास्तवमें सत्य तो वही है जो अविकारी हो और सदा-सर्वदा एकरस हो । वैचित्र्य यही है कि ब्रह्म सदा अविकारी होते हुए और रहते हुए भी इस विकारी जगत्‌का अधिष्ठान है; अतएव ब्रह्म ही सत्य है । ब्रह्मका तटस्थ लक्षण बताया सृष्टि आदि । उसका सम्बन्ध कहकर उपनिषद्ने स्वरूपलक्षण कहा है—‘सत्य ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’। इस प्रकार व्यासजीने दूसरे सूत्रमे तटस्थ लक्षण और तीन स्वरूपलक्षणोंमेसे ‘सत्यम्’ को कह दिया। अब रह गये दो स्वरूपलक्षण ‘ज्ञानम्’ और ‘अनन्तम्’ । उनको अगले दो सूत्रोंमें क्रमसे कहते है। तीसरा सूत्र है—'शास्त्रयोनित्वात्' जिसका रूप वाक्यपूर्ति पर होता है— ‘शास्त्रयोनित्वात् तद्ब्रह्म ज्ञान भवति ।' इस सूत्रका आधार उपनिषद्वाक्य है— भीषास्माद्वातः पवते । भीषोदेति सूर्य । भीषास्मादग्निश्चेन्द्रश्च । मृत्युर्धावति पञ्चम इति । ( तैत्ति० २ । ८ । १ ) 'उस ब्रह्मके भयसे वायु चलता है । इसीके भयसे सूर्य उदय होता है तथा इसीके भयसे अग्नि, इन्द्र और पाँचवाँ मृत्यु दौड़ता है अर्थात् ब्रह्म ही समस्त सृष्टिका शासनकर्ता है । वह सब तत्त्व और उनके देवताओंको जानता है । वह ज्ञानस्वरूप है, मनुष्य ज्ञानी है, परतु वह ज्ञानस्वरूप या ज्ञान है । मनुष्यको तामस ज्ञान हुआ तो वह अज्ञानी कहा जाता है । इस प्रकार अज्ञानीको भी ज्ञान तो रहता ही है; परतु ब्रह्म ज्ञानी नहीं, ज्ञानस्वरूप है । सृष्टिका कार्य उसके शासनसे होता है, वह स्वयं नहीं करता । सृष्टिमे जो नियमका पालन हो रहा है, उन सबका मूल कारण ब्रह्म ही है । स्वरूपलक्षण 'अनन्तम्' भी उपनिषद्ने बताया है । उसके आधारपर व्यासजीने चौथा सूत्र बनाया—‘तत्त समन्व- यात् ।' जिसकी वाक्यपूर्ति करनेपर स्वरूप बना— 'समन्वयात् तन्तु ब्रह्म अनन्त भवति' अर्थात् वह ब्रह्म अनन्त है, क्योंकि सभी सृष्ट पदार्थोंमें