कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 78, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें६४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * 'प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरजायमानो बहुधा विजायते,' 'नीलग्रीवा शितिकण्ठा ' —आदि बहुतसे मन्त्र भगवान्के सगुण स्वरूपको सिद्ध करते हैं । श्रीनीलकण्ठ सूरिने तो श्रीहरिवंशपर्वके विष्णुपर्वके कई अध्यायोंकी टीकामे वेदोंमे ब्रजलीलाको दर्शाया है एव सर्वत्र यह स्पष्ट लिखा है कि यह लीला वेदके अमुक मन्त्रका उपबृंहण करती है। 'कल्याण' के गत वर्षके ४-५ अङ्कोंमें बहुत कुछ लिखा भी गया है । सच्ची बात तो यह है कि वेदोंका यथार्थ तात्पर्य इतिहास पुराणोंके अध्ययनसे ही लगाया जा सकता है—अन्यथा वेदेतिहासोंसे अनभिज्ञ पुरुष तो उनका अनर्थ ही कर डालता है— बिभेत्यल्पश्रुताद्वेदो मामय प्रहरिष्यति । इस तरह स्पष्ट है कि जो उपनिषदोंका तत्त्व है, वही पुराणेतिहासमे तथा सभी सज्जनोंका भी परमाराध्य तत्त्व है । सभी योगी मुनि उसीकी ही वन्दना करते हैं । ब्रह्मादि सभी देवतागण सर्वदा उसीका ध्यान करते हैं। श्रुतियाँ 'नेति- नेति' कहकर सर्वदा उसीका यशोगान करती हैं। उससे संसार- मे कोई भी वस्तु न तो भिन्न ही है और न अभिन्न ही । तस्माद्भिन्न न चाभिन्नमाभिभिन्न न वै विभु । और यदि ध्यानसे देखा जाय तो उपनिषदोंमें ही नहीं, प्रत्युत सम्पूर्ण मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद, सम्पूर्ण पुराण तथा रामायण एवं महाभारतके आदि, मध्य और अवसानमे सर्वत्र ही वह गीयमान है—यह सभीका चरम तत्त्व है— वेदे रामायणे पुण्ये पुराणे भारते तथा । आदौ मध्ये तथा चान्ते हरि सर्वत्र गीयते ॥ तैत्तिरीयोपनिषद् और ब्रह्मसूत्र ( लेखक—प्रो० प० श्रीजीवनशङ्करजी याज्ञिक, एम्० ए०, एल्-एल्० बी० ) पूज्यपाद भगवान् आद्य शङ्कराचार्यने सन्यास-आश्रमके दस सम्प्रदाय स्थापित किये प्रत्येक सम्प्रदायका अपना एक विशेष उपनिषद् कहा जाता है, जिसके अध्ययन और विचारसे ब्रह्मज्ञानप्राप्तिकी चेष्टा अनुयायी करते हैं । भगवान् वेदव्यास- ने ब्रह्मसूत्रमें यावत् उपनिषदोंकी मीमासा की है, ऐसा माना जाता है । इसीसे उपनिषद् और गीताके साथ ब्रह्मसूत्रकी गणना प्रस्थानत्रयीमें होती है, सभी उपनिषदोंका पठन तथा मनन कदाचित् सम्भव न हो, इसीलिये सम्प्रदायोंके लिये विशेष विशेष उपनिषदोंकी प्रधानता स्वीकार की गयी है । परतु ब्रह्मसूत्रको समझनेके लिये सभी उपनिषदोंका यथावत् ज्ञान होना आवश्यक माना जाय तो वेदव्यासजीकी अमर-कृति बहुत अग्रेमे अगम्य हो जाय । किंतु बात ऐसी नह । विचार- पूर्वक देखनेसे पता चलता है कि वेदव्यासजीने एक ही उपनिषद्को आधाररूप स्वीकार कर उसीपर अपने सूत्रोंकी रचना की है। वह आधार है कृष्णयजुर्वेदीय तैत्तिरीयोपनिषद्, जिसमें वेदान्तसिद्धान्तोंका पूर्णरूपेण समावेश है । वेदव्यासजी- की दृष्टिमें इस उपनिषद्का कितना महत्त्व था, इसी वातसे स्पष्ट हो जाता कि उसको केवल आधार बनाकर ही सूत्रों- की रचना नहीं की, बल्कि आदिसे अन्ततक प्रत्येक सूत्रको इसी उपनिषद्पर अवलम्बित रक्खा । इस उपनिषद्में तीन वल्लियाँ है जो शीक्षा, ब्रह्मानन्द और भृगु नामसे प्रसिद्ध हं । प्रथम वल्लीमे उपासना और शिष्टाचारकी शिक्षा शिष्यको दी गयी है और अन्य दोनोंमें ब्रह्मविद्याका निरूपण और ब्रह्मप्राप्तिके उपाय वरुण और उनके जिज्ञासु पुत्र भृगुके सवादरूपसे बताये गये हैं। भृगु अपने पिता वरुणसे विद्या प्राप्त कर गृहस्थाश्रममें प्रवेश करते हैं । गृहस्थोचित धर्मका पालनकर देव-ऋण, ऋषि-ऋण और पितृ ऋणसे मनुष्य उऋण होता है और समाजमें एक उपयोगी व्यक्ति बना रहता है । अन्य धर्मकार्यों- के साथ शम-दमादिका साधन और स्वाध्याय प्रवचनादिरूपी तप घरमें रहकर होते हैं। अन्तमे ये ही ब्रह्मको जाननेके साधन होंगे । प्रथम वल्लीके अन्तमे समावर्तनके समय शिष्यको गुरु जो उपदेश देकर विदा करते हैं, उससे बढकर उपदेश गृहस्थ- के लिये हो नहीं सकता । भारतीय सभ्यता और उसके आदर्शकी अपूर्व झाँकी उसमे मिलती है— सत्य वद । धर्म चर । स्वाध्यायान्मा प्रमद । आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तु मा व्यवच्छेत्सी । सत्यान्न प्रमदितव्यम् । धर्मान्न प्रमदितव्यम् । कुशलान्न प्रमदितव्यम् । भूत्यै न प्रमदितव्यम् । स्वाध्यायप्रवचनाभ्या न प्रमदितव्यम् । देवपितृकार्याभ्या न प्रमदितव्यम् । मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । आचार्यदेवो भव । अतिथिदेवो भव .....। ( तैत्ति० १ । ११ । १-२