कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४२ - महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
'तमेव विदित्वा अतिमृत्युमेति ।' (श्वेताश्वतर० ३ । ८)
—भारतीय विज्ञान इस अमृत ज्योतिर्जगत्को लेकर चलता है । कम से कम दस सहस्र वर्ष हो गये—शत सहस्र कहे तो भी क्षति नहीं है । पाश्चात्य इतिहासकी दृष्टि तो अत्यन्त ह्रस्व है ।
अथ यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मि-न्नन्तराकाशस्तस्मिन् यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति । (छान्दोग्य० ८ । १ । १)
'यह मानव-शरीर ब्रह्मपुर है । इसके भीतर एक क्षुद्र कमलकुसुमाकार गृह है । उसके भीतर एक छोटा-सा आकाश है । उसके अन्दर एक निगूढ रहस्य है, उसीको जानना होगा । उसीका अन्वेषण करना होगा ।' यह अनुसन्धान उपनिषद्में सर्वत्र है । यह है सत्यानुसन्धान, तत्त्वानुसन्धान, ब्रह्मानुसन्धान या आत्मानुसन्धान । छान्दोग्यकी प्रणाली केवल प्रतिलोम—इडक्टिव ही है । इसके पश्चात् सर्वत्र प्रतिलोम अनुलोम, इडक्टिव डिडक्टिव मिश्रित है, किंतु अनुलोम प्रधान है ।
इस उपनिषद्-निबन्धके लिये यह यत्किञ्चित् भूमिका है । हाँ उपनिषद्के काल निर्णयकी कोई चेष्टा नहीं की जायगी, क्योंकि यह बहुत बडा विषय है । एक वृहत् ग्रन्थमें भी उसकी यत्किञ्चित् ही आलोचना हो सकती है । उपनिषदें इतनी प्राचीन हैं कि वे ऐतिहासिक भावनाके अतीत हैं । चपलचित्त पण्डित जो कुछ भी कहे । समग्रतः उपनिषदोंके पन्ने उलटनेपर उनमें एक सुदीर्घ विकास-विवर्त्तधारा दृष्टिगोचर होती है । एक महान् एवोल्यूशन है । विशाल विज्ञानपट है । एक विचित्र चित्रविद्या चित्रपट धीरे धीरे खुल रहा है । इसका आरम्भ होता है छान्दोग्योपनिषद्से । छान्दोग्योपनिषद् ही समस्त उपनिषद्-शास्त्रकी भित्तिभूमि है । उपनिषद्का क्या उद्देश्य है, औपनिषदिक अध्यात्म-अनुसन्धानकी कौन-कौन-सी प्रणाली-पद्धति है, उपनिषद्-विज्ञानसे उपलब्ध अर्थनियम किस प्रकारके हैं, और उपनिषद्की अन्वेषणविधि किस प्रकार आगे चलती है—छान्दोग्योपनिषद्के अध्ययनसे हम इन समस्त विषयोकी प्रत्यक्ष धारणा कर सकते हैं । छान्दोग्यकी प्रणाली विशेषरूपसे प्रतिलोम-प्रणाली है । यह ग्रन्थ एक उत्कृष्ट Inductive Spiritual Science है ।
छान्दोग्यके पश्चात् छान्दोग्यके समीपवर्ती राज्यमे बृहदारण्यक है ।
आत्मैवेदमग्र आसीत् पुरुषविधःxxx (१ । ४ । १) स वै नैव रेमेxxस द्वितीयमैच्छत्xx । (१ । ४ । ३) द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे मूर्तं चैवामूर्तं चxxx (२ । ३ । १) 'तस्य हैतस्य पुरुषस्य रूपम् । यथा महारजनं वासो यथा पाण्ड्वाविकं यथेन्द्रगोपो यथारन्यर्चिर्यथा पुण्डरीकं यथा सकृद्विद्युत् ।' (२ । ३ । ६)
'सृष्टिसे पूर्व यह विश्व पुरुषरूपमे था । पुरुष बिल्कुल अकेला था । अकेलेमे उसे कोई आनन्द नहीं था, उसने दूसरेके सगकी कामना की । परब्रह्मके दो रूप हैं—मूर्त और अमूर्त । अर्थात् दृश्य और अदृश्य । परब्रह्म पुरुषका रूप है जैसे उज्ज्वल पीतवर्ण, उसका परिधान है पाण्डुवर्ण, कभी वह इन्द्रगोप (लाल रंगका एक कीट) कीटके सदृश लाल वर्णका प्रतीत होता है । कभी अग्निकी ज्वालाके वर्णका, कभी कमल वर्णका और फिर कभी अचञ्चल बिजलीके समान चमकदार' ।'
एषा भूताना पृथिवी रस । पृथिव्या आपो रस । अपामोषधयो रस । (छान्दोग्य० १ । १ । २)
इस प्रकार अनुसन्धान आरम्भ होता है और यह अनुसन्धान समाप्त होता है—
श्यामाच्छबलं प्रपद्ये शवलाच्छ्याम प्रपद्ये— (छान्दोग्य० ८ । १३ । १)
—इत्यादिमें जाकर । पृथिवीके जल-वायु तरु लताको ढूँढ-ढूँढकर, बार-बार निरीक्षण कर, चित्रपटकी लैबोरेटरीमें पुनः पुनः एक्सपेरीमेंट कर, आकाश वायु-मेघ विद्युत्-चन्द्र-सूर्य-ग्रह नक्षत्र, जीवके देह इन्द्रिय-मन प्राणके कोने-कोनेमें घूम घूमकर अन्तरके अन्तस्तलमे श्यामवर्ण परब्रह्म परमात्माके दर्शन किये थे छान्दोग्यके ऋषि-वैज्ञानिकने ।
उनका क्या उद्देश्य था, वे क्या आविष्कार करना चाहते थे, इसपर उन्होंने स्पष्ट कहा है—
दीर्घकालव्यापी अनुसन्धानके बाद जो सन्धान प्राप्त कर चुके हैं, देख चुके हैं, वे ही इस प्रकारका स्पष्ट वर्णन कर सकते हैं । छान्दोग्यके परवर्ती बृहदारण्यककी ब्रह्मोपलब्धि का यह परिचय है । अन्वेषणके तीन स्तर हैं—अनुसन्धान, अनुभव और उपलब्धि । ज्ञानाकाङ्क्षा, ज्ञान और विज्ञान । कभी-कभी तीनों वृत्तियाँ एक साथ ही चलती हैं—
१ ऋषिको क्या श्रीराधाकृष्णके रूपका दूराभास हो रहा था ? बिल्वमङ्गल कहते हैं—'मार स्वय नु मधुरद्युतिमण्डलु नु माधुर्यमेव नु मनो नयनामृत नु ।'